
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मेरा एक ऑब्ज़र्वेशन है महिलाओं को लेकर के। उनकी लाइफ़ में ऑब्जेक्ट एक मेल होता है। मेल्स को भी मैंने देखा है, मेरे कलीग्स हैं। उनको भी चाहिए होती है वुमेन फ़ॉर सेक्स। बट अगर कोई फीमेल है, उसकी लाइफ़ में कोई मेल नहीं है या फिर उसकी नहीं बन रही अपने पार्टनर से ठीक से, और वो इस चीज़ को लेकर डिस्ट्रेस्ड है, तो वो जो फ़्रस्ट्रेशन होता है उसकी लाइफ़ में वो हर एक आस्पेक्ट में उसके दिखता है। वो ऑल द टाइम क्रैंकी रहती है, इरिटेटेड रहती है, फ़ील करती है। वो इतना ह्यूज गैप जो मेल और फीमेल में होता है इस पर्टिकुलर चीज़ को लेकर के, जो ऑपोज़िट सेक्स है उसको लेकर के। तो मुझे समझ नहीं आता कि इतना डिफ़रेंस कैसे है।
सेम एज होगा मेल और फीमेल का। उनकी लाइफ़ में अगर पार्टनर्स एब्सेंट हैं, बहुत ज़्यादा डिफ़रेंस होता है उनके बिहेवियर में, उनके काम में, उनकी बातों में। जो बातें करती हैं लड़कियाँ, वो 90% वही होती हैं लड़कों को लेकर के कि कैसे उनको अच्छा पार्टनर मिल सकता है। उनके पार्टनर में क्या कमियाँ हैं। तो मुझे इतना डिफ़रेंस समझ नहीं आता कि इतना क्यों है।
आचार्य प्रशांत: देखो, दोनों को दूसरा पक्ष चाहिए होता है। पर दूसरे पक्ष को जो स्थान देते हैं न, उसमें अंतर होता है। अहंकार को तो पूरा ब्रह्मांड निगलना है। पूरा ब्रह्मांड भी निगलने के बाद उसको भूखा ही रहना है, उसको तो सब चाहिए। स्त्री को भी पूरा ब्रह्मांड निगलना है और पुरुष को भी निगलना है, अहंकार तो अहंकार है। पर एक जो भेद आ जाता है न, वो ये आ जाता है कि पुरुष को जो ब्रह्मांड निगलना है उस ब्रह्मांड में एक विषय है स्त्री, और स्त्री को जो ब्रह्मांड निगलना है वह पुरुष के माध्यम से निगलना है।
निगलना दोनों को है, पर पुरुष सीधे-सीधे सब विषयों को जाकर निगलेगा और उनमें से एक विषय स्त्री भी है। स्त्री माने स्त्रियाँ, दुनिया भर की सारी स्त्रियाँ, उसे सब चाहिए। और स्त्री को भी सब निगलना है। पर वो कहती है, पुरुष मिलेगा तो उसके माध्यम से बेहतर निगल पाऊँगी सब कुछ। तो इसलिए विशेषकर जो भारतीय परिप्रेक्ष्य है, इसमें आप स्त्री को ज़्यादा आतुर देख पाते हो पुरुष के लिए। वो स्त्री नहीं आतुर है पुरुष के लिए, वो अहंकार आतुर है दुनिया के सब विषयों को निगलने के लिए और निगलने का साधन बनता है पुरुष। वास्तव में पुरुष को स्त्री ही चाहिए, पर स्त्री को पुरुष तो चाहिए और पुरुष के माध्यम से बहुत कुछ चाहिए।
पुरुष के लिए बहुत बड़ी माँग होती है स्त्री। वो दोनों की शारीरिक-मानसिक संरचना ऐसी और फिर जो आप उसकी सांस्कृतिक कंडीशनिंग करते हो, वो ऊपर से। तो पुरुष की तो माँग है कि स्त्री मिल जाए, शारीरिक भूख है। स्त्री के लिए पुरुष उतनी बड़ी शारीरिक भूख नहीं है। स्त्री के शरीर की बनावट ऐसी है कि उसको पुरुष की उतनी शारीरिक भूख नहीं लगती, जितनी कि पुरुष को है। तो इसका मतलब ये नहीं है कि स्त्री पुरुष से आज़ाद हो गई, इसका मतलब है कि स्त्री अब पुरुष की शारीरिक नहीं, मानसिक माँग करती है। मानसिक माँग। स्त्री के लिए पुरुष का रोल फ़िज़िकल कम, साइकिक ज़्यादा हो जाता है और पुरुष के लिए स्त्री मास है, फ़िज़िकल है।
पुरुष की ज़िंदगी में स्त्री, ये हम अभी जनरलाइज़ कर रहे हैं। जो पूरा दोनों में अंतर है, जिस भेद की हमने बात करी, वो भेद ऐसा भी नहीं है कि डायमेंशनल है। वो भेद जो है, वो डिग्री का है। ठीक है? शून्य और सौ की बाइनरी की बात नहीं हो रही है। सत्तर और तीस की बात हो रही है कि वो चीज़ दोनों जगह पाई जाती है। पर एक जगह सत्तर, एक जगह मामला तीस का है। तो कोई यह न समझे कि हम यहाँ पर ब्लैक एंड व्हाइट में बात कर रहे हैं।
तो अब पुरुष के लिए स्त्री बड़ी भारी चीज़ होती है। कैसे? फ़िज़िकली। वो फ़िज़िकैलटी उसके बिल्कुल खोपड़े पर चढ़ के नाचती है, तो वह बड़े दाम चुकाने को तैयार रहता है। बड़े दाम चुकाने को तैयार रहता है। मैडम, दरवाज़ा खोलो। ठीक है? चाहे प्रेमिका हो, चाहे पत्नी हो, उसका काम ही यही है कि अपनी उत्तेजना में उसके पास जाएगा। बस यही है, मैडम, दरवाज़ा खोलो।
स्त्री को जब पता है उसकी इतनी माँग है तो उस माँग के एवज़ में बहुत सारा वह लाभ चाहेगी न। वो लाभ तो तभी मिलेगा जब कोई मिले जिसमें माँग हो, तो स्त्री सीधे-सीधे इसीलिए पुरुष को नहीं माँग रही है। वह पुरुष के माध्यम से लाभ माँग रही है। यह उसके अहंकार की प्रक्रिया है। और पुरुष का जो अहंकार है वो एकदम ही पार्श्विक है। उसके लिए स्त्री क्या है? मांस का टुकड़ा है। मैडम, दरवाज़ा खोलो। बात आ रही है समझ में?
