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और इन मूर्खों को हम आदर्श मानते आए हैं? || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 min
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आचार्य प्रशांत: जिसमें वो दिखाई दे जाए जो सच हो। जिसमें सच्चाई दिखाई दे जाए उसको आदर्श बनाइए। जो व्यक्ति आपको सत्य दिखा दे उसको आदर्श बनाइए। इंसान अगर सत्य दिखा दे तो आदर्श कहलाने लायक़ है।

प्रश्नकर्ता: लेकिन अभी हम अगर देखें तो जो भी आदर्श माने जाते हैं वो तो बिलकुल सपने में ही जीते हैं और सपने में ही जीने की प्रेरणा भी देते हैं लोगों को। और आज ही बात हुई कि जो कामना में जी रहा है वो सपने में ही जी रहा है।

आचार्य: तो अब ये आपकी दुनिया, आपका समाज आपने जो कर रखा हो मैं थोड़े ही ज़िम्मेदार हूँ। आप किसको आदर्श बना लो। मेरे तो नहीं हैं ये सब आदर्श। आपने बना रखा है आप जानिए। आप उनको आइडियल्स बोलते हो, इन्फ्लुएंसर बोलते हो, रोल मॉडल बोलते हो, लीडर्स बोलते हो तो अब ये आपकी दुनिया है, आप किसी के पीछे-पीछे चल दीजिए उसमें हम क्या कर सकते हैं?

गधे के पीछे हो सकता है पूरी एक भीड़ चली जा रही हो उसमें हम क्या करें? इतने दिनों से तो बोल रहा हूँ न जाने कितनी किताबों में हमारे ये अध्याय आया होगा कि ग़ौर से देखो किसको आदर्श बना लिया है। कितनी ही बार आयी होगी ये बात। ये तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाती है जब तुम अपना आदर्श ग़लत चुन लेते हो। और जो इस समय एकदम घटिया और गिरे हुए लोग होते हैं तुम उन्हीं को आदर्श बना लेते हो।

जो आपकी कामनाएँ हैं वो आप जिसको पाते हो कि वो पूरी कर रहा है अपनी ज़िन्दगी में उसको आप आदर्श घोषित कर देते हो। उदाहरण के लिए, आपकी कामना है, ‘मैं खूब पैसा उड़ाऊँ।‘ आप जिसको पाते हो कि वो पैसा उड़ा भी रहा है और पैसा उड़ाने का भौंडा, अश्लील प्रदर्शन भी कर रहा है वो तुरन्त आपका आदर्श हो जाता है। तो इसलिए तो लोग पैसा सिर्फ़ उड़ाते नहीं हैं, जितना उड़ाते हैं उससे भी ज़्यादा दिखाते हैं कि देखो उड़ा रहे हैं। वो आपकी कामना को अपील कर रहे हैं। वो आपकी कामना से बात कर रहे हैं, कह रहे हैं कि तुम यही करना चाहते थे न हमेशा? नोट उड़ाने हैं यही तुम्हारी कामना थी न?’

शिक्षा ऐसी मिली। परवरिश ही ऐसी मिली कि लगा कि ज़िन्दगी में सबसे ऊँची बात यही है। क्या? नोट उड़ाना। तो ये बात दूसरे को भी पता है। वो कहता है, ‘ये आदमी जी ही रहा है नोट उड़ाने के लिए। तो अगर मैं इसको दिखा दूँ कि मैं कैसे पैसे फूँकता हूँ तो तुरन्त मेरे पीछे-पीछे चल देगा मुझे आदर्श बनाकर।‘ तो वो दिखा भी देते हैं आप पीछे-पीछे भी चल देते हो।

इसी तरीक़े से आपके भीतर यह संस्कार, मूल्य डाल दिया गया कि दूसरों को दबाना, रौब झाड़ना, रुतबा बताना, दबंगई दिखाना बड़ी बात होती है। आपके हुक़्म पर सौ सिर झुक जाएँ ये बहुत बड़ी बात होती है। तो फिर आप तमाम तरह के लठैतों को, बाहुबलियों को और नेताओं को अपना आदर्श बनाते

आपका नेता क्या है? कोई विद्वान है? कोई ज्ञानी है? आपके नेता में क्या ख़ास बात है? यही तो ख़ास बात है कि आप जो होना चाहते हो वो आप उसमें बिलकुल प्रतिबिम्बित देखते हो। वो हर उस चीज़ का प्रतिनिधि है जो आपने चाही थी और आपको मिली नहीं। आपने चाही, आपको मिली नहीं, वो दिखाता है, ‘जो तुम्हें चाहिए था, देखो मुझे मिला हुआ है।‘

