H1B, टैरिफ़़, और अमेरिका के जलवे: भारत एक सबक भूल रहा है

Acharya Prashant

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H1B, टैरिफ़़, और अमेरिका के जलवे: भारत एक सबक भूल रहा है
ख़ुद को मज़बूत बनाओ, दूसरे की शिकायत करने से क्या लाभ है। दूसरे तो दूसरे हैं, अपने हिसाब से काम करेंगे। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक प्रश्न है मेरा। अभी हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने एक अनाउंसमेंट की है कि H-1B वीज़ा के लिए 100 थाउज़ंड डॉलर्स यानी 1 लाख डॉलर कंपनीज़ को अदा करने होंगे। तो अब मेरे कुछ फ़्रेंड्स हैं जो बैंगलोर और पुणे जैसे शहरों में हैं, तो वो काफ़ी चिंतित हैं। उनका सपना था कि वहाँ जाकर काम करेंगे। और जो अलरेडी बाक़ी लोग हैं जो वहाँ पर काम कर रहे हैं, तो वो उनसे भी ज़्यादा स्ट्रेस्ड हैं। तो अब इस पॉलिटिकल डिसीज़न को हमें किस दृष्टि से देखना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: मैं तो ये देख रहा हूँ कि ये सज्जन भी हमारी आईटी टीम से हैं। इनको इतनी चिंता क्यों हो रही है कि यूएस का H-1B अब 1 लाख डॉलर का हो गया। अरे भाई, उसका देश है, वो करेगा न। हम क्या बात करें इसमें? हम क्या बात करें? अमेरिका में उसकी अप्रूवल रेटिंग बहुत अच्छी चल रही है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से वो चुनकर आया है। लोगों ने वोट डाला भाई बाक़ायदा उसको, पहली नहीं दूसरी बार वो चुना गया है, हम होते कौन हैं शिकायत करने वाले। वो अपने नेशनल इंटरेस्ट का ख़्याल कर रहा है, सोवरेन कंट्री है।

सवाल ये होना चाहिए, कि हम क्या कर रहे हैं? हम क्यों किसी और पर आश्रित हैं? होना तो ये चाहिए था कि खलबली अमेरिका में मचती, उनकी कंपनियाँ रो रही होतीं। 72% H-1B वीज़ा भारतीयों को दिया जाता है, होना तो ये चाहिए था कि उनकी कंपनियाँ कहतीं हम बहुत ज़्यादा आश्रित हैं इंडियन टैलेंट पर। ये तुमने क्या कर दिया, इससे हमारी कॉस्ट बढ़ जाएगी। होना तो ये चाहिए था, पर ऐसा है नहीं।

सचमुच बिल्कुल ऐसा होगा कि तुम्हारे दोस्तों में और तुम में खलबली मची हुई होगी। क्यों? खलबली क्यों मची होगी? क्योंकि H-1B रास्ता बनता है ग्रीन कार्ड का, परमानेंट रेज़िडेंसी और वो ग्रीन कार्ड रास्ता बनता है सिटीज़नशिप का। बस ये बात है।

और इन सब में गारंटर कौन बनता है बेचारा? एम्प्लॉयर। “हाँ जी, हाँ जी, हम तो बहुत अच्छे एम्प्लॉई हैं जी। हमें भेजो जी।” ये क्या हुआ, आठ-दस साल बीतते-बीतते पासपोर्ट ही बदल गया। अच्छे एम्प्लॉई तो छोड़ो, ये तो अच्छे नागरिक भी नहीं निकले। भाई उसको देखने दो, हमारा स्वाधीन देश है हम पसंद करेंगे क्या कि कोई और आकर हमारी नीतियों में दख़ल दे रहा है, “ये करो, वो करो।”

अब ट्रंप कोशिश तो कर रहा है दख़ल देने की, कि “हमें तुम्हारा पूरा मार्केट चाहिए अपने कार्स के लिए और अपने एग्रो प्रोडक्ट्स के लिए, चलो, टैरिफ़़ गिराओ तुम अपनी।” तो हमको अच्छा लग रहा है क्या? हम कह रहे हैं, नहीं, तुम सस्ता माल लाकर बेचोगे यहाँ पर एग्रीकल्चरल माल तो हमारे किसानों का क्या होगा? हमें नहीं अच्छा लग रहा। तुम अपनी गाड़ियाँ यहाँ लाकर बेचोगे तो जो हमारे डोमेस्टिक कार मैन्युफैक्चरर्स हैं उनका तो धंधा ही बंद हो जाएगा। हमें नहीं अच्छा लग रहा। और हम बार-बार यही कह रहे हैं, हमारा देश है, जैसे मर्ज़ी होगी हम चलेंगे। और हम बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। तो वो भी ठीक कर रहा है न, करने दो। वो ये थोड़ी कर रहा है कि मैं भारत में आकर कुछ करूँगा, वो तो ये कह रहा है कि अमेरिका आओगे तो ये नियम बना रहा हूँ।

मैं पूछ रहा हूँ, आज़ादी के इतने साल बाद भी ये हालत क्यों है कि हमें वहाँ जाने का मुँह तकना पड़ता है? आज भी ये हालत क्यों है कि हर पढ़ा-लिखा आदमी, माने तुम्हारे जैसा, अमेरिका ही भागने का सपना देखता है? ये क्यों है हालत, बताओ तो। क्यों हमारे बैंगलोर में और हैदराबाद में खलबली मच गई, बताओ। ये ज़रूरत क्यों थी?

और फिर मान लो हम एक्सपोर्टर हैं। दो ही चीज़ों का भारत एक्सपोर्टर है, या तो एकदम ही जो रॉ मटेरियल होता है, उसका अनप्रॉसेस्ड, विदआउट एनी वैल्यू एडिशन, वो हम एक्सपोर्ट करते हैं, मिनरल्स वग़ैरह। या हम एक्सपोर्ट करते हैं फिर आईटी सर्विसेस। जो भी एक्सपोर्टर होता है, उसके पास अल्टरनेटिव मार्केट्स भी होती हैं। होती हैं कि नहीं? नहीं तो तुम कैसे व्यापारी हो। एक ऐसे व्यापार को आप क्या कहेंगे जिसमें ख़रीदार एक ही है? इस व्यापारी के सर पर तो हमेशा तलवार लटकती रहेगी न, कि नहीं लटकेगी? एक ही ख़रीदार है, अब उसके रहमोकरम पर जीना पड़ेगा। तो वही हो रहा है।

और एक ही ख़रीदार क्यों है? क्योंकि हमारा जो पूरा बास्केट ऑफ़ ऑफरिंग्स है, जिसको हम ट्रेड कर सकते हैं, वो बहुत छोटा है। मैन्युफैक्चरिंग में हम कुछ करते ही नहीं हैं, 17% दुनिया की आबादी भारत में रहती है। इंटरनेशनल ट्रेड में भारत का हिस्सा है 3%, चीन का है 20%, आबादी बराबर दोनों की। हमारे पास एक्सपोर्ट करने के लिए बहुत कुछ होता तो इतनी समस्या नहीं होती।

अब तो एक बड़ी समस्या ये आती है कि हमें डॉलर भी तो चाहिए न। इसलिए नहीं कि डॉलर पैसा है, इसलिए कि डॉलर फ़ॉरेन करेंसी है। वो डॉलर नहीं होगा तो तेल कहाँ से ख़रीदोगे? फ़ॉरेन रिज़र्व्स की क्राइसिस हो जाती है, जैसे इक्यानवे में हो गई थी (सोर्स: इंटरनेशनल मनी फंड)। फिर कहते हो, अरे फ़ॉरेक्स की समस्या आ गई। वो समस्या नहीं होती न अगर डॉलर अलग-अलग जगहों से आ रहा होता। आप बहुत सारी चीज़ें एक्सपोर्ट कर रहे होते।

अभी कहाँ से आता है? या तो आईटी से आता है या रेमिटेंसेज़ से आता है। वो जो कर रहा है, उसको करने दो। हम बिल्कुल यहाँ पर खड़े होकर कह सकते हैं, पागल आदमी है। हम क्या कहेंगे, उसी का आधा देश बोल रहा है कि पागल आदमी है। और हम ये भी जानते हैं कि ये जो नीतियाँ हैं, ये मीडियम टर्म में अमेरिका के लिए अच्छी नहीं हैं। पर उस आदमी को मीडियम टर्म देखना ही नहीं है, उसको अगले तीन साल देखने हैं। क्योंकि अमेरिका में तीसरी बार तो राष्ट्रपति बन सकते नहीं। और कुल चार साल का कार्यकाल होता है, एक साल अभी निकलने को हो जाएगा। तो बचा क्या? तो आदमी कह रहा है, यार तीन साल करो और नोबेल प्राइज़ लेकर निकलो। वैसे भी अस्सी पार कर गए, अब बचा क्या है।

हम बिल्कुल यहाँ खड़े होकर कह सकते हैं, बहुत ग़लत हो रहा है, बहुत ग़लत हो रहा है। ट्रंप ने बहुत ग़लत कर दिया। पर जो भी कर दिया, उसके लिए उसको अमेरिका की जनता ने अधिकृत करा है, ऑथराइज़ करा है। तो वो कर सकता है, और हम कोई होते नहीं बोलने वाले, हमें नहीं बोलना चाहिए। हमें तब भी नहीं बोलना चाहिए था जब चुनाव हो रहा था और यहाँ पर हमने यज्ञ और हवन करे थे कि ट्रंप का जितना जीतना ज़रूरी है। बोलना हमें तब भी नहीं चाहिए था।

पर तब हमें ट्रंप इसलिए अच्छा लगा क्योंकि वो कहता था कि जितने भी ग़ैर लोग हैं, उनको मुल्क से निकाल देना चाहिए। यही काम हम यहाँ पर करना चाहते हैं। बड़ा अच्छा लगा कि बढ़िया है, देखो राइट विंग रेज़ोनेंस हो रही है। हम ये भूल गए कि जो सबको ग़ैर समझता है, वो भारत को भी तो ग़ैर समझेगा। जो किसी का नहीं है, बस अपने स्वार्थों का है, वो हिंदुस्तान का भी फिर कैसे हो पाएगा? तो लो, उसने गाज गिरा दी हिंदुस्तान पर। अब यज्ञ कर लो ट्रंप के नाम का, ट्रंपेश्वराय नमः।

