कोई किसी के लिए मुफ़्त में कुछ नहीं करता। सिर्फ़ जीवनमुक्त ही किसी के लिए मुफ़्त में कुछ कर सकता है। अगर आपके पति साधारण व्यक्ति हैं, तो वे मुफ़्त में आपको कुछ नहीं दे रहे होंगे। कुछ-न-कुछ व्यापार चल रहा होगा। लेन-देन में जो फँस गया, वह मुक्त कहाँ से हो पाएगा? बस इतना कमा लो कि तुम्हारी रोटी कर्ज़ की न हो।
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प्रश्नकर्ता: ब्याहता हूँ, अध्यात्म में गहरी रुचि है। गृहिणी होने के नाते घर में ही रहकर आध्यात्मिक पठन-पाठन और साधना में समय लगाती हूँ। पति अच्छी नौकरी में हैं। उनके माध्यम से आर्थिक और अन्य आवश्यक ज़रूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं। तो क्या तब भी मेरे लिए आवश्यक है कि मैं स्वयं कमाऊॅं?
आप बहुत ज़ोर देते हैं कि स्त्रियों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना चाहिए। लेकिन अगर कोई स्त्री मेरी जैसी सुविधापूर्ण स्थिति में हो तो भी क्या उसके लिए स्वयं कमाना, आर्थिक स्वावलंबन, आवश्यक है?
आचार्य प्रशांत: आवश्यक है तो। अभी आपका काम आपको लगता है चल रहा है। जब तक आपको लग रहा है कि चल रहा है, चलाए रखिए। बाकी देखिए जीवन के कुछ सिद्धान्त होते हैं। और वो सिद्धान्त अटूट होते हैं, सब पर लागू होते हैं। और मन का, जीवन का एक सिद्धान्त है कि जीवन मुक्त व्यक्ति को छोड़कर के कोई भी किसी के लिए भी निःस्वार्थ भाव से कुछ नहीं कर सकता। जब तक किसी में अहम् कायम है वो उस अहम् की पूर्ति के लिए ही करेगा जो कुछ करेगा। जब तक किसी में अहम् है, उसमें कर्ता भाव भी होगा तो उसमें एक-एक कर्म बस कर्ता के स्वार्थों की पूर्ति के लिए होगा।
इसका जो एक मात्र अपवाद होता है वो आध्यात्मिक रूप से बहुत ही उन्नत व्यक्ति होता है। वही एक मात्र अपवाद होता है। वही ऐसा होता है जो अपने लिए जीने और अपने लिए ही कर्म करने की अनिवार्यता से मुक्त हो गया होता है। अब वो जो कुछ भी करता है आवश्यक नहीं होता कि अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए करे। तो फिर उसका किया हुआ सबके लाभ, शुभ, कल्याण हेतु हो जाता है।