और इसीलिए ये दोनों जब भी मिलते हैं, तो इनमें आपस में खींचातानी और संघर्ष और द्वंद्व होकर रहेगा। क्योंकि दोनों समझ ही नहीं सकते कि दोनों एक-दूसरे के लिए क्या हैं। मान लो एक आदमी-औरत एक-दूसरे को आई लव यू बोल रहे हैं। तो उस आई लव यू के भी दो बहुत अलग-अलग मतलब हैं। पर क्योंकि शब्द समान है, तो दोनों को लगता है कि सामने वाले ने वही बोला जो मैंने बोला और जो मैंने सुना, वही उसने सुना। जब पुरुष स्त्री को आई लव यू बोले, तो उसका एक अर्थ है और जब स्त्री पुरुष को आई लव यू बोले, तो उसका थोड़ा अलग मतलब है।
फिर से कह रहा हूँ, ये हम जनरलाइज़ कर रहे हैं। हर स्त्री के साथ ऐसा ही हो, हर पुरुष के साथ ऐसा ही हो, हर रिश्ते में ऐसा ही हो, कोई ज़रूरी नहीं है।
तो अब सोचो, स्त्री के पास कुछ ऐसा है जो पुरुष के लिए बहुमूल्य है। क्या? शरीर? अब उसे पुरुष नहीं मिला, तो यह लगभग ऐसी सी बात है कि चेक है जो कैश नहीं हो रहा। अब फ़्रस्ट्रेशन बढ़ेगा कि नहीं? मेरे पास कुछ ऐसा है जिसका मूल्य बहुत है, पर उससे लाभ नहीं ले पा रही मैं। तो भीतर कुंठा उठेगी कि नहीं?
क्योंकि पुरुष मुझमें क्या? न ज्ञान देख रहा है, न बल देख रहा है, न कौशल देख रहा है, न बोध देख रहा है। पुरुष मुझमें जो देख रहा है वो तो मुझे प्रकृति नहीं दे रखा है, क्या? एक मांसल शरीर। बहुत आसानी से वो चीज़ मुझे मिल गई है और अब पुरुष उस चीज़ के बड़े भारी दाम चुकाने को तैयार है। लेकिन मुझे ऐसा कोई पुरुष मिल नहीं रहा, तो अब भीतर से तनाव और आग तो उठेगी। मिल जाए पुरुष, तो दुनिया भर की नियामतें बरसने लगे। वो मिल गया है और मुझे क्या अर्पण करना है बस? शरीर। और वो शरीर कोई मैंने कमाया नहीं, कुछ नहीं। वो तो अब स्त्री पैदा हुई थी, तो प्रकृति से ही वो शरीर मिल गया और पुरुष इसी पर बिल्कुल जान दिए दे रहा है, फ़िदा हुआ जा रहा है। रुपया-पैसा, सम्मान, सुरक्षा, सब निछावर कर देगा। रानी बनाकर रखेगा, अपने बगल में बिठाएगा, जिस मंच पर जाएगा साथ खड़ा करेगा। न जाने क्या-क्या मिल सकता है मुझे इस शरीर की बदौलत, पर कोई मिल ही नहीं रहा है इस शरीर का लेनदार। ये चल रहा है।
अब प्रश्न ये है कि क्या आवश्यक है कि ये सब चले? प्रश्न यह है कि क्या ये सब चल रहा है, तो इसमें कोई गरिमा है? मैं बोल रहा हूँ, तो यह सुनने में ही भद्दा लग रहा होगा, तो जीने में कैसा लगता होगा? जो चीज़ सुनने में ही भद्दी लग रही हो, कड़वी लग रही हो, लग रही है न कुरूप, बदरंग-सी। “क्या बोल रहे? कैसी बात बोल रहे हैं? लेनदार, देनदार, व्यापार, देह का सौदा। ये कैसी बातें चल रही हैं? छी!” हाँ, छी हैं, बहुत है। एकदम छी है यह बातें। अगर इतनी ही छी! हैं, तो हम इनको जी क्यों रहे हैं? सुनने में छी!-छी! और जीवन में जी। यह क्या बात हुई? बात तो ऐसी ही है।
घर हमारे होते हैं, उसमें लड़कों को बोलते हैं, जा पढ़-लिख, नौकरी कर, डॉक्टर, इंजीनियर, ये-वो। और लड़की को, इसमें भी कोई यह नहीं कि बाइनरी है, पर लड़की को ज़्यादा प्रेरित यह किया जाता है कि रूप-रंग ठीक रख। क्योंकि लड़के को जो मिलना है, वो पढ़ाई-लिखाई, श्रम, ज्ञान, कौशल से मिलना है और लड़की को शरीर से मिल जाना है।
चुटकुले चलते हैं, चुटकुले, कि लड़का-लड़की बात कर रहे हैं, स्कूल के हैं। और लड़की लड़के से पूछती है कि अच्छा, तुम क्या बनोगे? तो बोलता है, पहले यह करूँगा, मेहनत करूँगा, बोर्ड का टॉपर बनूँगा। उसके बाद और मेहनत करूँगा, तो बारहवीं में ऐसा करूँगा। फिर फलानी प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होऊँगा, फिर जाकर के फलानी नौकरी के लिए आवेदन करूँगा। फिर वहाँ जाकर यह करूँगा। फिर अमेरिका जाऊँगा, वहाँ पैसा कमाऊँगा और यह करूँगा। उसके बाद और पढ़ाई करूँगा और और आगे बढ़ूँगा। फिर अपना कारोबार करूँगा और यह कराऊँगा और फिर एक दिन में ऐसे करूँगा, अरबपति बनूँगा।