और फिर कह रहा हूँ, हमें नाराज़ होने का कोई हक ही नहीं। हर सोवरेन देश का जो प्रीमियर होता है, हेड होता है, अध्यक्ष होता है, वो चुना ही इसलिए जाता है कि अपने देश के हित में काम करे। वो अपने देश के हित में काम कर रहा है, जैसा उसको लगता है। हालाँकि उसके देश के हित में भी वो काम नहीं है।

थ्योरी ऑफ़ कॉम्पिटिटिव एडवांटेज आपने पढ़ी होगी। दो चीज़ें बन सकती हैं अगर और बी और मैं और आप देश हैं। मान लो, मैं भारत हूँ, आप अमेरिका हैं। तो दो ही चीज़ें बन सकती हैं, और बी। ए मैं सस्ती बना सकता हूँ और बी आप सस्ती बना सकते हैं। तो ये थ्योरी कहती है, कि मुझे सिर्फ़ बनाना चाहिए और आपको सिर्फ़ बी बनाना चाहिए। और हम दोनों का साझा हित इसमें है कि मैं सिर्फ़ बनाऊँ और आपको एक्सपोर्ट कर दूँ और बदले में आप सिर्फ़ बी बनाओ और आप मुझे बी एक्सपोर्ट कर दो। इसमें दोनों का हित है।

लेकिन जो पूरा स्वदेशी वाला मसला होता है, जिसमें कई तरह के कोण हैं, कुछ उसमें कोण सही भी हैं, वो क्या कहता है? वो कहता है सेल्फ कंटेंड, सेल्फ डिपेंडेंट, आइसोलेटेड आइलैंड लाइक इकॉनमी। उसमें क्या कॉन्सेप्ट है? वो कहता है ट्रेड ज़्यादा होने नहीं चाहिए। आप और बी ख़ुद बनाइए, भले ही आपको बी बनाना भी नहीं आता और भले ही बी आपके यहाँ महँगा बनता है। इसी तरह से आप भी अपना और बी ख़ुद बनाइए, भले ही आपका महँगा बनता है। इसमें दोनों का ही घाटा है, क्योंकि उसको एक चीज़ महँगी बनानी पड़ रही है, मुझे दूसरी चीज़ महँगी बनानी पड़ रही है। बेहतर ये होता है, मैं भी सस्ता बनाता, वो भी सस्ता बनाता। मैं उसको एक्सपोर्ट कर देता, वो मुझे कर देता।

ट्रंप जो काम कर रहे हैं, वो अमेरिका को भी महँगा पड़ने वाला है और अमेरिका में भी जो अनएम्प्लॉयमेंट रेट है, वो अब थोड़ा-थोड़ा बढ़ना शुरू हो रहा है, काटेगी ये चीज़ अमेरिकन्स को भी, पर वक़्त लगेगा। और ट्रंप का ये, कि वक़्त है ही नहीं, मेरे ही पास वक़्त नहीं है। तो वक़्त अगर लगता हो तो लगे। बात आ रही है समझ में?

ख़ुद को मज़बूत बनाओ, दूसरे की शिकायत करने से क्या लाभ है। दूसरे तो दूसरे हैं, अपने हिसाब से काम करेंगे।

यद्यपि हम ये चाह सकते हैं, हम ये प्रार्थना कर सकते हैं कि सद्बुद्धि सबको आए। पर अब कोई सद्बुद्धि का वरण करेगा कि नहीं करेगा, हमारा तो कोई उस पर ज़ोर नहीं चलता न। लोगों की अपनी-अपनी बुद्धि होती है, अपने केंद्र होते हैं, अपने मंसूबे होते हैं, लोग अपने हिसाब से चलेंगे। प्रश्न ये है कि हमारी टाँगे इतनी सबल क्यों नहीं हैं कि हम अपने हिसाब से चल पाएँ।

अभी 26 तारीख को हमारा मिग-21 रिटायर हो रहा है। 42 स्क्वाड्रन्स सेंक्शनड हैं, हमारे पास 29 हैं। बताओ क्यों हम फँसे हुए हैं? और जो उसका प्रोडक्शन भी होने जा रहा है, जो उसका रिप्लेसमेंट है, तेजस Mk-1 वो होने जा रहा है 20-25 कुल साल के बनेंगे। जो हमारी सीमाओं पर बड़े से बड़े ख़तरे हैं। पाकिस्तान से सात गुना बड़ा हमारा देश है आबादी में भी और अर्थव्यवस्था में आठ गुना ज़्यादा बड़ा है। और पाकिस्तान के पास छब्बीस हैं, स्क्वाड्रन हमारे पास उनतीस हैं (सॉर्स: द टाइम्स ऑफ इंडिया)। ये कौन सा रेशियो है? वहाँ सेवन टाइम्स का रेशियो है, यहाँ 1:1 का।

ये क्यों हो रहा है पता है न? क्योंकि इंजन हमें अमेरिका से चाहिए। हम कह रहे हैं, हमने स्वदेशी विमान बनाया है पर उसका इंजन हमारा नहीं है। अब अगर अमेरिका पाबंदी लगा दे, और वो हमारी कलाई मरोड़ने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, वो ये भी कर सकते हैं कि तुम्हारा ये भी रोक देंगे हम। पहले उन्होंने जो गुड्स थे, उन पर टैरिफ़़ लगाई। अब वो सर्विस पर आ गए हैं। अब वो आगे डिफेंस पर क्यों नहीं आ सकते? उन्हें तो हमारी कलाई मरोड़नी है। कलाई मरोड़ने के लिए वो ये भी क्यों नहीं कर सकते कि जीई इंजन नहीं सप्लाई करेगी एचएल को। ये क्यों नहीं कर सकते?

