लड़कियों में शारीरिक मज़बूती के प्रति उदासीनता क्यों है?

Acharya Prashant

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लड़कियों में शारीरिक मज़बूती के प्रति उदासीनता क्यों है?
लड़की को यह रोल असाइन ही नहीं किया गया कि उसका शरीर मज़बूत रहे — ताकि वह भी दमखम से कभी लड़ सके। यह काम समाज ने उसे दिया ही नहीं। और समाज की जो बात है, लड़की ने उसे बहुत गहराई से स्वीकार कर लिया है — बिना सवाल उठाए, बिना विरोध किए। अगर सेल्फ-कॉन्सेप्ट ही कमज़ोरी पर आधारित है, तो आप अपने शरीर को कभी एक सीमा से ज़्यादा मज़बूत होने ही नहीं देंगे। इसमें आपको क्या महिला सशक्तिकरण मिलने वाला है? यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: सर नमस्कार, मेरा नाम माधव है। मैं एक सर्टिफ़ाइड फ़िटनेस कोच हूँ, सर्टिफ़ाइड योगा इंस्ट्रक्टर भी हूँ। कैलिस्थेनिक्स और मार्शल आर्ट्स वग़ैरह भी करता हूँ। लगभग 15 साल हो गए हैं मुझे इस इंडस्ट्री में, मेरा जिम भी है। मैं इतने सालों में देख पा रहा हूँ कि फीमेल्स को जिम में जब भी वेट ट्रेनिंग वग़ैरह, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या रेज़िस्टेंस ट्रेनिंग वग़ैरह के लिए थोड़ा सा भी अगर मैं कहता हूँ कि आप लोग इसकी तरफ़ करो, थोड़ा सा मोटिवेट करता हूँ, हालाँकि मोटिवेशन इज़ नॉट द करेक्ट वर्ड। लेकिन फिर भी उन्हें समझा दिया जाता है, मेटा-एनालिसिस वग़ैरह दिखा भी दिए जाते हैं। पी.एम.जी. स्टडीज़ वग़ैरह भी दिखा देता हूँ, तब भी उनका रवैया वेट ट्रेनिंग्स वग़ैरह के लिए ऐसा ही रहता है कि 'नहीं-नहीं, हमें तो कोई ग्रुप ऐक्टिविटी करा दो, काइंड ऑफ योगा वग़ैरह करा दो।'

और योगा में भी जिस लेवल पर जाकर योगा उन्हें बेनिफिट देगा, जहाँ बैलेंसिंग मूवमेंट्स वग़ैरह आते हैं, काफ़ी सारी मूवमेंट्स आते हैं, वहाँ पर भी वो लोग बस साँसों की कुछ क्रियाएँ करके और थोड़ी बहुत स्ट्रेचिंग वाली एक्सरसाइज़ को सोच के करते हैं, कि भाई हमने योगा कर लिया।

तो मैं बस समझ नहीं पा रहा हूँ, एक्ज़ैक्टली कि इतना टाइम क्यों लग रहा है एक ही माइंडसेट को बार-बार चेंज करने में। इतने साल तो मुझे हो गए हैं, आई ऐम श्योर बाक़ी सारे कोचेज़ होंगे वो भी ये सब करते होंगे कुछ ना कुछ। इसी वजह से अगर मैं बाहर के लोगों को भी यहाँ से कंपेयर करता हूँ, तब भी वहाँ पर फीमेल्स जितनी भी हैं वो वेट ट्रेनिंग वग़ैरह अच्छी करती हैं। तो बाक़ी जितने भी उनके पास स्पोर्ट्स वग़ैरह में उनमें मेडल्स वग़ैरह भी अच्छे रहते हैं उनके पास।

आचार्य प्रशांत: इसका जवाब ये है कि जैसे तुम्हारे बाईसेप्स हैं, मस्त है ना? अब वो तुम्हारे इधर बैठी हुई है, उधर भी बैठी हुई है। उनके ऐसे अगर बाईसेप्स हो गए, तो ये जितने बैठे हैं सब उनकी ओर देखेंगे नहीं, ये है। मैं उनकी अवधारणा की बात कर रहा हूँ, उनके मन में क्या रहता है। मतलब जो अपने शरीर के साथ कर रही हैं ना, वो दर्शाता है कि उनके मन के साथ क्या हो चुका है।

जो वो अपने तन के साथ कर रही हैं, उससे उनके मन का पता चलता है।

उनके मन में ये है ही नहीं, कि शरीर को मज़बूत बनाना है। मज़बूत बनाना है। और ठीक है, तुम्हारे जितनी बाईसेप्स नहीं हो सकती उनके। पर हो सकती हैं बाईसेप्स, अच्छी-खासी हो सकती हैं। ठीक है? और जैसे ही हो जाए, तो उसके बॉयफ्रेंड की हालत देखना वो चार दिन में भागेगा। ये क्या हो गया?