वो लड़का यह सब सुना देता है, हाँफ जाता है इतने सुनाते-सुनाते। क्या बनूँगा, क्या करूँगा। फिर लड़की से पूछता है, अच्छा, अब तुम क्या करोगी? क्या बनोगी? वो बोलती है, मैं तुमसे प्यार करूँगी और तुम्हारी रानी बनूँगी। खेल ख़त्म।
तो जो काम उसको इतनी मेहनत करके मिला, जिस मुकाम के लिए उसने इतना श्रम करा, अगर लड़की के दिमाग़ में बैठा दिया गया कि वही सब कुछ तुझे बस उसकी रानी बन के मिल जाएगा, तो वो तो रानी बनने को ही दीवानी रहेगी न। और फिर रानी नहीं बन पाएगी, तो भीतर ही भीतर बहुत चिढ़ेगी। ये हम कोई सब स्त्रियों पर लांछन नहीं लगा रहे। हम अपने समाज से सवाल पूछ रहे हैं। ये तुमने क्या कर डाला? ये तुमने आधी आबादी को क्या बना डाला? ये तुमने छोटी-सी बच्ची के भीतर भी कौन-से भाव बैठा दिए? बस यही कि रंग गोरा रख, बाल लंबे रख। मुलायम होना चाहिए।
दो बैठी हो आपस में, वो आधी बातें यही, जैसा आपने कहा, आधी बातें यही कर रही होंगी कि तू रीठा लगाती है, तू शिकाकाई लगाती है और तूने क्या कर दिया? अच्छा-अच्छा, तूने नाक में अंडा घिसा है। हँसने की क्या बात है और क्या होता है? खीरे से दाँत माँझ लो। पता नहीं क्या कुछ बहुत होता है, काफ़ी चीज़ें होती हैं। अनुभवी लोग जानते होंगे। यह कोई बातचीत के मुद्दे हैं, सोंठ, हीरा, खीरा, हीरा भी, हीरा भी? तिल का तेल किस कान में डालना है, फिर कहाँ से मुँह से निकलेगा, उससे बिल्कुल एकदम ख़ूबसूरती छा जाएगी। ये कोई बातें हैं? क्या है ये? कुछ भी सोच लो, जो भी सोच लो, सब चलता है। चाय बनाने के बाद चाय की पत्ती को लेकर क्या कुछ, क्या? नाक में डाल लीजिए। और कुल मिलाकर के जो कुछ करा जा रहा है, किस हेतु? और आकर्षक हो जाओगे।
हवस वही है जो पुरुष की है। क्या? पूरा ब्रह्मांड निगल जाना है, पर पुरुष बस ये कह रहा है कि पौरुष के दम पर निगलूँगा और महिला को पट्टी पढ़ा दी गई है कि तू अपने आकर्षण के दम पर निगलेगी पूरे ब्रह्मांड को। चाह तो दोनों एक ही बात रहे हैं। ये अपमान है, इंडिग्निटी है।
ठीक वैसे जैसे मैं पुरुषों से कहा करता हूँ कि लानत है तुम पर, तुमने महिला को शरीर की तरह, मांस बना लिया। सामने से स्त्री आती है, तुम्हें गोश्त दिखाई देता है। ठीक उसी तरह स्त्रियों से कहा जाना ज़रूरी है कि तुमने उसको क्या बना लिया है? वॉलेट, एटीएम, बैंक अकाउंट, पहरेदार, बॉडीगार्ड, सोशल सिक्योरिटी। तुम कैसे देख रही हो उसको? तुम्हें भी क्या इंसान दिखाई दे रहा है, जब तुम पुरुष को देख रही हो?
अगर पुरुष स्त्री को देख रहा है और उसको बस मांस दिखाई दे रहा है, तो पुरुष को जब स्त्री देख रही है और उसको बस डेबिट कार्ड दिखाई दे, तो ये बराबर की तौहीन है। और आप कह सकती हैं कि नहीं, हम लालची नहीं हैं, हमें डेबिट कार्ड नहीं दिखाई देता। डेबिट कार्ड नहीं दिखाई देता, लठ दिखाई देता है। लठ कौन-सा? सुरक्षा वाला। क्योंकि हमारे यहाँ यह भी तो है कि वह उसको इतना कमज़ोर बना देते हो कि उसको हर समय ख़याल बस यही रहता है कि कोई मिल जाए मर्द-मानुष, जो बगल में चले, तो हमारी रक्षा हो जाएगी और बगल में ना चले, तो हमसे तो बाज़ार निकलने भी नहीं बनता। शाम को 7:00 बजे भी इधर-उधर जाते डर लगता है। तो ब्याह कर लो, तो कम से कम एक अंगरक्षक मिल जाएगा। ये क्या तरीका है किसी पुरुष को देखने का?