फिर हम शिकायत करें, कि अरे अरे अरे, हमारा मिग भी चला गया और तेजस भी नहीं बना, तो ये शिकायत किसी काम की? कुछ होगा इस शिकायत से? पर तुम घबराओ नहीं, ये सब बहुत लंबा नहीं चलना है। छ: महीने, साल भर, बहुत हुआ तो 3 साल में ये सब हो जाएगा, ग्रीन कार्ड दूर नहीं। तुम भी आईटी से ही हो न? (श्रोता को पूछते हुए)।

हालात अपने देश में ऐसे कर दो कि तुम्हारे टैलेंट को भागने पर मजबूर होना पड़े और फिर उनको बोलो कि ये ट्रेटर्स हैं और ब्रेन ड्रेन हो रहा है। ये तो बता दो कि उन्हें मजबूर होना क्यों पड़ा भागने के लिए। मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम चिंता मत करो। उन्हें क्यों मजबूर होना पड़ता है भागने के लिए, बताओ न। वो वहाँ बैठकर के क्यों मक्खन मलाई खा रहे हैं पूरी दुनिया की? क्यों 72 % वो जितने इशू करते हैं H-1B उसमें से सब हमारे लिए…, हमारे ही लोग वहाँ सबसे ज़्यादा जा रहे हैं। क्यों जा रहे हैं?

चीन ने भी अपने लोगों को वहाँ से रोक लिया। मालूम है न वहाँ से वापस आ रहे हैं चीन में। और जो लोग अमेरिका से अब काम करके वापस आए हैं पिछले 10–20 साल में चीन में, उन्होंने चीन को बहुत योगदान दिया है। बहुत सारी चीज़ें जिनमें चीन अब कटिंग एज पर पहुँच रहा है, उनमें योगदान उन चीनियों का है जो वेस्टर्न इंस्टिट्यूशन्स में लैब्स में काम करके आए और फिर उस अनुभव को उन्होंने चीन में लगा दिया। चाहे वो एआई का क्षेत्र हो या डिफेंस का क्षेत्र हो या इंफ्रास्ट्रक्चर का क्षेत्र हो। और हमारे यहाँ हालत ये है कि हम भागने को तैयार बैठे हैं, किसी तरह यहाँ से भागने को मिले।

हम क्या बस ये मान लें कि हम में देश प्रेम नहीं है या बात और ज़्यादा है कुछ? बोलो न। क्या करेगा कोई यहाँ पर, एक प्रतिभाशाली नौजवान है वो क्या करे? बताओ तो। प्रजा हैं सब, बस प्रजा। प्रजा, जिसके हाथ में कोई ताक़त तो है नहीं। तो क्या करेगा वो यहाँ रह कर? जान दे? तो भागता है। होगा बहुत टैलेंटेड उसके टैलेंट की क़द्र क्या है, ये तो बताओ। होगा उसमें बहुत जज़्बा, बदलना चाहता हूँ हिंदुस्तान को। कैसे बदल दे, बताओ न। क्या करे? चुनाव लड़े?

हमारे यहाँ चुनाव लड़ने में ह्यूज एंट्री बैरियर है। कहाँ से लाओगे वो करोड़ों रुपए जिससे कि एक अपनी सीट भी लड़ सको। पूरी पॉलिटिकल पार्टी खड़ी करना तो सैकड़ों करोड़ का सौदा है। अपनी सीट भी लड़ने के लिए पैसा कहाँ से लाएगा आदमी? और अपना तो भर दे नॉमिनेशन, और पीछे से आकर उसे घर में पत्थर मारो, आग लगा दो। क्या करेगा कोई, बदलाव लाना भी चाहता है। जवान लोग होते हैं, उनके बहुत जज़्बा होता है। वो कहते हैं, ये बदलेंगे, वो बदलेंगे, बहुत सपने हैं उनकी आँखों में। वो कैसे बदल दें इस देश को, बताओ तो। तरीक़ा क्या है?

एक जवान आदमी वो कैसे बदल दे, तरीक़ा बताओ। कोई तरीक़ा है? जब वो देखता है, कोई तरीक़ा ही नहीं है, तो उड़ जाता है बाहर। बिल्कुल कटिंग एज हाईटेक प्रोफ़ेशनल एजुकेशन हासिल करी है, वो कहाँ लगाए, कहाँ लगाए? वैसे ही यहाँ इंडस्ट्रीज़ ही नहीं हैं, जहाँ उसके ज्ञान का, नॉलेज का इस्तेमाल हो सके। आप आईआईटी से निकले हो, मैकेनिकल, केमिकल कुछ कर के, आपने जो सीखा है, उसको इंडिया में लगाना मुश्किल है। उतनी यहाँ पर ज़रूरत और वैकेंसीज़ ही नहीं हैं। तो वो फिर बाहर जाता है।