शरीर क्या है? उपकरण है मन का। और मन चलता है जो आपने अपना 'सेल्फ कॉन्सेप्ट' बना रखा होता है उस पर। ठीक है? तो आपका अगर 'सेल्फ कॉन्सेप्ट' ही बहुत 'वीकनेस' पर आधारित है, तो आप अपने शरीर को भी कभी एक सीमा से ज़्यादा मज़बूत होने ही नहीं दोगे।

आप कह रहे हो कि शरीर का भी मुझे उतना ही ख़याल रखना है। मैं कौन हूँ? मैं एक महिला हूँ। मैं एक स्त्री हूँ। मैं एक लड़की हूँ। अच्छा ठीक है, मुझे शरीर का ख़याल रखना है तो जो आपको सोशियली असाइन्ड रोल है, बस उसकी पूर्ति, उसके फुलफिलमेंट के लिए शरीर जैसा रखना होता है। आप शरीर का उतना ही ख़याल रखते हो। जो आपको सोशल रोल असाइन हो गया है ना, वो रोल डिटरमिन कर रहा है कि आप अपने शरीर को कैसा रखना चाहते हो।

लड़की को ये 'रोल असाइन' ही नहीं हुआ है कि उसका शरीर मज़बूत है, तो वो भी दमखम से कभी लड़ भी सकती है, या कोई भारी सामान उठा के इधर से उधर कर सकती है, ये काम उसको समाज ने दिया ही नहीं है। और समाज की जो बात है, वो लड़की ने बहुत गहराई से स्वीकार कर ली है, बिना सवाल उठाए, बिना विरोध करे। विद्रोह तो बहुत दूर की बात है, उसने सवाल भी नहीं करा।

तो उसको समाज ने क्या रोल दिया है? उसको बोला, 'अच्छी दिखना, शादी अच्छी हो जाएगी।' तो ख़ासकर शादी से पहले वो जिम ज्वाइन करती है। और अच्छी दिखने का मतलब होता है वज़न कम कर लो, तो वज़न कम कर लेती है। उसके लिए जिम चली जाती है। तो उसका जो जिम जाना है, वो उसके सोशल रोल से निर्धारित हो रहा है।

सुहागरात आएगी, शादी के बाद सेक्सी दिखना है, तो सेक्सी दिखने के लिए जो कुछ जिम में करना होता है, वो कर लेती है। जो उसकी ड्यूटीज़ होती हैं ऐज़ अ वाइफ, ऐज़ अ मदर, उसके लिए शरीर में फ्लेक्सिबिलिटी होनी चाहिए, तो शरीर की फ्लेक्सिबिलिटी का भी कर लेती है। कई तो जाती हैं योगा करने, तो उसमें रहता है "योगा फॉर वुड बी मदर्स।”

तो उसमें ऐसा रहता है कि आपका चौथा महीना चल रहा है, तो ये वाला योगा करिए। छठा ये चल रहा है, वो उसमें फ्लेक्सिबिलिटी और स्ट्रेचिंग, यही सब कराते हैं, वो करती हैं महिलाएँ, मज़े में करती हैं। समझ में आ रही है बात ये? और जो काम समाज ने उनको दे ही नहीं रखा है, वह काम उनको समझ में नहीं आता कि ये काम भी मेरा है। दे रखा है तो उल्टी बात है।

वो उनको बल्कि सक्रिय रूप से, ऐक्टिवली डिसकरेज करा जाता है कि — नहीं-नहीं ये क्या कर रही है तू? ऐसे मत कर, कंधे चौड़े हो जाएँगे। कंधे तो चौड़े होने ही चाहिए ना। कंधे तो चौड़े होने ही चाहिए। सबके होने चाहिए आदमी, औरत, सबके। फिल्मों ने गाने सुना दिए, पतली कमर है, तिरछी नजर है। तो वो समझ गए कि कमर पतली होनी चाहिए, तो कमर वाले सारे काम कर लेती है। कमर करेगी दना-दन दना-दन, कोशिश करके कि कमर पतली है ना, यहाँ फैट तो नहीं आ गया।

आपके लिए जितनी महत्ता होती है वेइंग स्केल की, उसके लिए होती है इंच टेप की। तो वो इंच लॉस, इंच लॉस। आप वेट लॉस, लड़कियों में इंच लॉस ज़्यादा चलता है। ये सब समझ में आ रहा है? कहाँ से आ रहा है?

