आचार्य जी और संस्था के कुछ सदस्य ऋषिकेश में मध्यरात्रि में घूमने निकले, और किसी विषय पर बातचीत कर रहे थे, तभी पास में एक मन्दिर में राम-धुन चल रही थी। राम-धुन में इतनी लयबद्धता और मधुरता थी कि संस्था के कुछ सदस्यों ने साधुओं से प्रार्थना की कि उन्हें भी अन्दर आकर राम-धुन का रसपान करने दें।
साधुओं ने अन्दर आने की अनुमति दी। जिसके बाद संस्था के सदस्यों ने राम-धुन का रसपान किया, और वापिस आकर आचार्य जी से इसी विषय पर वार्ता करते हैं—
प्रश्नकर्ता: ऋषिकेश में अभी रात के एक बज रहे हैं। यह अलग मन्दिर जिसमें तीन साधु, इन्हें कोई देख नहीं रहा है, कोई सुनने वाला नहीं है; ये मगन हैं?
आचार्य प्रशांत: साधु की जो मस्ती है, एकदम अनूठी होती है। भारत में साधु एक बहुत अद्भुत हस्ती रहा है। कैसे अद्भुत रहा है? अभी रात का एक बज रहा है, पूरी दुनिया सो रही है। है न? और ये चार-पाँच साधु न सिर्फ़ जग रहे हैं; बल्कि अपने में मगन हैं। कोई इनके पास दर्शक नहीं, श्रोता नहीं, न इनकी कोई ख़्वाहिश है कि कोई इनको देखे, कोई सुनें। ये अपने में मगन हैं।
तो साधु की जो मौज़ूदगी रही है न समाज में, वो समाज को यही बताने के लिए रही है कि तुम जिन तरीक़ों से सुख खोजते हो, समाज जिन तरीक़ों से सुख खोजता है। उन तरीक़ों के अलावा भी सुख के तरीक़े हैं। अब देखो, समाज सुख कैसे खोजेगा?
समाज सुख ऐसे खोजेगा कि पहली बात तो अगर समाज में किसी को प्रतिभा प्रदर्शन करना है तो दिन में करेगा। दिन में इसलिए करेगा ताकि दूसरे लोग मौज़ूद हों, उनसे वाह-वाही मिले, हो सकता है रूपया-पैसा मिले।