और इस लेन-देन में दोनों की दुर्गति है, पर ज़्यादा दुर्गति महिला की है। दुर्गति तो दोनों की है, पुरुष को तो समझ में भी नहीं आता। पुरुष सोचता है, मुझे महिला का शरीर चाहिए। तो उसके खोपड़े में नहीं समाता, वो सोचता है जैसे मुझे उसका शरीर चाहिए, तो वैसे उसको मैं अपना शरीर दे रहा हूँ, तो बात तो बराबर हो गई, सौदा निपट गया। उसको पता ही नहीं कि निपटा नहीं है, अभी तो शुरू हुआ है।
पुरुष सोचता है कि ये तो भाई, सेक्स हुआ है। तो कंसेंसुअल सेक्स हुआ है, दोनों तरफ़ से हुआ है। सेक्स मैंने किया है, तो तूने भी तो किया है। बात बराबर की हो गई। इक्वेशन सेटल्ड, बैलेंस्ड। नहीं है बैलेंस्ड। पुरुष सोचता है कि निपट गया, महिला कहती है कि अभी तो चालू हुआ है। अभी मैंने हिसाब बराबर नहीं किया, अभी तो मैंने बस देनदारी बढ़ाई है तेरी। अब तेरी देनदारी बढ़ गई है, अब तू इसको चुकाएगा। कैसे चुकाएगा? बहुत सारी चीज़ें दे-देकर चुकाएगा। और पुरुष के ये खोपड़े में ही नहीं आता। वो कहता है, अभी चढ़ क्यों रही है मेरे ऊपर इतने हक़ से? जैसे मैं कर्ज़दार हूँ इसका। हाँ भाई, तू उसकी नज़र में कर्ज़दार बन चुका है, जग जाओ पप्पूओं। तुम दोनों के बही-खाते अलग-अलग चलते हैं।
वो एक गाना है, “जुम्मा चुम्मा दे दे”, तो वो पूछ रही है उससे कि चुम्मे के बदले में क्या दोगे, बोलो तो। तुम प्रश्न की गंभीरता को समझो। तो वो बोल रहा है, लेना क्या देना क्या, चुम्मा दो चुम्मा लो। यह पुरुष और स्त्री की मानसिकता का फ़र्क़ है। वो जब चुम्मा दे रही है, तो उसके बदले में बहुत कुछ चाह रही है, तो वो बेचारा सीधा-सादा जानवर, चिंपैंजी। वो कह रहा है, लेना क्या देना क्या? चुम्मा दो चुम्मा लो। चुम्मा ख़त्म। तो उसके हिसाब से ट्रांजैक्शन ख़त्म। ट्रांजैक्शन ख़त्म नहीं हुआ है। शुरू हुआ है।
अब वह कहेगी, तूने चुम्मा लिया था। वह कहेगा, लिया नहीं था। वह तो आपस का था, आदान-प्रदान था। वो कहेगी, नहीं, तूने लिया था, अब बदले में यह भी कर और यह भी कर और यह भी कर और यह भी कर। और नहीं करेगा, तो तो तू तो विशाल है, गोरिल्ला है। तेरा कुछ कर नहीं सकती, मैं अपना सर फोड़ लूँगी। पुरुष को समझ में नहीं आता, ये क्या हो रहा है। अब न्यूरोसिस शुरू हुआ है दोनों तरफ़ से। अब मनोरोग बढ़ेगा, अब यह दोनों मेंटल पेशेंट बनेंगे। बात आ रही है समझ में? सौदा सीधा-सादा रखो न। श्रीकृष्ण कहते हैं न, सरल काम। कैसा? सरल काम।
चलो, ठीक है, तुमने जो भी उम्मीदें बाँध रखी हैं, कम-से-कम बता तो दो। ये क्यों कहते हो, “बट इज़ंट इट ऑब्वियसली अंडरस्टुड? इज़ंट इट कॉमन सेंस?” नहीं भाई, वो मूर्ख होता है। वो गोरिल्ला है, वो जानवर है, उसके कॉमन सेंस नहीं होती। तुम जो भी चाहती हो, उसको खुलकर शब्दों में बयान कर दो, वो बेचारा चुम्मा वग़ैरह लेकर बहुत पछताता है बाद में। वो कहता है, “कहाँ फँस गए?” पिछले कुछ मिनटों में मैं एक पूर्वाग्रहग्रस्त पुरुष था। ऐसे ही थोड़ी आचार्य बन गया, ज़िंदगी के कितने अनुभवों से गुज़रा हूँ। बात आ रही है समझ में?
पहली बात तो इतनी ईमानदारी होनी चाहिए कि पता हो कि भीतर क्या पक रहा है। साधारण आत्मज्ञान, इतना तो हो। वह होता है, तो फ़ालतू कामनाएँ पकती नहीं हैं। पर अब मान लो, तुम कामना बनाए ही बैठे हो किसी को ले, तो कामना जब रिश्ते का रूप ले रही है, तो कम-से-कम कामना स्पष्ट तो कर दो। बताते भी नहीं हो और दोनों ही पक्ष नहीं बताते। एक की नहीं बात कर रहा हूँ। वो कौन-सा बड़ी ईमानदारी से बोल देता है कि देखिए, मुझे तो... वो भीनहीं बोलता। पर इधर से तो एकदम ही नहीं बोला जाता। महिला सोचती है कि वह समझ ही गया होगा या कभी सोचती होगी, शायद कि मैं बहुत चतुर-चालाक हूँ। चतुर-चालाक नहीं हूँ, ज़्यादा नुकसान तुम्हारा ही हो रहा है।
स्त्रियों की हालत की ओर देखो न, सारे सूचकांक उपलब्ध हैं। हर तरीके से स्त्रियों की दुर्दशा है। आप जो सौदा कर रही हैं, अगर मुनाफ़े का होता, तो क्या आपकी इतनी दुर्दशा होती? बताइए। आ रही है बात समझ में कुछ?