ये भी लोकधर्म है। ये सब लोकधर्म ही है, धर्म का विकृत स्वरूप। वहीं से लड़की अपना 'सेल्फ कॉन्सेप्ट' लेती है। उसी के हिसाब से अपनी बॉडी भी बनाती है।

यार, आप एक औसत उत्तर भारतीय शहर हो। मैं मेट्रो दिल्ली की नहीं बात कर रहा हूँ। साधारण जो नॉर्थ इंडियन हमारे शहर और कस्बे और गाँव होते हैं — आप वहाँ की लड़की को देखोगे ना, तो जब छोटी होगी, बच्ची होगी, तब तक तो वैसे ही चलती होगी जैसे कि बच्चा चलता है, लड़का। जैसे ही वो बड़ी होती है, प्यूबर्टी क्रॉस करती है, वो ऐसे थोड़ा सा ना अपने कंधे दबा के और झुक के चलना शुरू कर देती है। ये करता है मन, तन के साथ। तुम्हारा पोश्चर तक ख़राब कर देता है। बात समझ में आ रही है ना?

क्योंकि बाहर इतना ज़लील है ये ज़माना सारा, और ये छोटे शहर गाँव में लुच्चे-गुंडे किस्म के लोग घूम रहे हैं। वो उनके आगे नहीं दिखाएगी कि अब मैं ऐडल्ट हो रही हूँ। तो वो अपने चेस्ट एरिया को बांध के, ऐसे दबा के चलती है ताकि उसकी प्यूबर्टी पता ना चले, ऐसे (झुक कर चलने का अभिनय करते हुए)। तन भी वैसा ही तो बनेगा ना, जैसा मन है। और क्या होगा?

आप कभी फॉरेनर्स को देखिएगा। आप बाहर जाएँ विदेश वहाँ देख लीजिए या भारत में ही गोवा वग़ैरह चले जाइए बीच पर। तो वहाँ पर महिलाएँ कैसे वॉक करती हैं, ठीक है? यूरोप से अमेरिका से कोई महिला आई होगी। उसने बिकिनी भी पहन रखी होगी, तो भी वो कॉन्फिडेंट तरीक़े से एक इंसान की तरह चल रही होगी। जैसे एक इंसान चलता है, उसका नैचुरल एक गेट होता है, पोश्चर होता है वैसे चलेगी। और आप भारतीय महिला को देखो, कैसे चलती है, 'हाय दैया! वो हाय दैया ही हो गई है पूरी ज़िंदगी।'

वैसे, आप अभी तक कैसे लेडीज़ को इंस्ट्रक्ट कर पा रहे हो? अब तो शायद नियम आ गया है ना कि महिलाओं को सिर्फ़ महिला कोच ही..

प्रश्नकर्ता: सर, मेरे जिम में फीमेल कोचेज़ भी हैं।

आचार्य प्रशांत: बच के चलना, ये लीगल होने जा रहा है सब।

प्रश्नकर्ता: हाँ, अच्छी बात है सर। कोई बात नहीं।

आचार्य प्रशांत: ये तो समाज का हाल है। इसमें आपको क्या महिला सशक्तिकरण मिलने वाला है? ये भी देख रहे हो ना किस मन से आ रहा है, 'तू प्रॉपर्टी तो होने वाली है अपने पति की, तो उससे पहले जिम कोच तेरे शरीर पर हाथ क्यों लगाए?'

तुझे तो अपने पति की संपत्ति होना है ना, और अगर जिम में कोच है, ट्रेनर है तो वो बॉडी को तो छुएगा ही थोड़ा बहुत। तो तेरे शरीर को तो सिर्फ़ तेरा पति छुएगा, तू उसकी जायदाद है। कोच भी नहीं छुएगा। मैंने कहा डॉक्टर भी बंद कराओ, वो भी छूते हैं। वो सब भी बंद होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: और सर, थैंक यू सो मच। मैं अभी लास्ट 6 महीने से वीगन हो गया हूँ। तो बीइंग अ वीगन फिजिक मेंटेन करना, मुझे लगता था शायद बहुत मुश्किल होगा। मैंने इतने सालों तक सब वेजिटेरियन ही था मैं।

आचार्य प्रशांत: हो जाता है।

प्रश्नकर्ता: लेकिन हाँ, मैं काफ़ी स्टडी भी जब इस तरफ़ निकला, तो मैं वीगनिज़्म की तरफ़ भी ध्यान देने लगा। तो मेरे को काफ़ी सारे प्रोटीन रिच सोर्सेस के साथ-साथ अमीनो एसिड्स वग़ैरह जो मैं पढ़ता हुआ आ रहा था, वो उन सब चीज़ों में कंप्लीट हो जाता है।

थैंक यू सो मच, सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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