महिला दुनिया के हर उस काम में बराबर हो सकती है, जहाँ मनुष्य देह नहीं, चेतना है। वो ज़बरदस्त बॉम्बिंग कर सकती है। वो बेस्ट फाइटर पायलट हो सकती है। पर उससे कहो, “नहीं, तुम्हें दुश्मन की सीमा में घुसकर मुक्कों से मारना है।” तो वो ये नहीं कर पाएगी, क्योंकि मुक्का देह है और फाइटर प्लेन दिमाग है। महिला का पहला बंधन तो उसकी देह ही है। देह से स्वार्थ मत बाँधो। अपने शरीर को न तो अपनी पूँजी मानो, न अपना हथियार। ज्ञान शरीर से बहुत ऊँची बात है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम छवि है। मेरा प्रश्न ये है कि जो पैट्रिआर्की है, मुझे पहले लगता था कि वो समस्या है पर धीरे-धीरे पता चल रहा है कि जो बंधन है, वो मेरे मन में है। जब मैं उसको तोड़ने की कोशिश करती हूँ, तो बहुत ज़्यादा विरोध आता है। जैसे कि रात में जब समय हो जाता है 9:00 बजे के बाद, तो मुझे लगता है कि इस समय के बाद मुझे घर पर होना चाहिए। जब एक सर्टन टाइम हो जाता है, तो अंदर से ही मन में विरोध आने लगता है।
इवेन मेरे पेरेंट्स कुछ नहीं कह रहे हैं, बाहर से कोई रोक नहीं रहा है, पर मन ही रोक रहा है। ये चीज़ में, जैसे सिस्टर है छोटी, मैं उस पर भी वो डालने की कोशिश करती हूँ। अगर जैसे वो बाहर है, वो जॉब करती है, अगर वो लेट आती है घर पर तो उस चीज़ को भी मेरा मन रेज़िस्ट करता है। मेरी कोशिश रहती है कि मैं उसको भी रोकूँ, उसको ये कहूँ कि नहीं, इतने टाइम पर उसको घर आ जाना चाहिए। मेरी मेन समस्या यही है कि जो पैट्रिआर्की है, वो मेरे मन में बहुत ज़्यादा घर कर चुकी है। मैं कोशिश करती हूँ कि मैं एक संस्कारी लड़की की तरह बिहेव करूँ, चुप रहूँ, ज़्यादा ना बोलूँ, लोगों के सामने ना आऊँ। ये मेरी मेन समस्या है।




