तुम कहते हो, ‘जो ज़रूरत में काम आए, वो मित्र’ — यह नकली परिभाषा है। असली दोस्त ख़ुद के क़रीब लाता है; उसकी संगति में गहरी शांति मिलती है, जबकि नकली दोस्त भटकाता है, उत्तेजनाओं में उलझाता है। सच्चा मित्र वह नहीं, जो तुम्हें और नशों में डाल दे, बल्कि वह है, जो तुम्हारे सारे नशों को उतार दे। पर इसकी पहचान कर सको — ज़रूरी है कि तुम्हारा अपना मन साफ़ हो। पहले ख़ुद जग जाओ, फिर दुनिया साफ़-साफ़ दिखाई देगी।
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प्रश्नकर्ता: सर, हम लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इतने सारे लोगों से मिलते हैं। बहुत लोग होते हैं जो नाटक करते हैं, ज़्यादातर के तो नकली चेहरे ही होते हैं। तो किस पर विश्वास कर सकते हैं कि कौन हमारा असली दोस्त है? कैसे जाने कि कौन हमारी परवाह करता है?
आचार्य प्रशांत: आप कैसे जानोगे? आप पूछ रहे हो कि कैसे जानूँ कि सच्चा दोस्त कौन है, नकली कौन है, कौन मेरे सामने मुखौटा लगा कर खड़ा हुआ है? मैं पूछ रहा हूँ कि जानने वाला कौन है? इन सब का निर्धारण करने वाला कौन है? ‘मैं जानना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में कौन असली है और कौन नकली है,’ — ये जानेगा कौन? मैं ही तो जानूँगा न? अपने ही मन से जानूँगा, अपने ही दृष्टि से देख कर। अगर मेरी ही आँख साफ़ नहीं है, तो क्या मैं दूसरों को साफ़-साफ़ देख पाऊँगा? ‘मैं जानना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में जो यह दूसरे मौजूद हैं, इनमें से असली कौन और नकली कौन।’
तुम्हारा सवाल है दूसरों के बारे में। मैं सवाल को विपरीत कर रहा हूँ। अब मैं सवाल कर रहा हूँ तुम्हारी अपनी नज़र के बारे में, क्योंकि जानने वाले तो तुम ही हो न, निर्णय तो तुम ही सुनाओगे न, तुम ही तो घोषणा करोगे कि यह असली है और यह नकली है। जब जज ने, निर्णय करने वाले ने, वो जो वहाँ बैठा हुआ है, न्यायाधीश! (मन की और इंगित करते हुए) जब उसने जम कर शराब पी रखी हो, तो वह निर्णय कैसे करेगा? कैसे निर्णय करेगा? उल्टे-पुल्टे ही तो।




