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जो जाति देख कर तुम्हें नीचा दिखाते हों || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता आचार्य जी, मैं जाति व्यवस्था से बहुत पीड़ित हूँ। पहले जिस लड़की से शादी करनी चाही, नहीं कर पाया क्योंकि जाति के आधार पर परिवार और समाज ने विरोध किया। मैं जहाँ भी कहीं जाता हूँ, किसी उत्सव में, पार्टी में, किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में, लोग जात देखकर ही व्यवहार करते हैं। यहाँ तक कि अपने दोस्त-यार भी ये जता ही देते हैं कि मैं तथाकथित नीची जाति का हूँ। और भी न जाने कितने तरीके हैं, जिनसे बार-बार जाति का मुझे एहसास कराया जाता है, और प्रतिदिन मेरे भीतर हीनता का और अपमान का भाव भरा जाता है।

मैंने आपकी कई वीडियोज भी देखी हैं, जिसमें आपने जाति व्यवस्था को लेकर कई बार कुछ बोला है। वो सब बातें अच्छी हैं, लेकिन वो दिन कब आएगा जब यह तथाकथित ऊँची जाति वाले सवर्ण लोग भी हमें बराबर की इज्जत और स्थान देंगें?

आचार्य प्रशांत: नहीं देवेंद्र, ऐसे नहीं! ऐसे नहीं बात बनेगी। तुमने यह हक़ उनको कैसे दे दिया कि तुम कितने सम्मान के अधिकारी हो, वो तय करेंगे? ये बात ही बड़ी रुचिकर है, जो तुम कह रहे हो यहाँ पर कि, 'तुम्हारे दोस्त-यार भी तुम्हें जता देते हैं कि तुम तथाकथित नीची जाति के हो!' ये कमाल कैसे करा तुमने? ये दोस्त-यार ऐसे बना कैसे लिए तुमने?

लोगों के सोचने पर हमारा नियंत्रण तो शायद दोसौ साल में भी नहीं आने वाला न? कोई क्या सोचता है, इसको हम पूरे तरीके से दोसौ, चारसौ, छहसौ साल में भी नहीं बदल पाएँगे। तो हम क्या करें? हम अपना स्वाभिमान, अपनी अस्मिता, दूसरों के हाथ में सौंप दें?

तुम ऐसे लोगों के इर्द-गिर्द पाए ही क्यों जा रहे हो, जिन्हें इंसान समझ में नहीं आता, इंसान का ज्ञान समझ में नहीं आता, इंसान के गुण समझ में नहीं आते? जो अपने दोस्तों को भी जाति की निग़ाह से देखते हैं, तुम मुझे ये बताओ?

वो बहुत बड़े अपराधी हैं, इसमें कोई शक नहीं। पर मुझे दुख और शिकायत ये है कि उनके अपराध के लिए तुम अपनेआप को क्यों सजा दे रहे हो? वो मूर्ख हैं, वो जातिवादी हैं, तो तुमने उन्हें ये अधिकार क्यों दे दिया कि वो तुम्हारे मन पर चढ़कर बैठ जाएँ? और ऊपर से तुम यहाँ कह रहे हो कि, 'वो तुम्हारे दोस्त यार हैं!'

ये कौन से दोस्त यार हैं? ज़बरदस्ती आकर चिपक गए थे तुमसे, दोस्त बन गए थे? तुम्हीं ने उन्हें दोस्त का स्थान दिया है न? क्यों बनाए ऐसे दोस्त? कोई तुम्हें इज्ज़त न देता हो; वो तुम्हारा दोस्त कहलाने के काबिल है? बोलो! और मुझे लग रहा है, तुम्हारी तो पूरी कहानी ही ऐसी रही है।

तुमने प्रेम भी करा था तो यही हुआ था कि, परिवार समाज ने विरोध किया। ये कैसा प्रेम था भाई? ये कैसा प्रेम था, जो परिवार और समाज की आँख देखकर चल रहा था?

और ये कैसी तुमने अपने लिए साथी चुनी थी? न तुम दम दिखा पाए, न सामने वाला दम दिखा पाया; शिकायत यहाँ तुम जाति व्यवस्था की कर रहे हो। वो शिकायत करके लाभ क्या मिलेगा, बताओ तो? विवाह हो जाएगा अब तुम्हारा उस व्यक्ति से, जिससे करना चाहते थे? कर लो सौ बार शिकायत!