और आप कहो, “नहीं-नहीं, उसे अपना कुछ शुरू कर देना चाहिए।” अपना कुछ शुरू करने के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस इंडिया में कितनी है, जानते हो न? ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स में इंडिया कहाँ पर आता है, पता है न? वो अपना तो कुछ शुरू भी कर दे, पर यहाँ शुरू करना भी बहुत खतरे का सौदा है। तो उड़ते हैं, सब बाहर जाते हैं।

ट्रंप को भी ये बात पता है, कि भारतीय जवान टैलेंट मजबूर है, इसलिए वो हमारी कलाई मरोड़ रहा है। उसको पता है कि यहाँ का जवान आदमी मजबूर है, क्या करेगा और अमेरिका ही आना पड़ेगा। अपवाद हो सकते हैं। आप बिल्कुल कह सकते हो, इंडियन स्टार्टअप्स भी तो हैं, ये भी है, वो भी है। बिल्कुल बोल सकते हो। मैं उन सबको जानता हूँ। उसके बाद कह रहा हूँ, वो सब बहुत छोटा है। वो इतना नहीं है कि इंडियन टैलेंट को अब्ज़ॉर्ब कर पाए, और छोटा भी है और लो वैल्यू एडेड भी है। क्या स्टार्टअप्स की हम बात कर रहे हैं? फूड डिलीवरी एप्स। ये इसमें हाईटेक वो लग रहा है?

हाँ, ठीक है आईपीओ आ सकता है। पर आईपीओ आने से जिस आदमी ने सोचा हो कि मुझे टेक्नोलॉजी से प्यार है, उसकी भूख तो नहीं मिट जाएगी न। ले-दे के वो है क्या कुल? यही तो है कि तुम्हारे दरवाज़े पर जूता डिलीवर कर देंगे, खाना डिलीवर कर देंगे, नमकीन डिलीवर कर देंगे और इस तरह के ये काम चल रहे हैं, ये टेक्नोलॉजी के नाम पर।

एआई में किसी को काम करना है। एक कंप्यूटर इंजीनियर है हमारा, क्या करे? वहाँ ओपन एआई बैठा है, यहाँ चीन में डीप सीक बैठा हुआ है। आप हिंदुस्तान यहाँ क्या करे? क्या करे बताओ। एआई में काम करना है, हिंदुस्तान में रह के क्या करे वो?

और ये बात पूरी दुनिया जानती है और पूरी दुनिया मालूम है अब एक और काम कर रही है, इंडियन टैलेंट को अट्रैक्ट करने के लिए। अब ये एक युग आने वाला है जिसमें पूरी दुनिया को पता होने वाला है कि जो बिल्कुल प्रतिभा के धनी होते हैं, एकदम टॉप 0.1 परसेंटाइल उनके लिए हिंदुस्तान में कोई काम नहीं है। तो उनको अट्रैक्ट करने के लिए अलग-अलग तरीक़े की स्कीम्स निकाली जा रही हैं और और ज़्यादा निकाली जाएँगी। गोल्डन वीसा ऑफर किए जाएँगे। मुल्कों में होड़ लगने वाली है आगे कि कौन यहाँ की जो बिल्कुल क्रीम है उसको अपने यहाँ ले लेता है।

कहते हैं, यहाँ पर जो बिल्कुल नीचे वाली जनता है, जो मरने को तैयार है, उसको यहाँ पड़ने रहने दो और सड़ने दो उसको यहाँ पर रहने दो। बाक़ी जो यहाँ के ढंग के लोग हैं उनको अपने मुल्कों में खींच लो। तो आप दो चीज़ें देखोगे, एक ओर तो जो इमीग्रेशन है उसकी रेगुलेशंस और टाइट होंगी साधारण आदमी के लिए। और दूसरी ओर आप देखोगे कि जो टॉप टैलेंट है उसको और ज़्यादा न्योता दिया जाएगा कि हमारे यहाँ आ जाओ। तुम्हारे देश में वैसे ही तुम्हारे लिए कुछ नहीं है।

ले-दे के कुल मिलाकर जो तस्वीर उभर रही है वो ये है कि इंडिया विल बिकम द बैकयार्ड ऑफ द वर्ल्ड। जो भी ढंग के लोग होंगे वो जा चुके होंगे, जो यहाँ रहेंगे वो एक गैस चेंबर जैसी हालत में रहेंगे। और जो बिल्कुल लो वैल्यू एडेड है वो काम कर रहे होंगे। दुनिया अपना जो सबसे नीचे वाला काम है, साधारण एकदम, वो काम भारत को आउटसोर्स करेगी। वही यहाँ चल रहा होगा और वही हमारी तरक्की होगी।

चिंता मत करो ये H-1B वग़ैरह वाली समस्या ज़्यादा दिन तक नहीं रहने वाली। और न ही ये रहने वाला है कि टेस्ला या एप्पल इंडिया में मैन्युफैक्चर नहीं कर सकते। ट्रंप उनको रोक नहीं पाएँगे, वजह बहुत सीधी है, यूएस में मैन्युफैक्चरिंग बहुत महँगी पड़ने वाली है। क्योंकि वहाँ पर लोगों को पैसा अच्छा मिलता है तो प्रोडक्ट्स भी वहाँ पर महँगे तैयार होंगे। तो जो भी सस्ता काम होना है भाई यहीं आएगा, चिंता मत करो।