पर-निर्भरता से बड़ा पाप कोई नहीं होता। पहले तो तुम्हारे अरमान ख़राब। अरमान क्या है? पूरा ब्रह्मांड निगलना है। और वह निगलना भी कैसे है? पर-निर्भर होकर के। अब इसके बाद ज़िंदगी तुम्हें माफ़ करेगी क्या? करेगी? इसलिए बोलता हूँ कि महिलाओं को अगर कोई मुक्ति दे सकता है, तो स्वयं महिला ही। हर मनुष्य अपने प्रति स्वयं ही उत्तरदायी है, और यह तो कभी सोच मत लेना कि किसी पुरुष के माध्यम से मुक्ति वग़ैरह मिलेगी, नहीं मिलेगी। पुरुष तुम्हारे जीवन में तुम्हें मुक्ति देने नहीं आता। तुम्हें पता है क्या देने आता है? काहे के लिए ख़ुद को बुद्धू बनाना?
एक कमज़ोर-सी चीज़ बनकर रह जाती हो। क्या? एक कमज़ोर-सी चीज़। पहली बात तो चीज़, चीज़ माने चेतना की कमी। पदार्थ, वस्तु, देह, चीज़। तू चीज़ बड़ी है, मस्त-मस्त, चीज़। एक चीज़ बनकर रहेगा, वो चीज़ भी कैसी? दुर्बल, कमज़ोर-सी चीज़। छी! ऐसे तो नहीं जीना न, कमज़ोर-सी चीज़ बनके तो नहीं जीना न।
एक काम करो, लड़की हो, स्त्री हो, एक काम करो। पहली बात तो अपने अरमान बड़े विवेक से तोलो। कौन-सी कामना रखने लायक है, कौन-सी नहीं? और दूसरी बात, किसी भी कामना के लिए किसी दूसरे को साधन मत बनाओ, ख़ासकर पुरुष को तो एकदम नहीं।
मुझे बड़ी गाड़ी चाहिए, हस्बैंड दिलाएगा। नहीं। पहली बात तो तुम्हें उतनी बड़ी गाड़ी चाहिए क्यों? चलो, हमने मान लिया, तुमने बहुत छन्नी से छान करके फ़ैसला करा है, बड़े विवेक से कि तुम्हें उतनी बड़ी गाड़ी चाहिए। चलो, माना। माना एक बार को। चाहिए तो ख़ुद कमाओ, हस्बैंड नहीं दिलाएगा, ख़ुद कमाओ।
“नहीं, मुझे उड़ाना अच्छा लगता है, उड़ाना अच्छा लगता है।” उड़ाओ, पहले कमाओ। और मत भूलना, अगर कोई अभी तुम्हारे ऊपर उड़ा रहा है, तो वो मूर्ख नहीं है। न वो निष्काम है, न निस्वार्थ है। वो या तो वसूली कर रहा होगा या वसूली की उम्मीद है। मोह में इतने अंधे मत हो जाओ कि सोचने लग जाओ कि प्यार मिल गया है। वो इसलिए मुझ पर न्योछावर हो रहा है। वो प्यार-व्यार पे नहीं न्योछावर हो रहा है, वो बिस्तर पर न्योछावर होगा।
नॉलेज इकॉनमी है, भाई, दुनिया अब। ठीक? जो काम बाहुबल के होते हैं, उनमें तो वैसे भी ज़्यादा पैसा नहीं होता। होता है? अभी भी काम होते हैं, जैसे रिक्शा चलाना है। उसमें मसल्स ही मसल्स लगती हैं, तो उसमें पैसा भी ज़्यादा नहीं होता। बोझ उठाना है, उसमें भी बस मांसपेशियाँ लगती हैं, तो उसमें पैसा भी ज़्यादा नहीं होता। आज की दुनिया तो ज्ञान पर चलती है न, ज्ञान पर। और ज्ञान को लेकर तो आपके पास कोई बाधा नहीं है, कि है? फ़िज़िकल कुछ हैंडीकैप हो सकता है। कॉग्निटिव हैंडीकैप तो नहीं है न।
और फ़िज़िकल हैंडीकैप भी यही है कि कंधे कम चौड़े होते हैं। क़द थोड़ा छोटा होता है। यही तो है। तो उससे तो आज की दुनिया का कोई काम होता भी नहीं। कौन-सा दुनिया का आज का काम आपके कंधों की चौड़ाई से होता है? आज की दुनिया के तो सारे काम कहाँ से होते हैं? (बुद्धि)। और ये तो कम नहीं है आपके पास। यह कम नहीं है, तो किसी दूसरे पर आश्रित क्यों होना चाहती हो? जब यह है, तो इससे तुम्हें ताक़त भी आ जाएगी, पैसा भी आ जाएगा। दुनिया में तुम्हारा स्थान भी इसी से बन जाएगा। किसी पुरुष की राह क्यों तकनी है? कुछ आ रही है समझ में बात?
