प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्य के लिए उपलब्ध रहो, इसका अर्थ क्या है?
आचार्य: देखो, सच्चाई अपना एहसास कराती रहती है। हम उसको दरकिनार कर देते हैं, उसकी ओर पीठ कर देते हैं, उसके प्रति अनुपलब्ध हो जाते हैं। ईमानदारी इसमें नहीं है कि मुझे सच्चाई पता है। तुम्हें क्या पता सच्चाई ख़ुद आती है अपनेआप को जताने। सच्चाई क्या? जो है। जो है वो तो अपनी अनुभूति ख़ुद ही कराएगा न। ईमानदारी है, ‘एक बात जान गया, फिर पीछे नहीं मुड़ता। एक बार दिख गया, फिर अनदेखा नहीं करता। आँखों देखी मक्खी नहीं निगलता। हक़ीक़त जान ली, तो अब दुबारा अपनी झूठ की ज़िंदगी में वापस नहीं जाऊँगा।
जब तक नहीं जानते थे, भ्रम में थे, तबतक चल गया काम। अब जब जान लिया है तब पुराना ढर्रा नहीं चलने देंगें ये ईमानदारी होती है। ईमान माने– ‘धर्म’। और धर्म का यही मतलब होता है कि मेरी गति हमेशा सदा सत्य की ओर रहे। धर्म माने– ‘दिशा’। धर्म माने– ‘मुझे करना क्या है, कौन दिशा जाना है?’ मुझे लगातार सच्चाई की दिशा जाना है मेरी अपनी कोई दिशा नहीं – न दाएँ, न बाएँ। जिधर को सच दिखाएगा उधर को चल देंगें, ये धर्म है, ये ईमानदारी है।
प्र: आचार्य जी, भीड़ से दूर रहने का क्या मतलब है?
आचार्य : बेटा! यहाँ तक ठीक समझे हो कि भीड़ से दूर रहना शारीरिक दूरी से कम और मानसिक दूरी से ज़्यादा प्रयोजन रखता है। लेकिन उसमें एक बात और समझना। अपने मन की हालत देखो, अभी-अभी ये हुआ न कि तुम्हारे बगल में बैठा था। और शरीर ही था जो तुम्हारे बगल में बैठा था। तुम्हारे बगल में जो बैठा था उसके कारण तुमपर आफ़त आई। अभी–अभी ऐसा हुआ न? हुआ कि नहीं हुआ? तुम्हारे मन की हालत कुछ ऐसी है कि हम जिसके साथ रहते हैं उसी के जैसे हो जाते हैं।




