धन माने जिसकी अपनी कोई चेतना नहीं। धन माने जो सदा किसी और के स्वामित्व में रहेगा, वो धन है। धन कभी बोल नहीं सकता कि मैं अपने हिसाब से खर्च होऊँगा। धन ऐसा बोल सकता है? धन माने वो जो किसी की प्रॉपर्टी है। और अगर आपको किसी का इस्तेमाल अपने हिसाब से करना है, तो बहुत ज़रूरी है कि उसकी चेतना उससे छीन कर उसे ऐसे ही जड़ बना दो। बात ये नहीं है कि स्त्री पराया धन है, कि अपना धन है — वो धन क्यों है? किसी का धन नहीं है वो, वो एक स्वतंत्र चेतना है, मनुष्य है।
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प्रश्नकर्ता: सर, आप फ़ीमेल्स के लिए बहुत ज़्यादा वोकल(मुखर) हैं। तो जब हम महिलाओं के लिए बोलते हैं कि इसकी तो शादी हो जाएगी, ये तो ‘पराया धन’ है। ये जो ‘पराया धन’ बोलते हैं, ये बात कहाँ से आई और हम ऐसा क्यों बोलते हैं कि वो पराया धन है?
आचार्य प्रशांत: इसमें इतना बड़ा राज़ क्या है, पराया वगैरह तो ठीक है…
प्रश्नकर्ता: वो तो इसी घर में जन्मी है।
आचार्य: हाँ, वो ठीक है ‘पराया’ बोलते हैं, पर देखिए न ‘धन’ बोला। धन माने वो चीज़ जो जड़ होती है।अब ये, (हाथ से माइक उठाते हुए) ये धन है, ये धन है , धन माने जिसकी अपनी कोई चेतना नहीं। धन माने जो सदा किसी और के स्वामित्व में रहेगा, वो धन है। धन कभी बोल नहीं सकता कि मैं अपने हिसाब से खर्च होऊँगा। धन ऐसा बोल सकता है?