यह कोई बड़ी शोभनीय छवि नहीं होती है कि बाइक में किसी के पीछे बैठ गए हैं और बड़ा अच्छा अनुभव कर रहे हैं। उसे कंधे पर हाथ रख लिया। यहाँ नॉलेज पार्क है, यहाँ जब भी आता हूँ, तो ऐसे नज़ारे देखता हूँ। उसी लड़के की बाइक होगी, उसके पीछे वो बैठ जाएगी। वो बहुत ख़ुश अनुभव करेगी कि देखो, मुझे ही बाइक मिल गई। वो जब चाहेगा उतार देगा। तू ही चला ले, क्या प्रॉब्लम है अपनी? उसी के इंस्टिट्यूट में है शायद, उसी के डिपार्टमेंट में है, तू भी खरीद ले। और अभी नहीं ख़रीद सकती, तो बेकार में किसी की बाइक पे चढ़ भी मत।
क्या समस्या है? क़द की समस्या है। बाइकें आती हैं वो, जिनमें कि आप ऐसे भी बैठ जाओगे। कम क़द के हो, तो भी काम चल जाएगा। ब्रूज़र्स होती हैं, वो ले लो। लड़का आए कि तो लड़की आए। कोई आए, बोलो, पीछे बैठो, मैं चला रही हूँ, तुम पीछे बैठोगे। क्या होगा? गिरा ही तो दोगे। गिरा दो ससुरे को, बला टले। ख़ुद हेलमेट पहन लेना बस।
नहीं, सही में, वो एक बड़ी टेलिंग पिक्चर होती है। वो तस्वीर, उसके ज़ुबान है, वो चीखती है। जब आप देखते हो कि वो बाइक है और और कई बाइकें आती हैं, जिनमें जो पीछे वाली सीट है, वह इतनी ऊपर होती है आगे वाली से। उसमें उसको धारण कर लेगा, बैठा लेगा। वो बैठ जाएगी और फिर वो ज़ोर से ब्रेक मारेगा, तो एकदम उछल के उसके कंधे पर चढ़ जाएगी। हँसने की बात नहीं है, ये आने वाली ग़ुलामी का सूचक है।
बराबरी का रखो न, वैसे तो इक्वलिटी चाहिए। ठीक है कभी तेरी बाइक पर बैठ जाऊँगी, कभी तू मेरी बाइक, नहीं तो मेरी स्कूटी पे बैठ पीछे। तू भी पीछे बैठना सीख और मैं सीखूँगी आगे चलाना। निर्भर क्या होना है? और तेल भी अपना ख़ुद ही डलवा लूँगी, तुझसे थोड़ी कह रही हूँ। सामने खाने जा रहे हो, बड़ा अच्छा लगता है। बिल वो दे रहा है। मत करो यह सब। गिफ़्ट्स, प्रेज़ेंट्स या तो स्वीकार मत करो या अगर ले रहे हो, तो उसी अनुपात में दो भी।
इन सब बातों को न, आपने वो जो सिंड्रेला वाली कहानी बना रखा है और ख़ुश हो जाते हो। तो आप समझ ही नहीं रहे कि वो सब कितनी गड़बड़ बात है। प्रिंस चार्मिंग जो मेरे लिए ये लाता है, वो लाता है। कितना अच्छा लगता है। “ओह माय गॉड! डायमंड्स।” ले मत लेना और ले रखा हो, तो लौटा दो, और ये इसका मतलब ब्रेकअप नहीं होता। इसका मतलब होता है कि रिश्ता अब ज़्यादा स्वस्थ हो रहा है, कि हमारा-तुम्हारा रिश्ता अब इस डायमंड के लेन-देन पर नहीं है। ये मैं तुमको लौटा रही हूँ। रिश्ता नहीं लौटा रही, रिश्ता रहेगा, भाई।
अगर मेरी औक़ात इतनी ही है कि मैं एक साधारण पत्थर ही पहन सकती हूँ, तो मैं साधारण पत्थर पहनूँगी। और तुम अगर मेरी मदद करना चाहते हो, तो मुझे इस लायक बनने में सहायता दो कि मैं ख़ुद अगर हीरा ख़रीदना चाहूँ, तो ख़रीद सकूँ। तुम मुझे ख़रीद के हीरा मत दो। मुझे इस लायक बनने दो कि मैं ख़ुद हीरा ख़रीद सकूँ। वैसे हीरों में कुछ रखा नहीं है। मैं यहाँ ज्वेलरी की दुकान नहीं चला रहा कि कई लोग बड़े आतुर हो रहे हैं। हीरा-वग़ैरह, कुछ बात हो रही है। बेकार की चीज़ है हीरा-वीरा, ख़रीद मत लेना। आ रही है बात समझ में?
एकदम पुलक उठ जाती है न, मेरे लिए नेकलेस ले आया। अरे, फंदा है वो, पागल। मेरे लिए कड़े ले आया और कंगन ले आया। हथकड़ी है वो। और अगर तुम ले रहे हो वो सब कुछ, तो फिर कह रहा हूँ, जितना लिया है उतना दो भी। अगर तुम्हारा आग्रह है कि प्रेम का उपहार है, तो प्रेम तो फिर तुम्हें भी है न उससे, तो तुम भी उपहार दो। तुम क्यों नहीं उपहार दे रही?
हम बैठेंगे, कोई गाड़ी चला देगा; हम बैठेंगे, कोई दरवाज़ा खोल देगा। ये सब शुरू-शुरू में होता है, बाद में फिर पाँव दबाती हो। शुरू में इसी बात पर एकदम आगाह गई थी। अरे, हमारे लिए यह कर दिया, हमारे लिए वह कर दिया। वही फिर बाद में, अरे, चल, चाय लेकर आ। इनके (जानवर) यहाँ नहीं होता ये सब, ये अच्छे हैं, इनके यहाँ मामला सब ठीक रहता है, प्राकृतिक है। यह सब मनुष्यों की संस्कृति है, जिसने इतनी गंदगी फैलाई है। आ रही है बात समझ में?