तुम पीछे से पों-पों-पों हॉर्न मारते रहते हो अपनी स्कूटी में। तुम्हें ठेले वाला भी बग़ल नहीं देता। भैंसा गाड़ी भी रास्ता नहीं देती। और तुम पीं-पीं-पीं अपना बजा रहे हो। और तुम्हें बड़ा क्रोध आता है। तुम चाहते हो कि तुम्हारी हुक़ूमत चले, दबंगई चले। और सड़क पर जब तुम चलो तो सब तुम्हारे लिए रास्ता छोड़ दें। वो देखो फिर वो वहाँ मन्त्री जी का क़ाफ़िला निकल रहा है। और मन्त्री जी बहुत पुराने हिस्ट्रीशीटर हैं। सत्ताइस हत्याएँ, चौबीस बलात्कार, पचास अन्य तरीक़े के मुकदमे उन पर दर्ज़ हैं।

और जब उनका फिर क़ाफ़िला, इसीलिए तो मन्त्री बने हैं वरना मन्त्री कैसे बन जाते? और फिर उनका जब क़ाफ़िला निकल रहा है तो देखा कैसे सब रास्ता छोड़कर खड़े हो जाते हैं? वो जो सब रास्ता छोड़कर खड़े हो जाते हैं आपको आपकी अपूर्ण कामनाएँ दिख जाती हैं। कहते हैं, ‘यही तो मुझे हमेशा से चाहिए था मुझे नहीं मिला इसको मिला है तो ये मेरा आदर्श हो गया। बस ऐसे आदर्श बनते हैं। आपके आदर्श वो थोड़े ही हैं जो आपको ज्ञान समझा दें। आपके आदर्श वो हैं जो आपके अज्ञान में और वृद्धि कर दें।

जो आपको मूर्खता से मुक्ति दिला दे वो थोड़े ही आदर्श बनेगा। जो आपकी मूर्खता का एक सम्वर्धित नमूना हो, एक मैग्निफ़ाइड सैम्पल ; वो आपका आदर्श बनता है। ‘मैं छोटा मूर्ख हूँ और वो मुझसे हज़ार गुना ज़्यादा बड़ा मूर्ख है तो वो मेरा रोल मॉडल हो गया न फिर।’ ऐसे आप आदर्श बनाते हो।

लेकिन कृष्णों की दुनिया में ये सब नहीं चलता। वहाँ पर तो आदर्श का मतलब होगा जो आपको सच्चाई दिखा दे वो आदर्श है। जो आपको सच्चाई दिखा दे वो आदर्श है। दर्पण का तो आध्यात्मिक साहित्य में बार-बार उल्लेख आता है। और इसी अर्थ में आता है सच्चाई जो दिखाए, सच्चाई जो दिखाए। अभी हाल का तो भजन है। हाँ, “तोरा मन दर्पण कहलाए।”

सुना है “तोरा मन दर्पण कहलाए”?

प्र: भले-बुरे सारे कर्मों को....

आचार्य: देखे और दिखाए। कि सच्चाई दिख जाती है। मन निर्मल हो तो वही बता देता है तुम्हारी हालत क्या है। वैसे ही गीतकार थे कवि प्रदीप उनका है कि

“मुखड़ा देख ले प्राणी ज़रा दर्पण में। देख ले कितना पाप है कितना पुण्य तेरे जीवन में।”

तो ये तो फ़िल्मी दिशा से हो गया। अन्यथा भी। तो दर्पण का उस अर्थ में नहीं कि जो हमारा शीशे वाला मामला होता है चमकाया हुआ। तो सरोवर की सतह की बात उपनिषद् करते हैं दर्पण की तरह। वो क्या बोलते हैं? वो बोलते हैं, ‘मन सरोवर की सतह की तरह है। अगर मन में कामना नहीं होगी तो उसमें चाँद बिलकुल यथा रूप प्रतिबिम्बित होगा जैसा है वैसा ही दिखेगा। लेकिन कामना क्या पैदा कर देती? बोले, ‘कामना ऐसी ही है जैसे तुमने सरोवर में कंकर डाल दिया।’ चाँद यथा रूप दिखाई दे रहा था जैसे दर्पण में दिखाई देता है। तुमने कंकर डाल दिया अब क्या होता है? कैसा दिखाई देता है अब चाँद? विकृत हो गया अब झूठ दिखाई देगा। मन में कामना आयी नहीं कि जो है अब सब झूठ दिखाई देगा। समझ में आ रही है बात?

