स्त्रियाँ भावना को अपना हथियार और देह को अपनी पूँजी समझती हैं। इन्हीं दो के कारण वो इतिहास में लगातार पीछे रही हैं और गुलाम रही हैं। जबकि स्त्री को प्रकृतिगत कुछ गुण मिले हुए हैं, जो पुरुष के पास नहीं होते। स्त्री में धैर्य और समर्पण ज़्यादा होता है, महत्वाकांक्षा कम होती है — ये बड़े गुण हैं। इस गुण के कारण वो किसी भी काम में बहुत आगे जा सकती हैं। देह सजाने की जगह अपने व्यक्तित्व में ऐसी रोशनी लाइए कि दुनिया को आपकी ओर देखना पड़े।
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आचार्य प्रशांत: भावनाओं से ख़बरदार रहना, ख़ासतौर पर स्त्रियों के लिए बड़े-से-बड़ा झंझट होती हैं भावनाएँ। बात-बात पर आँसू निकल पड़े, भावनाओं पर कोई समझ ही नहीं, कोई बस ही नहीं और फिर इसीलिए स्त्रियाँ ग़ुलाम हो जाती हैं। आपकी भावनाएँ बहकाकर के कोई भी आपको नियंत्रित कर लेता है, गाय बना देता है। आप दुनिया को देखिए न! बेचारी स्त्रियाँ किसी क्षेत्र में अग्रणी नहीं हो पाईं। राजनीति में देखिए, नहीं दिखाई देंगी। कला में देखिए, कम दिखाई देंगी। विज्ञान में देखिए, कम दिखाई देंगी। वो घरों में बस दिखाई देती हैं और इसमें बहुत बड़ा योगदान भावनाओं का है। वो भावुक ही पड़ी रह जाती हैं और कुछ नहीं कर पाती ज़िन्दगी में।
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”
औरत के लिए यही पंक्तियाँ हैं, क्या? “अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।” इन दो चीज़ों के अलावा स्त्रियों के पास कुछ होता ही नहीं— दूध और आँसू।
प्रश्नकर्ता: आँसुओं से बाहर कैसे निकला जाए और स्वयं को मज़बूत कैसे किया जाए?