छोटी-छोटी बातों में सतर्क रहो कि किस तरीके से तुम अपने आप को पराधीन बना रही हो। कि अपने कलीग से ये कहना कि अब रात बहुत हो गई आज ऑफिस में। चलो, मुझे घर तक ड्रॉप कर दो। क्यों? कल को तुम्हारा प्रमोशन हो गया, तुम उसकी बॉस बन गई हो। वह तुम्हारी सुनेगा? जिसको कल तुमने कहा था कि मुझे सिक्योरिटी के लिए प्लीज़ मेरे घर तक ड्रॉप कर दो। अब वह कभी तुमसे सबोर्डिनेटेड होना पसंद करेगा? स्वीकार करेगा?
और लालची होने को मैं किसी को कभी नहीं कहता, लेकिन पैसा कमाओ। विशेषकर महिलाओं से कह रहा हूँ। और उसके लिए कुछ सद्गुण भी चाहिए होते हैं, विकसित करो। पैसा ऐसे ही आसमान से नहीं टपकता। वो भी ध्यान माँगता है, अनुशासन माँगता है, श्रम माँगता है, करो। बिना पैसे के आप कुछ नहीं हो। किसी मुग़ालते में मत रहो और किसी दूसरे का पैसा आपका पैसा नहीं होता, तो नहीं होता। क्यों ग़लतफ़हमी पाल के बैठी हो? भले ही क़ानून भी ये कह दे कि पति का आधा पैसा आपका है, तो भी मत मानो। कहो, सिर्फ़ मेरा उतना है जितना मेरा है।
अच्छा, एक सवाल है यहाँ पर आप में से, विशेषकर महिलाओं से। चलो, सब दोनों से कर लेता हूँ। कुछ यहाँ पर विवाहित हैं, कुछ विवाहित होने जा रहे हैं। आप में से कितने लोग अपने आपको मोर ऑर लेस टिपिकल हस्बैंड या टिपिकल वाइफ़* देख पा रहे हो कि मैं वैसा ही हूँ। लगभग 70-80% कम-से-कम, जैसे कि बाक़ी सब हस्बैंड या वाइफ़ होते हैं। और जिनकी शादी होने जा रही है, वो अपने आप से पूछें कि वो जब अपने भावी वैवाहिक जीवन को देखते हैं, तो क्या अपने आप को एक टिपिकल हस्बैंड या टिपिकल वाइफ़ की तरह नहीं देखते। ऐसे कितने लोग हैं, जिनके जीवन में वो टिपिकैलिटी मौजूद है। वो वो टिपिफ़ाइड हैं।
यह बहुत-बहुत ख़तरे की बात है। क्योंकि वह जो टाइप है न, वह जो टाइप है, वह आपने इज़ाद नहीं करी है। वो टाइप हवाओं में थी और आपने उसको जीना शुरू कर दिया और आप टिपिकल हो गए। जब आप बोलते हो न, “आई ऐम अ नॉर्मल हस्बैंड” और “आई ऐम अ नॉर्मल वाइफ़” और “आई ऐम अ नॉर्मल गर्लफ़्रेंड।” यह जो नॉर्मलसी है यह बहुत-बहुत ख़तरनाक है। इसका मतलब कि जितना कूड़ा है समाज का और परंपरा का, वह सब आप जी रहे हो और इसीलिए अपने आप को नॉर्मल बोल रहे हो। नॉर्मल माने क्या? जैसे सब, वैसा मैं। यही तो होता है न नॉर्मल। अगर आप अपने रिश्ते में नॉर्मल हो, तो यह बहुत ख़तरे की बात है।
स्त्री-पुरुष साथ रहेंगे, उनका जोड़ा बनेगा। यह कोई दुख की बात नहीं होती है। यह एक प्राकृतिक बात होती है। यह कोई अफ़सोस मनाने की बात नहीं होती है। यह कोई विरोध जताने की बात नहीं होती। अध्यात्म इसलिए नहीं है कि स्त्री-पुरुष तक कहे कि चलो, अलग-अलग बैठो, ऐसे करो, अपना-अपना। यह सब नहीं होता। लेकिन रिश्ता कैसा हो, इस पर हम सबको गहन पुनर्विचार करने की बहुत-बहुत ज़रूरत है। हो सकता है आप एक-दूसरे के साथ पाँच महीने से हो या पाँच साल से या हो सकता है पचास साल से। लेकिन आप किस अर्थ में एक-दूसरे के साथ हो? क्या बनकर एक-दूसरे के साथ हो? यह पूछना बहुत ज़रूरी है। इस रिश्ते का आधार क्या है? और यह रिश्ता बड़ी महत्त्वपूर्ण चीज़ होती है।
और क्या आपके दिमाग़ में घूमता है? क्या बोल रहे थे कबीर साहब? “सजन, परिवार, सुत दारा।” इन सबका तो संबंध उसी जोड़े से है, यही तो ज़िंदगी बन जाता है, यही तो हर समय विषय बन के खोपड़े में नाचता है, यही तो है। तो जब यह बुनियादी चीज़ ही ठीक नहीं होती है, तो सब तिरबत्तर हो जाता है।