कुछ समझ में आ रही है बात?

अच्छा! तुम कहीं चले जा रहे हो देवेंद्र, और कोई पीछे से पुकारे तुमको- शुभेंद्र, शुभेंद्र, शुभेंद्र! चार-पाँच बार बोले; मुड़कर देखोगे क्या? बोलो? नहीं। क्यों? क्योंकि तुम्हें पता है तुम शुभेंद्र नहीं हो। अगर तुम शुभेंद्र नहीं हो, तो जो लोग तुम्हें शुभेंद्र बोल रहे हैं, तुम मुड़कर उनकी ओर देखते ही क्यों हो? मुझे बताओ?

इसी तरीके से, अब यहाँ पर तुम ये सब लिख रहे हो, मैं समझता हूँ पढ़े-लिखे हो। तुम चले जा रहे हो, पीछे से कोई तुमसे कहे, देवेंद्र अनपढ़ है। तुम्हें बुरा लगेगा? तुम हँस और दोगे। तुमने मास्टर्स की डिग्री हासिल कर रखी है, तुम हँसने लग जाओगे; तुम्हें बुरा लगेगा?

तुम ऐसे लोगों को अपना दोस्त बना लोगे, जो समझ ही नहीं पा रहे कि तुम इंसान के तौर पर क्या हो?

देखो! दुख हमारी और फेंकने वाले हजारों लोग हो सकते हैं, और सैकड़ों स्थितियाँ हो सकती हैं, पर दुख तुम स्वीकार करोगे या नहीं करोगे, इसमें अंततः चुनाव तुम्हारा ही होता है।

तुम्हारी स्थिति को लेकर मेरे मन में दुख है, क्षोभ है, क्योंकि तुम्हारे जैसे बहुत लोग हैं, और बहुत इस तरह के पत्र आते हैं। लेकिन फिर भी मैं सहानुभूति नहीं देना चाहता तुमको। मेरी सहानुभूति तुम्हारे काम नहीं आएगी। तुम्हारी आंतरिक स्पष्टता और तुम्हारा आत्मबल तुम्हारे काम आएगा; लेकिन वो हमें पता ही नहीं होता।

न बचपन से कोई हमें बताने आता है कि, ये हमें जितनी भी जन्मगत पहचानें, और शरीरगत पहचानें मिल रही हैं; ये झूठी हैं। चाहे वो लिंग की हो, चाहे वो आर्थिक स्थिति की हो, चाहे वो जात की हो। आत्मज्ञान का न तो हमारे परिवारों में कोई स्थान होता है, न हमारी शिक्षा व्यवस्था में कोई स्थान है; नतीजा?

झूठी पहचानों को हम अपना परिचय बना लेते हैं। किसी की पहचान क्या बन गई है? मैं अमीर हूँ। किसी की पहचान क्या बन गई है?' मैं बहुत सुंदर हूँ।' किसी की बन गई है, 'मैं तो सवर्ण हूँ।' किसी की क्या बन गई है? 'अरे! मैं तो नीची जात का हूँ।'

इसीलिए बार-बार, बार-बार बोला करता हूँ, उपनिषदों की ओर आओ। वही एक जगह है जहाँ सारे अंतर ख़त्म हो जाते हैं, और तुम्हें तुम्हारी असली जात से पुकारा जाता है। ऋषि तुमको कहते हैं, बेटा! शुद्ध-बुद्ध आत्मा हो तुम, ये जात है तुम्हारी; और बाकी सारी जातें झूठी हैं। पर उनकी ओर हम आते नहीं, अध्यात्म से हमारा कोई वास्ता नहीं; प्रेम करने का हमारे पास समय है।

तुम कह रहे हो, उत्सवों में जाता हूँ, पार्टियों में जाता हूँ, लोग वहाँ पर मुझे अलग निग़ाह से देखते हैं। उन पार्टियों में जाने का तुम्हारे पास समय है! उपनिषद पढ़ने का समय तुम्हें कभी नहीं मिला? क्यों जाते हो इन घटिया पार्टियों में? तुम ख़ुद ही जान रहे हो न कि वो लोग ठीक नहीं हैं? तो ये फिर किस तरीके का आत्मघातक व्यवहार कर रहे हो तुम? जो लोग ठीक नहीं हैं, उनके इर्द-गिर्द क्यों पाए जा रहे हो? जो लोग ठीक नहीं हैं, उनके शादी-ब्याह, उनके उत्सव, उनके रंग-रोगन में तुम शामिल क्यों हो रहे हो? मुझे बताओ न?

