आजकल की जो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं, बोलती हैं कि धर्म का मतलब ही है नारी शोषण। नहीं, ऐसा नहीं है। धर्म के केंद्र पर जो ऋषि बैठे हैं, उन्होंने अपनी ओर से कभी भेदभाव नहीं किया। यह भेदभाव उस समाज ने किया है, जो कृषि और बाहुबल आधारित था। आज सौभाग्य की बात यह है कि महिलाओं के लिए ऊर्जा बाजुओं से नहीं आती, मस्तिष्क से आती है। तो परम आवश्यक है कि उनके हाथ मजबूत रहें और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहें।
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मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।
हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक ३२
प्रश्नकर्ता: इसमें मेरे दो प्रश्न हैं। पहला तो यह कि आखिर हर ऋषि कहीं-न-कहीं स्त्री को ही निम्न कोटि में डाल करके बात करता है। दूसरा — कई बार आपने समझाया है कि यह मन की ही दो स्थितियों की बात है, अगर ऐसा भी है तो इस स्थिति में उपमा के तौर पर स्त्री को ही इतना नीचे के तल पर रखकर बात क्यों की जाती है? और अगर ऐसा कुछ है वास्तव में, तो स्त्री होने के नाते ध्यान रखने वाली चीज़ क्या है?
आचार्य प्रशांत:







