ऋषियों ने कहा कि देखो, बाण से छूटा हुआ तीर तो लौट के नहीं आता न। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो भविष्य में अपना फल दिखाएँगे ही। अब ये किया था आपने, आपने छोड़ दिया। छोड़ने के तुरंत बाद आपको पता चल गया कि गलती हो गई, तो क्या होगा? अब तो वो जिसको लगना है लगेगा। यही बात मुँह से निकले शब्द से होती है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जैसे वो अभी आपने बात की कि मैं वही हूँ, जिससे मेरा प्रेम है, प्यार है, जिससे सांसारिक प्यार है। तो मैं ये तो साफ़-साफ़ देख पाती हूँ कि कहाँ मोह है, वहीं कुछ भय भी लगता है। जहाँ मोह है, वहीं डर भी है।
तो बार-बार श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि — निर्मम हो जा, निर्मम हो जा। लेकिन वो निर्ममता आ ही नहीं पाती। कुछ हद तक बात होती है, उसके बाद फिर वही डर आ जाता है। तो फिर वही बात रुक जाती है। जबकि दिखता है कि वो बिल्कुल वही, प्रतिस्पर्धी, कृष्ण के प्रतिस्पर्धी वाली बात, कि बिल्कुल विरोधी हैं उनके, वो सब कुछ दिखता है। लेकिन फिर वही एक अटक-सी आ जाती है — मोह, डर, सब कुछ आ जाता है।
आचार्य प्रशांत: जहाँ पर फंसे हैं न, उससे थोड़ा-सा खिसकिए। कोशिश ये करेंगे कि एक झटके में ही सारे ममता के तार तोड़ दें, निर्मम हो जाएँ, वो नहीं हो पाएगा। जिस जगह पर अभी अटक गए हैं, जहां पर अभी रस्साकशी में एक इक्विलिब्रियम बन जाता है न, कि उधर से भी ज़ोर लग रहा है, इधर से भी लग रहा है और दोनों पक्ष अब अपनी-अपनी जगह पर अटके हुए हैं, फंसे हुए हैं। ज़रा-सा, ज़रा-सा खिसकिए, मोह थोड़ा-सा कम करिए।
प्रश्नकर्ता: इसमें, मतलब पता नहीं, मैं अपने आप को थोड़ा-सा वो समझती हूँ कि जैसे, एक तो आर्थिक रूप से अपने आप से कुछ अब तक कमाया नहीं, जो है घर के दूसरे लोगों का ही है, कमाया हुआ भी। तो उसी को अगर, जहाँ मेरा अहम् अटका हुआ है, जिससे मैं अटकी हुई हूँ, मोह हो जिससे, उसका अगर कहीं ऐसा उपयोग होने जा रहा है, जहाँ मुझे लगता है कि वो ग़लत ही हो रहा है, तो मतलब वहाँ पर मैं उतना ज़ोर देकर कह भी नहीं पा रही, क्योंकि वो मेरा कमाया हुआ नहीं है।