एक बार तुम जान गए कि सामने दस लोग रहते हैं, और वो मंदबुद्धि के हैं, और घटिया और संकीर्ण सोच के हैं, तो तुम उनकी पार्टी में शामिल होने जाते क्यों हो?

वो ख़ुद तो गिरे हुए हैं हीं, अपनी बातों से वो तुम्हारी चेतना को भी गिरा देंगे। और अपना काम उन्होंने कर ही दिया है। तुम्हारे इस पूरे कथन में ग्लानि भरी हुई है, अंतरदाह भरा हुआ है, भीतर से जल रहे हो तुम। ये तुमने अपने साथ क्यों होने दिया?

देखो! बहुत आसान है व्यवस्था को दोष देना। हम भी कह सकते हैं कि, 'देखो! अभी भी बहुत सारे महत्वपूर्ण पदों पर, तथाकथित सवर्ण बैठे हुए हैं।' हम अभी भी कह सकते हैं कि, 'देश में जो उपेक्षित जातियाँ हैं और जन-जातियाँ हैं, उनका आर्थिक स्तर नीचे है, उनका शैक्षणिक स्तर नीचे है।'

हम कह सकते हैं, देखो! ये तो इतिहास ने ही अन्याय कर दिया है। और अभी भी जो सामाजिक व्यवस्था है, वो उस अन्याय को पूरी तरह से मिटा नहीं पा रही है। हम ये सब बातें कर सकते हैं। पर मैं ये सब बातें नहीं करना चाहता, क्योंकि ऐसी बातें बहुत की जा चुकी हैं। मैं ऐसी बातें और ज़्यादा करके, तुम्हें और ज़्यादा शोषित अनुभव करने का अधिकार नहीं देना चाहता। क्या करोगे अपनेआप को बार-बार शोषित घोषित करके? उससे जिंदगी बन जाएगी तुम्हारी? मैं पूछ रहा हूँ, बताओ?

हाँ! चलो! पूरी दुनिया ने मान लिया और तुम्हें प्रमाण पत्र भी दे दिया कि साहब! आप एक विक्टिम हो, आप एक शोषित आदमी हो। उससे तुम्हें क्या मिल जाएगा? जिस लड़की से प्यार करते थे, वापस मिल जाएगी? अगर अब तीस साल के हो गए हो, तो जो इतने साल तुमने आत्मग्लानि में बिता दिए, वो तीस साल वापस मिल जाएँगे? बोलो?

तो दुनिया जो कुछ भी कर रही हो, वो दुनिया जाने! दुनिया को बदलने की हम कोशिशें कर लेंगे, लेकिन दुनिया तत्काल नहीं बदलती। और दुनिया पर किसी का पूरा बस नहीं चलता। तुम जाकर के ज़बरदस्ती तो किसी की सोच नहीं बदल सकते हैं न! कोई है, इसी गुमान में फूला हुआ कि, ‘मैं तो ऊँची जाति का हूँ!’ तुमने ठेका ले रखा है उसकी सोच बदलने का?

और वो कह देगा कि, ‘मेरी सोच, मेरी सोच है। मैं ऐसे ही सोचता हूँ, मैं नहीं बदलना चाहता!’ तुम क्या करोगे? तुम रोते रहोगे कि देखो! वो तो अपनेआप को ऊँचा समझता है, मुझे नीचा समझता है? कितने दिन रोओगे ऐसे?

