बेटी, पत्नी और माँ से आगे — आपकी असली पहचान

Acharya Prashant

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बेटी, पत्नी और माँ से आगे — आपकी असली पहचान
ऋषियों ने कहा कि देखो, बाण से छूटा हुआ तीर तो लौट के नहीं आता न। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो भविष्य में अपना फल दिखाएँगे ही। अब ये किया था आपने, आपने छोड़ दिया। छोड़ने के तुरंत बाद आपको पता चल गया कि गलती हो गई, तो क्या होगा? अब तो वो जिसको लगना है लगेगा। यही बात मुँह से निकले शब्द से होती है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जैसे वो अभी आपने बात की कि मैं वही हूँ, जिससे मेरा प्रेम है, प्यार है, जिससे सांसारिक प्यार है। तो मैं ये तो साफ़-साफ़ देख पाती हूँ कि कहाँ मोह है, वहीं कुछ भय भी लगता है। जहाँ मोह है, वहीं डर भी है।

तो बार-बार श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि — निर्मम हो जा, निर्मम हो जा। लेकिन वो निर्ममता आ ही नहीं पाती। कुछ हद तक बात होती है, उसके बाद फिर वही डर आ जाता है। तो फिर वही बात रुक जाती है। जबकि दिखता है कि वो बिल्कुल वही, प्रतिस्पर्धी, कृष्ण के प्रतिस्पर्धी वाली बात, कि बिल्कुल विरोधी हैं उनके, वो सब कुछ दिखता है। लेकिन फिर वही एक अटक-सी आ जाती है — मोह, डर, सब कुछ आ जाता है।

आचार्य प्रशांत: जहाँ पर फंसे हैं न, उससे थोड़ा-सा खिसकिए। कोशिश ये करेंगे कि एक झटके में ही सारे ममता के तार तोड़ दें, निर्मम हो जाएँ, वो नहीं हो पाएगा। जिस जगह पर अभी अटक गए हैं, जहां पर अभी रस्साकशी में एक इक्विलिब्रियम बन जाता है न, कि उधर से भी ज़ोर लग रहा है, इधर से भी लग रहा है और दोनों पक्ष अब अपनी-अपनी जगह पर अटके हुए हैं, फंसे हुए हैं। ज़रा-सा, ज़रा-सा खिसकिए, मोह थोड़ा-सा कम करिए।

प्रश्नकर्ता: इसमें, मतलब पता नहीं, मैं अपने आप को थोड़ा-सा वो समझती हूँ कि जैसे, एक तो आर्थिक रूप से अपने आप से कुछ अब तक कमाया नहीं, जो है घर के दूसरे लोगों का ही है, कमाया हुआ भी। तो उसी को अगर, जहाँ मेरा अहम् अटका हुआ है, जिससे मैं अटकी हुई हूँ, मोह हो जिससे, उसका अगर कहीं ऐसा उपयोग होने जा रहा है, जहाँ मुझे लगता है कि वो ग़लत ही हो रहा है, तो मतलब वहाँ पर मैं उतना ज़ोर देकर कह भी नहीं पा रही, क्योंकि वो मेरा कमाया हुआ नहीं है।

आचार्य प्रशांत: जैसे आप ये देख पा रही हैं कि पैसा जहाँ लग रहा है, वो जो पैसा है जो लगने जा रहा है, वो आपका नहीं है। वैसे ये भी देख लीजिए कि जिसके लिए पैसा लगने जा रहा है और जो पैसा लगाने जा रहा है, वो भी आपका नहीं है। अब पैसा आपने नहीं कमाया है ये बात एकदम स्थूल तथ्य होता है, ये तो दिख ही जाता है कि पैसा मैंने नहीं कमाया। पर जो लोग पैसा लगा रहे हैं, जिनके लिए पैसा लग रहा है, वो भी तो आपके नहीं हैं न। होने दीजिए।

प्रश्नकर्ता: इसमें अंदर से बहुत कचोटता है, कि इतना समझ आ भी रही है कि ग़लत को देख के कैसे आँखें बंद कर ली जाएँ। तो उसमें बड़ा, बहुत अटक जाती हूँ बार-बार समझ नहीं आता कि।