चीन भी अब उतना सस्ता नहीं रहा, क्योंकि वहाँ भी स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग बढ़ गया है। लेकिन वो जो सस्ता खेल था, उसमें भी हमसे बाज़ी पता है कौन मार गया? वियतनाम और बांग्लादेश। महँगा खेल तो हम खेल ही नहीं पाए, सस्ते खेल में भी बाज़ी ले गए वियतनाम और बांग्लादेश।

हमारे जो एक्सपोर्ट्स हैं उस पर इतनी 25–50% टैरिफ़ क्यों लगा पाए? क्योंकि हमारे एक्सपोर्ट्स में कोई यूनिकनेस नहीं है, रिप्लेसेबल हैं सारे। उदाहरण ले लो टेक्सटाइल्स का। आप जो टेक्सटाइल्स भेज रहे हो, वही पाकिस्तान और बांग्लादेश भी भेज रहे हैं, चीन भी वही भेज रहा है। तो ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने टेरिफ़ लगा दिया तो उसमें अमेरिकन कस्टमर का नुकसान हुआ। अमेरिकन कस्टमर का भी नुकसान नहीं है। आज तक उसे आपके ब्रांड का मिल रहा था, कल उसे बांग्लादेश ब्रांड का मिल जाएगा, लगभग उतनी ही कीमत में।

कुल मिलाकर के अपने सामर्थ्य का कोई विकल्प नहीं होता। लेकिन जहाँ संस्कृति ही बन गई हो दूसरों पर आश्रित रहने की, वहाँ ये भाव ही नहीं उठता कि अपने दम पर ज़िंदगी जीनी है। और जब व्यक्तिगत ज़िंदगी अपने दम पर नहीं जी जाती, तो राष्ट्रीय जीवन भी फिर अपने दम पर नहीं होता, राष्ट्रीय जीवन भी पराश्रित हो जाता है।

जब यहाँ का व्यक्ति ही शर्म नहीं अनुभव करता दूसरे पर ये करने से (हाथ जोड़कर कहते हैं), जब धर्म में ही हमने ये मान लिया है कि जो सर्वशक्तिशाली सत्ता है वो हमारे भीतर नहीं, हमें हर तरीक़े से इधर-उधर तमाम आकाओं की मेहरबानी पर ज़िंदा रहना पड़ेगा, तो वही चीज़ फिर हमारे धार्मिक जीवन से हमारे व्यक्तिगत जीवन में दिखाई देती है, फिर सामाजिक जीवन में दिखाई देती है और फिर राष्ट्रीय जीवन में दिखाई देती है। झुकना, दबना, दूसरे पर आश्रित रहना, बड़ी गहरी आदत बन गई है हमारी।

और हम रिस्क एवेर बहुत हैं। आगे बढ़ने के लिए ख़तरे उठाने पड़ते हैं। ख़तरे? सेफ़ खेलो, मिडिल ऑफ़ द रोड चलो। सब माँ-बाप अपने बच्चों से यही लगे हैं, बेटा, तुम्हारी अच्छी-सी जॉब लग जाए। बेटा, किसी बड़े ब्रांड में आपकी जॉब लगी? नहीं लगी? बेटा, आप अच्छे से एजुकेशन लीजिए ताकि आपकी बहुत अच्छे ब्रांड में जॉब लग जाए और आप यूएस में सेटल हो जाएँ बेटा। अब यहाँ क्या इनोवेशन होगा? क्या क्रिएटिविटी होगी? या हो सकती है? यहाँ क्या खतरा उठाया जाएगा?

तो यही किया जाएगा कि अच्छा बच्चा बन करके यहाँ से मांग काढ़ करके, “यस, यस, आई विल बी अ गुड सिटीजन ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका। और क्या है? ये माँ-बाप के अल्टीमेट ड्रीम ही तो है। और क्या है? यहाँ कौन-सा माँ-बाप तैयार है कि मेरे घर में क्रांतिकारी पैदा हो, जो कुछ अलग करके दिखा दे। सबको यही है, “नहीं बेटा, आप न सेफ़ खेलिए, आप पहले अपना फ्यूचर सिक्योर करिए बेटा। और जल्दी से देखिए, वो कुंडली लगा के, गोत्र मिला के शी इज़ अ वेरी डेंटी गर्ल, बी ए इंग्लिश ऑनर्स।” मम्मी जी को इंग्लिश नहीं आती तो उसकी गाली नहीं समझ पाएँगी, अच्छा रहेगा न।

फिर हमें ताज्जुब होता है कि ये दुनिया हम पर बल प्रयोग क्यों कर रही है। फिर हमें ताज्जुब होता है कि छोटे-छोटे देश हमें आँखें क्यों दिखाते हैं। क्योंकि हमारा व्यक्तिगत जीवन ही गड़बड़ है।

राष्ट्र तो एक एब्स्ट्रैक्शन है, है न? रियलिटी तो पर्सन है। जब व्यक्ति ही गड़बड़ है तो राष्ट्र कैसे ठीक हो जाएगा?