मन में कामना आयी और जो कुछ साफ़ दिखाई भी दे रहा था वो सब ऐसे, ऐसे, ऐसे, ऐसे (हाथ हिलाते हुए)। जैसे पुराने घरों में, अगर आप उस समय के हो जब वो लम्बा एंटीना लगा करता था दूरदर्शन देखने के लिए। और लोग बड़े परेशान होते थे उस पर आकर कौआ बैठ जाता था। और कौआ क्या करता था? एंटीने को थोड़ा सा और इधर स्क्रीन क्या करती थी? स्क्रीन नाचना शुरू कर देती थी। कभी बन्दर आ गया तो फिर तो कह ही नहीं सकते क्या होगा। पर बन्दर की ज़रूरत नहीं, कौआ पर्याप्त होता था। सब हिलने लग जाता था।

कामना कौआ है। मन एंटीना है। सब हिल जाता है। जो दिखाई दे रहा है वो सब कुछ-का-कुछ हो जाता है। कभी जीवन में कोई चीज़ समझ में न आ रही हो एकदम अनसुलझी रह जा रही हो तो साफ़ समझ लीजिएगा कामना के लेंस से देख रहे हो मुद्दे को।

कामना का चश्मा उतारो, हर चीज़ साफ़ होगी बिलकुल। जो कहते हो न, ज़िन्दगी उलझी हुई है बात समझ में नहीं आ रही है कुछ। क्या उलझा हुआ है? यहाँ कुछ उलझने जैसा है ही नहीं। सब चीज़ एकदम स्पष्ट है। आपको अगर नहीं समझ में आ रही है तो माने आप कामना के धुएँ के पीछे से देख रहे हो। वो हटा दो, सब साफ़ दिखने लगेगा। हर चीज़ एकदम खुली किताब जैसी है।

‘सिन सिन मिंग’ है बहुत अद्भुत छोटा सा ग्रन्थ। इतना छोटा जैसे उपनिषद् छोटे से होते हैं। अति संक्षिप्त। तो चीनी ऋषि हैं सेज़ेन, उनका है। तो उसमें वो एकदम आरम्भिक बात बोलते हैं। वो बोलते हैं, ‘इफ़ यू वांट टू नो द ट्रुथ, गेट रिड ऑफ यौर ओपिनियन’ (यदि आप सत्य को जानना चाहते हो तो अपने मतों से छुटकारा पाओ) आप ओपिनियन को डिज़ायर समझो।

सत्य जानना है तो सबसे पहले अपना मत एक तरफ़ रखो। और मत माने काम। जिसके पास काम है उसको सत्य कभी नहीं मिल सकता। हम विद्रोह की बात करते हैं न बार-बार। गीता में करते हैं, उपनिषदों में करते हैं; उस विद्रोह का ही एक पहलू एक, फेसेट ये है झूठे आदर्शों के खिलाफ़ विद्रोह।

‘झुकाती होगी दुनिया तुम्हारे सामने सिर हम नहीं झुकाएँगे। तुम सत्य के जब प्रतिनिधि नहीं हो पाये तो मेरे आदर्श कैसे हो सकते हो? तुम सच के नहीं हो पाये मैं तुम्हारा हो जाऊँ। ऐसा कैसे भाई? नहीं झुकाएँगे सिर। तुम क्या मेरी ज़िन्दगी में सच्चाई ला रहे हो? नहीं सच्चाई तो ला नहीं रहे, तुम तो खुराफ़ात ला रहे हो तो तुम मेरे आदर्श कैसे हो सकते हो? नहीं झुकाऊँगा सिर। दुनिया तुम्हें कुछ मानती हो, पूजती हो, होगे, कुछ होगे, नेता हो ये हो सेलिब्रिटी हो जो भी हो। मेरे लिए तुम धूल बराबर नहीं हो। तुम आओ तो हम कुर्सी से उठकर खड़े न हो ये हमारी दृष्टि में औकात तुम्हारी। दुनिया तुम्हें पूजती होगी। हम तुम्हारी तरफ़ देखेंगे भी नहीं। नहीं बनाऊँगा आदर्श तुम्हें।’