आचार्य प्रशांत: वो तो अब आप मनुष्य पैदा हुईं, फिर आपने पत्नी का, माँ का कर्तव्य स्वीकार किया, तो उसका दंड आपको मिले कि न मिले।

एक तो अपराध यही कर दिया कि पैदा हो गईं। उसके बाद पत्नी भी बनीं, फिर माँ भी बन गईं, तो उसका दंड तो मिलेगा न। तो दंड तो फिर मिलता ही है, जब दंड मिल रहा होता है, बहुतों बड़े-बड़ों को, संतों को मिलता है। वो बोलते हैं कि, “जैसी करनी वैसी भरनी, तू क्यों भया उदास” जो कर रहा है वो भरेगा, तुम क्यों उदास हो रहे हो। “कबीरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास।”

कबीरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास। जैसी करनी वैसी भरनी, तू क्यों भया उदास।।

अब ये आपकी झोपड़ी उनके पास है, इसका मतलब ये नहीं है कि आप उनका कर्म और कर्मफल अपने ऊपर ले सकती हैं। जिसकी करनी है, उसको भरना पड़ेगा। तो आप क्या करेंगी? लेकिन हाँ, दुख तो आपको होगा, क्योंकि आपने तार बांध रखे हैं। वो दुख झेलना एक तरह से प्रायश्चित है जन्म लेने का।

प्रश्नकर्ता: मतलब, इसमें एक चीज़ और भी आ जाती है कि जैसे जो हमारे साथ मिलकर कुछ इस तरफ़ और बढ़ना चाह रहे हैं, तो वे भी जब ये देखते हैं कि इन्हीं के घर में ऐसा चल रहा है, तो उससे ग़लत प्रभाव जाता है। तो उससे ज़्यादा दुख लगता है।

आचार्य प्रशांत: दुख जब मोह से बड़ा हो जाएगा, तो जो हो रहा है आप उसको रोक देंगी। कुछ ग़लत हो रहा है, कुछ अधार्मिक हो रहा है, इस बात का दुख है न? और दूसरी तरफ़ मोह है, जो उस चीज़ को होने दे रहा है, जो चीज़ हो रही है। तो वो दुख जो है, जब मोह से बड़ा हो जाएगा, तब जो हो रहा है, आप या तो उसको यथाशक्ति रोक देंगी, या फिर आप उससे बिल्कुल पल्ला झाड़ लेंगी। आप कहेंगी, “जो हो सो, मेरा उससे लेना-देना नहीं।”

देखिए, ये प्रश्न बहुत पुराना है, कि “अब हमें बात समझ में आ रही है लेकिन पुराने कर्म बंध का क्या करें?”

तो ऋषियों ने कहा कि देखो, बाण से छूटा हुआ तीर तो लौट के नहीं आता न। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो भविष्य में अपना फल दिखाएँगे ही। अब ये किया था आपने, आपने छोड़ दिया। छोड़ने के तुरंत बाद आपको पता चल गया कि गलती हो गई, तो क्या होगा? अब तो वो जिसको लगना है लगेगा। यही बात मुँह से निकले शब्द से होती है। कई बार होता है, बोलते ही पता चल जाता है, गलत शब्द तो लग गया।

तो उसके लिए ज्ञानियों ने क्या उपाय बताया?

ज्ञानियों ने कहा कि फिर तो एक ही तरीक़ा हो सकता है, तुम वो रहो ही नहीं जिसको सज़ा मिलनी है।

प्रश्नकर्ता: आपकी वो वीडियो पश्चाताप वाली में भी यही था।

आचार्य प्रशांत: और कोई तरीक़ा नहीं है फिर, अगर आप वही रहोगे जिसने गलती करी थी, तो फिर सज़ा भी भुगतनी पड़ेगी। तो जायज़-सी बात है, आपने कुछ किया है आपने बाण छोड़ दिया भविष्य में, आपने बाण छोड़ा हमेशा बाण भविष्य में ही जाकर लगता है न किसी को। तो आपने 30 की उम्र में एक बाण छोड़ा था, वो 60 की उम्र में कहीं जाकर लगना था, वो तो लगेगा और उसका आपको दंड भी मिलेगा।