समस्या क्या आती है फिर? कि जो जमा-जमाया, सदा-सधाया मॉडल है वो हमें आसानी से उपलब्ध है। हम कहते हैं, ऐसे-ऐसे हुआ है, ऐसे-ऐसे हुआ। पुरानी किताबों में लिखा है, पुराने ग्रंथों में भी लिखा है कि यह एक ब्लूप्रिंट होता है मैन-वुमन रिलेशनशिप का। तो चलो, हम भी वैसे ही जीते हैं। हम भी वैसे ही जीते हैं। जैसे हमारे दादी-दादा जीते थे या माँ-बाप जीते थे या फ़िल्मों के किरदार जीते हैं, वैसे ही हम भी जीते।
तो वहाँ पर आपको एक मॉडल, एक योजना, एक सैंपल उपलब्ध है, जिसको आप स्वीकार कर लेते हो एक आइडियल की तरह। और जब मैं कहता हूँ वैसा नहीं होना चाहिए, तो आपके लिए उलझन खड़ी हो जाती है। क्योंकि अब आप नहीं जानते कि फिर कैसे बर्ताव करूँ मैं अपनी पत्नी से कि फिर वह जो मुझे लड़का पसंद आ रहा है, मैं क्या सोचूँ भविष्य के बारे में, कि इससे रिश्ता क्या रखना है। फिर आप परेशान हो जाते हो। फिर आप कहते हो, इस परेशानी से अच्छा है कि जो परंपरागत मॉडल चला है, उसको ही स्वीकार कर लूँ।
मैं चाहता हूँ, आप परेशानी उठाएँ। मैं नहीं कह रहा हूँ कि रिश्ता न हो या टूटे, लेकिन आप उस पर पुनर्विचार ज़रूर करें कि उसको किस तरह से रखना है। किसी चीज़ पर पुनर्विचार करना, उसको तोड़ने की साज़िश तो नहीं होता न। तो आप डर क्यों जाते हो इतना? दम नहीं है क्या ज़रा भी रिश्ते में? लगता तो ऐसा ही है।
ज़रा-सा मैं बोलता हूँ कि रिश्ते को ग़ौर से देखो और आप इल्ज़ाम लगाने लगते हो कि अरे, रिश्ता हमारा तोड़ोगे क्या? ये क्या बात है? आप डॉक्टर के पास आए हो और वो आपका ऐसे पेट दबा-दबा के देख रहा है, तो आप उसको यह बोलोगे कि तू तो मेरा पेट फाड़ देगा। वो इसलिए आपके ही पेट में दर्द है। आप गए हो, कह रहे हो यहाँ चोट लग गई है। तो अब *डॉक्टर *वहाँ छुएगा, थोड़ा देखेगा न। तो आप कहोगे, तूने मेरा हाथ तोड़ दिया। वो तो परख रहा है और आपसे भी कह रहा है, आप भी परखो, डायग्नोसिस करो, डरो मत।
जब यह चीज़ इतनी ज़रूरी होनी है, तो नौकरी के बाद जो समय होता है, वह तो इसी में जाता है। कई बार तो नौकरी के दरमियान भी आपका समय इसी में जाता है। और यही अगर ठीक नहीं है आपका मामला, तो क्या होगा ज़िंदगी का फिर? कौन-कौन लोग पाते हैं कि उन्होंने ये स्त्री-पुरुष वाले चक्कर में जीवन का बहुत सारा समय और ऊर्जा गँवाया है या गँवा रहे हैं अभी भी। ये देखो। किसी का हाथ नहीं भी उठा, ऐसा भी कोई है। बाबा जी का ब्रह्मचारी कौन है? बताओ भाई। इस मोर्चे पर मात अगर खा ली, तो बाक़ी सब मोर्चों पर हार मिलेगी। फ़ालतू रिश्ता मत बना लेना। पुरुषों से भी कह रहा हूँ और स्त्रियों से और ज़्यादा कह रहा हूँ।
देखो यार, दुनिया के लोग कैसे होते हैं पता है न। हम भी कैसे हैं, पता है न। अब यहाँ कौन है ऐसा है, जिसको पकड़ के उसके पाँव पखारने लग जाओगे? यहाँ कौन है ऐसा? इसको कहोगे कि ओ, तू तो ऐसा है, महान है, देश की शान है। कौन है? कौन है? बस ऐसा ही है। काहे के लिए फ़िदा हुए जा रहे हो? काहे के लिए जान दिए दे रहे हो?
मैं नहीं कह रहा हूँ कि एकदम छुपा के रखो अपने आप को कि कुंवारे रहने हैं, सिंगल हैं, बैचलर हैं, ऐसे जीना है। मैं जो कह रहा हूँ, समझ में आ रहा है न? आधा समय तो मेरा सफ़ाई देने में बीत जाता है। ऐसे-ऐसे तो लोग हैं कम्युनिटी में। अभी मैं उठूँगा, तो यह बोला है, सत्र ख़त्म होने से पहले इसकी रील बन के इंस्टाग्राम पर पहुँच चुकी होंगी। अभी बोल रहा हूँ, वो इसी (चलते हुए सत्र से) से रिकॉर्ड करके वहाँ पर डाल भी देते हैं।
बताओ, ऑफ़िशियल चैनल पर स्ट्राइक पड़ गई। क्योंकि जो मैं बोल रहा हूँ, वो ऑफ़िशियल चैनल पर जाए, इससे पहले धुरंधरों ने अपने-अपने पर डाल दिया। तो जो ऑफ़िशियल चैनल पर गया, तो वो आप चोरी का कंटेंट डाल रहे हैं, वो तो उनका है। तो इसलिए सफ़ाई देनी पड़ती है। पता नहीं कौन उसमें से क्या दो-चार मिनट का निकाल के कहाँ चिपका दे।