16 से 24 साल की महिलाएँ चौथी-पाँचवीं बार गर्भ लेकर आ रही हैं, क्योंकि घर को बेटा चाहिए और मना करने पर पति की दूसरी शादी की धमकी है। हम इसे आर्थिक मजबूरी कहते हैं, पर हमारी ज़्यादातर बेड़ियाँ सांस्कृतिक हैं: एक संस्कृति जो आश्रित रहने को बुरा नहीं मानती, और कहानियाँ जो सिखाती हैं कि कुछ मत करो, भगवान भला कर देंगे। जो अपनी रोटी के लिए दूसरों पर आश्रित है, उसे कौन-सी मुक्ति मिलेगी? कोई परंपरा, कोई वादा हमारी ज़िंदगी से बड़ा नहीं होता। तो हम किस व्यवस्था को निभाते हुए अपनी ज़िंदगी दे रहे हैं?
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प्रश्नकर्ता: मैं बोकारो, झारखंड से हूँ और गीता सत्रों से तीन साल से जुड़ी हुई हूँ और मेरी पोस्टिंग ग्रामीण क्षेत्र में है, हेल्थ डिपार्टमेंट में, जहाँ पर ज़्यादातर मेरा इंटरैक्शन ग्रामीण महिलाओं से होता है, जहाँ वो एएनसी, पीएनसी और इम्यूनाइज़ेशन सर्विसेज़ के लिए आती हैं। और जो महिलाएँ ये सर्विसेज़ लेने के लिए आती हैं, उनकी उम्र 16 साल से लेकर 24 साल तक, 24 भी बहुत ज़्यादा हो गया। तो ज़्यादातर केसेज़ में मुझे यह देखने को मिलता है कि वो फ़ोर्थ, फ़िफ़्थ प्रेग्नेंसी लेकर आ रही हैं, और पहली, दूसरी और तीसरी प्रेग्नेंसी से जो बच्चा होता है, वह ज़्यादातर लड़कियाँ होती हैं। जब मैं उनको काउंसल करती हूँ, तो उनका कहना रहता है कि बेटा तो चाहिए होता है। दूसरा कहती है वह कि मेरी अपनी मर्ज़ी नहीं है, घरवाले को चाहिए। अगर मैं बच्चा न करूँ, तो मेरे पति की दूसरी शादी करा दी जाएगी। तो सर, मेरा सवाल यह है कि वह बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं होती है, तो मैं उन तक सही चीज़ें कैसे पहुँचाऊँ?
आचार्य प्रशांत: दूसरी शादी करा दे पति की। (श्रोतागण हँसते हैं) मतलब क्या यह बेग़ैरत ज़िंदगी होगी कि जहाँ पति तुमको