इससे कहीं बेहतर क्या है? तुम कहो, जो ऐसे हैं, वो अपनी दुनिया में ऐसे पड़े रहें, हमें उनसे वास्ता रखना नहीं। और पूरी दुनिया में सब संकीर्ण सोच वाले ही तो नहीं है न? खुले दिमाग के भी लोग हैं। तुम उनसे दोस्ती करो, तुम उनसे नाता बनाओ।

इंटरनेट का ज़माना है, संचार क्रांति का युग है। क्या आज भी ऐसी कोई मजबूरी है कि अपने मौहल्ले में जो लोग रहते हैं, उनसे ही वास्ता रखना है? ऐसी कोई है मजबूरी, बची है? जहाँ चाहो, जा सकते हो। जहाँ चाहो, बस सकते हो। जिन लोगों से चाहो, बात कर सकते हो। दुनिया में हर तरह के लोग हैं। गिरे से गिरे लोग हैं, तो ऊँचे से ऊँचे लोग भी हैं।

ये मत कहो कि, 'समाज मेरे साथ अन्याय करता है।' अपने आपसे पूछो, मैं ऐसे समाज में हूँ ही क्यों, जो अन्याय करता है? क्योंकि समाज एक नहीं होता, सौ तरह के समाज हैं। हर व्यक्ति का अपना एक अलग समाज होता है न?

मैं पूछा करता था, मैं कहता था, तुम अपनी जो फोन की कांटेक्ट लिस्ट है, बताओ उसमें कितने लोग हैं? कितने लोग हैं तुम्हारे? कितने हैं? दो हजार। आपके? दो हजार। और आपके जो दो हजार हैं, और तुम्हारे जो दो हजार हैं, उनमें से साझे कितने हैं? कॉमन? पचास होंगे, बीस होंगे!

तो समाज सबका अलग-अलग होता है कि नहीं होता है? भले ही तुम एक ही जगह पर रह रहे हो, तो भी समाज अलग-अलग होता है। अपने लिए सही समाज चुनो। और ऐसे लोगों को दोबारा अपना दोस्त मत बोल देना, न ऐसे दोस्त बना लेना, जो छोटी सोच के हैं।

बात आ रही है समझ में?

मैंने पहले भी जब इस मुद्दे पर बात करी है, तो लोग आते हैं, वो कहते हैं, आप कास्ट और क्लास का अंतर नहीं साफ़ कर रहे। आप कास्ट को भी ऐसे कह रहे हो, जैसे क्लास हो- 'क्लास बदल जाती है, कास्ट नहीं बदलती है।' कहते हैं, कैसे नहीं बदलती है? मैं बताऊँ कैसे बदलती है? वैसे बदलती है जैसे एक आदमी कपड़ा बदल देता है; दूसरा पहनने के लिए नहीं, बस उतार दिया! हम ये नहीं कह रहे कि, 'हमारी जो जाति थी, वो पहले नीचे थी अब ऊपर हो गई है।' हम कह रहे हैं, मुझे जातिवाद से अब कोई सरोकार ही नहीं!

थोड़ी देर मैंने पहले बोला था न, अपनी असली जात पता चल गई है मुझे। पर नहीं! लोग इस तरीके से सामने रखते हैं कि, 'देखिए साहब! कास्ट तो बदल ही नहीं सकती न! यहाँ तक कि लोग जब धर्म परिवर्तन कर लेते हैं, तो भी उनकी कास्ट नहीं बदलती। वो दूसरे धर्म के हो जाते हैं, लेकिन उनकी जात नहीं बदलती।' ये सब बोलकर के मिलेगा क्या तुमको? तुम सीधे-सीधे अपनी सोच और अपना समाज ही क्यों नहीं बदल देते?

भाई! एक आदमी को अपनी जिंदगी में कितने लोगों से वास्ता रखना होता है, दो करोड़ लोगों से? आपके कांटेक्ट लिस्ट में दो हजार थे, उसके भी दो हजार थे, किसी के दोसौ होते हैं। दो हजार भी बहुत हैं। इतने ही लोगों से तो तुम्हें जिंदगी में वास्ता रखना होता है न, कुछ हजार लोगों से? ये जो कुछ हजार लोग हैं, जिनसे तुम जिंदगी में वास्ता रखने जा रहे हो, इन्हें बहुत समझ-बूझ कर चुनो।

चाहे दोस्ती हो, चाहे विवाह हो, संगति का कोई भी तरीका हो, बहुत सावधान रहो! ऐसे की संगति बिलकुल मत कर लेना, जो तुम्हें तुम्हारी ही नज़रों में दूषित बना दे। जो तुम्हें एक झूठे नाम और झूठी पहचान से पुकारे। ऐसा कोई भी हो, उसको त्यागो! समझ में आ रही है बात?

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=mCE2qEjvPB4

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