और व्यक्ति को गड़बड़ बना रखा है हमारी बहुत पुरानी मान्यताओं ने, जिन्होंने हमारी संस्कृति ही विकृत कर दी है। और उस संस्कृति को हमने धर्म का नाम दे दिया है। जब तक हमारा धर्म, हमारी संस्कृति ठीक नहीं किए जाएँगे, इनको दर्शन पर आधारित नहीं किया जाएगा, तब तक भारत का सशक्त होना असंभव है।

आज ट्रंप है, कल कोई और होगा। चीन चढ़ आया था। अब इधर से ट्रंप आए हैं तो अब हम चीन से दोस्ती कर रहे हैं। चीन फिर कुछ दिनों में चढ़ आएगा। और चीन से हमें कब दोस्ती करनी पड़ रही है, जब अभी-अभी हमको पता है कि जो “ऑपरेशन सिंदूर” हुआ था, वो पूरी पाकिस्तान की नहीं, चीन की ज़्यादा कारस्तानी थी। और उसके कुछ ही महीने बाद हमें जाकर के चीन से हाथ मिलाना पड़ रहा है। क्यों करना पड़ रहा है? क्योंकि अपना दम नहीं है।

भारतीय ठीक नहीं है तो भारत ठीक कैसे हो जाएगा?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं अपना प्रश्न लिख कर के लाई हूँ।

आचार्य जी, जब आप भारत की समस्याओं की बात कर रहे होते हैं तो आप वुमेन एंपावरमेंट, अंधविश्वास, लोक धार्मिक कट्टरता, सिविक सेंस जैसे मुद्दों को संबोधित करते हैं। मेरा आपसे प्रश्न है कि अगर आप वेस्ट से बात करें तो उनके किन मुद्दों को एड्रेस करेंगे, क्लाइमेट चेंज के अलावा?

आचार्य प्रशांत: उनसे बड़ा मज़ेदार होता है बात करना। एक तो बहुत सालों से करी नहीं बात, बीच में काफ़ी होती थी। पर ये आप क्यों पूछ रहे हो सवाल? क्या करना है? ये क्यों पूछ रहे हो? इसमें क्या है? ये जब उनसे करेंगे बात तो देखेंगे उनकी शक्ल पर क्या लिखा है। उस हिसाब से उनसे बात होती है।

उनके दूसरे हिसाब-किताब होते हैं। अब उदाहरण के लिए फ्रीडम का मतलब ये है कि मैं बिल्ली हूँ और ये जो मेरा पार्टनर है, मेरा ओनर है। और ये तो फ्रीडम है न। फ्रीडम टू चूज़ माय आइडेंटिटी। एंड आई हैव चूज़न माय आइडेंटिटी ऐज़ दैट ऑफ़ अ कैट। तो अब फ्रीडम क्या चीज़ है, उनको समझाना पड़ता है। अब ये आपको नहीं समझाऊँगा।

आप तो कोई नहीं आते हो कि मैं बिल्ली हूँ कि भैंस हूँ, आपके मुद्दे दूसरे हैं। वहाँ मुद्दा दूसरा होता है। वहाँ पर वो फ़्रीडम को बहुत दूसरी दिशा में ले जाकर डिस्टॉर्ट कर चुके हैं। तो एक ये मुद्दा आता है। लोनलीनेस उनके लिए मुद्दा होता है और मुद्दे होते हैं। वहाँ पर उनसे उन पर दूसरी बात होती है उनसे।

प्रश्नकर्ता: सर, मैं इसलिए पूछ रही थी क्योंकि अभी एक चार्ली कर्क नाम के व्यक्ति की डेथ, मतलब उनकी हत्या हुई।

आचार्य प्रशांत: गोली मारी।

प्रश्नकर्ता: जी। तो सर, उनके जो ओपिनियन्स थे वो बहुत ही कट्टर थे, वो कंज़र्वेटिव क्रिश्चियन थे। वो सर, विमेन को लेकर बहुत डेरोगेटरी रिमार्क्स करते थे। उनका कहना था, कि अगर उनकी नाइन इयर्स की बेटी के रेप से अगर वो प्रेग्नेंट हो जाती है तो भी वो अबॉर्ट करना अलाउड नहीं होना चाहिए। तो इसीलिए मैं जानना चाह रही थी कि अगर…

आचार्य प्रशांत: वो आएँगे सामने तो बात करेंगे। देखो, इंसान तो इंसान ही है, भारत में हो, अमेरिका में हो, कहीं भी हो वृत्तियाँ तो एक ही होती हैं, मूर्खताएँ भी सब एक ही तरह की होती हैं। बस उन पर जगह, समय, समाज, संस्कृति, इनका कपड़ा चढ़ जाता है। कपड़े के नीचे तो सब एक ही हैं, तो हो जाती है बात, कोई दिक़्क़त नहीं।

प्रश्नकर्ता: सर, मुझे आश्चर्य इस चीज़ पर हो रहा है कि ये बातें अमेरिका में हो रही हैं।

आचार्य प्रशांत: तो आप अमेरिका को क्या समझते हो? क्या आपको आश्चर्य हो रहा है इसमें? ठीक है, बहुत वजहें हैं, कि वहाँ पैसा है और कुछ बहुत अच्छे इंस्टीट्यूशन्स हैं उनके पास, वो सब ठीक है। पर आज भी अगर आप गूगल करोगे तो एक बहुत बड़ा प्रतिशत है अमेरिकी लोगों का जो मानता है कि अर्थ फ़्लैट है। छोटा-मोटा नहीं, मैं एक-दो प्रतिशत की बात नहीं कर रहा हूँ। आप वहाँ क्या बात करोगे?

