प्रकृति ने ही स्त्री को ऐसा बना दिया है कि उसका देह से बड़ा सरोकार रहता है और उसमें आसक्ति, मोह और ममता पुरुष से कहीं ज़्यादा प्रबलता से मौजूद रहते हैं। यह स्थिति तब और भी बुरी हो जाती है, जब उसे समाज भी संस्कारित कर देता है कि तुम्हारा गहना तो लज्जा और ममता ही हैं। ये चीज़ स्त्रियों ने आत्मसात् कर ली है, अब वो बंधनों का चुनाव ख़ुद कर लेती हैं। अगर स्त्री की ही सहमति न हो, तो पुरुष इतने समय तक और इतनी आसानी से उसको दबाकर नहीं रख पाएगा।
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आचार्य प्रशांत: कोई किसी का शोषण कर नहीं सकता उसकी सहमति के बिना। इतने व्यापक तौर पर तो बिल्कुल भी नहीं, इतने लम्बे समय तक तो बिल्कुल भी नहीं। तो स्त्री के सामने अब ये विकल्प है कि या तो सारा दोष उठाकर के पुरुष के सर रख दे कि हमारी बर्बादी के ज़िम्मेदार तुम्हीं हो। तुम्हीं ने ये सारी गन्दी प्रथाएँ बनाई, शोषक रीति-रिवाज़ बनाए, हमें वस्तु की तरह देखा, हमें पराया-धन समझा, इत्यादि-इत्यादि। तो ये करा जा सकता है और अगर स्त्री ऐसा करती है तो वो गलत भी नहीं कर रही, क्योंकि ऐसा हुआ भी है।
पुरुष ने स्त्री का शोषण भी किया है, उसको चीज़ की तरह भी देखा है, दबा के भी रखा है, जितनी बातें तुमने कहीं वो आज की नहीं हैं वो होती ही आई हैं। तो तुम चाहो तो शिकायत कर सकती हो, पर ये शिकायत वाली बात मुझे कभी बहुत जचती नहीं, क्योंकि शिकायत की शुरुआत में ही कमज़ोरी का भाव है।
तो दूसरी दृष्टि ये है कि तुम देखो कि ये सबकुछ जो हुआ है, उसमे स्वयं नारी का कितना योगदान है? नारी के शोषण में नारी की ही क्या भूमिका रही है? मैं चाहूँगा कि तुम ऐसे देखो, क्योंकि अगर तुम न चाहो तो कोई तुम पर राज कर नहीं सकता है। अगर स्त्री की ही सहमति और मर्ज़ी न हो तो पुरुष इतने समय तक और इतनी आसानी से उसको दबा कर नहीं रख पाएगा।