लेकिन दंड नहीं मिलेगा अगर आप 60 आने से पहले ही…, तो निकल लो। जिन्होंने बहुत पाप कर रखे हों, उनके लिए ज्ञानियों ने एक ही रास्ता बताया है, इससे पहले कि सज़ा आ जाए, तुम निकल लो। और निकल लेने का क्या मतलब है? तुम वो न रहो, तुम मुक्त हो जाओ।

प्रश्नकर्ता: नहीं, मेरे कर्म का, मेरी परवरिश का भुगतान कोई और भुगते तो…

आचार्य प्रशांत: जिसने वो गलत परवरिश दी थी, आप वो मत रहिए। इसके अलावा आप कोई प्रायश्चित नहीं कर सकतीं। जिसने भूलवश एक तरह की परवरिश दे दी थी, आप वो मत रहिए न। इसी को तो मैं कहता हूँ सार्थक गिल्ट, अगर पछतावा हो ही रहा है तो वो इतना गहरा होना चाहिए कि आपको बिल्कुल बदल कर रख दे। आप वो रहिए मत, जिससे गलती हो गई है।

एक गलती होती है, गलती करना। और दूसरी गलती होती है, ये कहना कि मैं आज भी मजबूर हूँ गलती करने के लिए। चलिए गलती जो हो गई अतीत में हो गई उसको कौन बदल सकता है? बाण छोड़ा था तब, अब तो उसको जाकर के वापस नहीं। पर आज तो आप कुछ और कर सकती हैं न, आज कुछ और कर लीजिए।

आपको यही लग रहा होगा, सुनने में आसान है करें कैसे? भाई, कर्मफल भी तो भारी है न, समस्या भी तो बड़ी है न, जिस चीज़ का आपको परिणाम आज सामने आ रहा है, वो चीज़ भी कोई छोटी थोड़ी है। इसीलिए तो इन सब से कहा करता हूँ कि जिस चीज़ का परिणाम इतना बड़ा होता है कि बाद में उससे मुक्त होना लगभग असंभव हो जाए, उस चीज़ में घुसो ही मत। नहीं तो बाद में जग भी गए तो उससे बाहर आना बड़ा मुश्किल हो जाएगा।

ये सब घुसने को बिल्कुल आतुर हैं वो अलग बात है, घुसेंगे ही। मुझे मालूम है, मैं जो बोल रहा हूँ वो बहुत काम का नहीं है आपके।

प्रश्नकर्ता: कोशिश तो है उस पर ही। मालूम तो है कुछ आपसे रोज़ सुनते हुए पता तो चल ही रहा था, लेकिन एक ये मन की वो बात थी, कहना भी चाह रहे थे कि कुछ और सॉल्यूशन साथ में कुछ और मिलेगा, इससे बल मिलता है आपकी बात से।

आचार्य प्रशांत: दोनों चीज़ें एक साथ मत बोलिए। ये मत कहिए कि वो जो पैसा कहीं लग रहा है, वो मेरा नहीं है। पर जो पैसा लगा रहा है, वो मेरा है और जिस पर पैसा लगाया जा रहा है, वो मेरा है। अगर वो दोनों आपके हैं, तो फिर वो पैसा भी आपका है। अपना अधिकार उस पर ठोक-बजा के, दावे के साथ लीजिए। कहिए नहीं, पैसा मेरा ही है, और मेरा है तो फिर जहाँ बोलूँगी, वहीं लगेगा।

या तो तीनों में से कोई नहीं है मेरा। तीनों मेरे हैं, या तो। ये थोड़ी हो सकता है कि पति मेरा है, पर पति का पैसा मेरा नहीं है। ऐसे कैसे हो जाएगा, कानून भी इस बात को नहीं मानता। त्यागना है, तो फिर तीनों को त्यागिए। नहीं तो ये मत कहिए कि एक ही चीज़ मेरी नहीं है, बाक़ी दोनों, पति भी मेरा है, पुत्र भी मेरा है, पैसा मेरा नहीं है। ऐसे नहीं। पैसा भी आप ही का है। ऐसे कैसे आप इधर-उधर लगने देंगी? एकदम पकड़ लीजिए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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