हम कहते हैं, विश्व की जो सबसे ताक़तवर डेमॉक्रेसी है, देखो राष्ट्रपति किसको चुना है। तो ऐसा कुछ थोड़ी है कि अमेरिका में बैठा है तो बड़ा बुद्धिजीवी हो गया या बड़ा होशियार हो गया। गन कल्चर वहाँ देखा है ना?

प्रश्नकर्ता: हाँ जी सर।

आचार्य प्रशांत: हर आदमी वहाँ पर जैसे आप यहाँ जाते हो मॉल में आप वेंडिंग मशीन लगी है, आप कुछ उसमें से अपना सॉफ्टी निकाल लेते हो, कोल्ड ड्रिंक निकाल लेते हो। ऐसे ही वहाँ मॉल में जाओ तो वहाँ बंदूकें सजी होती हैं और फिर वहाँ आए दिन गोलियाँ चलती रहती हैं। सब होता रहता है।

तो ऐसा कुछ नहीं मानते कि अमेरिका माने कि वहाँ सब बड़े विद्वान और बड़े गहरे लोग बैठे हुए हैं। हाँ, जो उनकी खूबियाँ हैं, वो हमको सीखनी चाहिए। जो जिस क्षेत्र में अच्छा है, ऊँचा है, बिल्कुल निष्पक्ष होकर न सिर्फ़ स्वीकारना चाहिए बल्कि सीखना चाहिए। है न? तो वो सब ठीक है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि तुम किसी को देवता ही मान लो या अमेरिका है तो बहुत ही बढ़िया होगा। ऐसा कुछ भी नहीं है।

आम जो अमेरिकन है वो बहुत हद तक विरासत की खा रहा है। इनोवेशन लेवल्स हैं या प्रोडक्टिविटी लेवल्स हैं, वो कई दूसरे देश हैं जिनमें बहुत ज़्यादा है। बहुत सारे उनके सिस्टम्स हैं जो बिल्कुल टूटे हुए हैं। उदाहरण के लिए हेल्थकेयर।

तो सबसे बड़ी-बड़ी, भारी-भारी गाड़ियाँ वही बनाते हैं, सबसे ज़्यादा प्रदूषण वही करते हैं। अभी भी जो पूरा क्लाइमेट मूवमेंट है, उसको वही ब्लॉक करके बैठे हुए हैं। पहली बार नहीं, दूसरी बार वो ब्लॉक कर रहे हैं “पेरिस एग्रीमेंट” को। तो सीखेंगे, पूरी दुनिया से सीखेंगे। उनकी यूनिवर्सिटीज़ बहुत अच्छी हैं तो वहाँ जाकर पढ़ेंगे भी और आते हुए वापस लौटते हुए नमन भी करके आएँगे।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अपने आप को किसी भी तरीक़े से आप हीन मान लीजिए। दोनों अतियाँ गलत हैं। एक तो होता है अंधा राष्ट्रवाद, कि हम विश्वगुरु हैं, और हम सबसे श्रेष्ठ हैं और ये हैं क्या अमेरिका वाले? वाशिंगटन फाड़ देंगे हम! एक तो ये होता है, ये भी मूर्खता है परले दर्जे की। और दूसरा ये होता है, कि अमेरिका थोड़ी है, वहाँ सब देवी-देवता बसते हैं, स्वर्ग है और वहाँ पर कदम रखते ही बिल्कुल मैं तर जाऊँगा। वो भी दूसरे तरह की मूर्खता है। वहाँ भी इंसान बसते हैं और सौ तरह की कमियाँ और खोट उनमें भी हैं।

हमें ख़ुद पर ध्यान देना है, भीतर से शुरुआत करके बाहर तक बेहतर ही बेहतर होते जाना है। सबका कल्याण चाहना है, सबका भला हो। हम बेहतर बनेंगे तो बेहतर बनने का लक्षण ये होगा कि क्या हम दुनिया के सब देशों को भी बेहतर बना पा रहे हैं।

वैसे भी क्लाइमेट क्राइसिस जैसी चीज़ देश और देश में अंतर नहीं करती है। डिफॉरेस्टेशन कहीं भी हो रहा हो उसका असर आप पर भी पड़ेगा। तो आप ये कह भी नहीं सकते कि अगर मैं बेहतर बनूँगा तो बस अपने ही देश को बेहतर बनाऊँगा। अभी जैसी दुनिया हो गई है उसमें तो सचमुच, वसुधैव कुटुंबकम। आपको अगर बचना है तो आपको पूरे विश्व को बचाना पड़ेगा। और एटॉमिक एक्सप्लोजन अब कहीं भी हो जाए, उसका असर भारत पर भी पड़ेगा। सब कुछ अब जुड़ा ही हुआ है, तो सब हमारा है। हम सबको बेहतर बनाएँगे लेकिन शुरुआत अपने भीतर से करेंगे। ठीक है?

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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