ये बहुत बड़ी बात है। इसीलिए कहता हूँ कि आध्यात्मिक आदमी वो जिसका सिर हर जगह नहीं झुकता। जिसका सिर आप पाएँ कि हर चौखट पर नमित है, जो मिला उसी को, ‘जी, हैं, हैं, हैं, हैं, हैं’ (हाथ जोड़ते हुए)। ये आदमी कुछ भी हो सकता है ये सामाजिक टट्टू है। ये धार्मिक सूरमा नहीं कहीं से। धार्मिक सूरमा की पहचान यही है — जहाँ झुकना है वहाँ वो उठ नहीं सकता।

भला-बुरा कहा जाए उठ नहीं भागिए।

वो वहाँ पर किसी हालत में न उसका सिर उठ जाएगा, न त्योरियाँ चढ़ जाएँगी, न ज़बान खुलेगी उसकी। और बाक़ी दुनिया वाले आयें वो झुक नहीं सकता। ये दोनों बातें उसकी एक साथ चलती हैं।

हमारा उल्टा रहता है। जहाँ गये थोड़ी बड़ी दुकान दिखी नहीं कि वहीं पर, ‘हें, हें, हें, हें, हें।‘ योग में, पतंजलि योग शास्त्र में जब पाँच-सात साल पहले बात कर रहे थे, तो वहाँ एक बात आती है कि रीढ़ जो है वो तनी हुई हो, सीधी हो। ज़मीन से बिलकुल नब्बे अंश के कोण पर, पर्पेंडीकुलर। बाक़ी तो चलो इसका जो भौतिक, शारीरिक अर्थ है वो तो है ही। लेकिन इसका जो मानसिक अर्थ है वो भी समझो। जो अपनी रीढ़ सीधी नहीं रख सकता वो योगी कभी नहीं हो सकता। रीढ़ का मतलब समझते हो न? वो रीढ़ नहीं जो इधर पीछे होती है। एक रीढ़ होती है जिस पर ये शरीर टिका होता है। और एक रीढ़ होती है जिस पर चेतना अवलम्बित होती है। दोनों ही रीढें सीधी होनी चाहिए। चेतना ऐसी चीज़ नहीं है कि कहीं भी झुक गयी।

और ये बात कृष्ण, उपनिषद्, पतंजलि भर की नहीं है। आप ग्रीस चले जाओगे वहाँ सुकरात की भी बात यही थी। सुकरात की ज़्यादा बात सुनने वहाँ के जवान लोग ही आते थे। और जो एक शिक्षा थी सुकरात की उनको वो ये थी कि झुकना नहीं। नमस्ते भी नहीं करना।

बोले, ‘ये सब कुछ चीज़ इस पर निर्भर करेगी कि वो व्यक्ति वास्तव में कितना ज्ञानी है।‘ तो बोले कि जब किसी से मिलो तो नमस्ते पहली चीज़ नहीं होनी चाहिए ‘नमस्ते’, आख़िरी चीज़ होनी चाहिए। समझिएगा। हम किसी से मिलते हैं तो पहली चीज़ होती है — नमस्ते। सुकरात ने कहा, ‘नहीं, पहली चीज़ होगी — बहस। और बहस माने ये नहीं कि फ़ालतू का वाद-विवाद, गर्मा-गर्मी; वो नहीं। बहस माने जैसे समझो शास्त्रार्थ। बहुत विनम्र, बहुत गहरा, ज्ञान से भरा हुआ। बोले, ‘जो तुम्हारे सामने आता हो।‘

और वो समय, उस समय एक-से-एक यूनान में घूमते थे, सब सोफिस्टस का जमाना था वो। सब अपना ज्ञान ही बताते थे अपने आपको। और सुकरात का जो पूरा तरीक़ा था वो संवाद का था, डायलेक्टिकल मेथड। ये सुकरात से ही आया। सुकरात से क्या आया उपनिषदों में भी मौजूद है। पर उधर सुकरात से। तो वहाँ बातचीत का चलता था। तो सुकरात बोले कि नहीं पहले बातचीत करो और बातचीत में बन्दा खरा दिखे तो बोलो फिर ‘नमस्ते’।

अब ये सब बात बता दी। वहाँ जितने सब जवान लोग थे वो सब सुनने लग गये सुकरात को। और वहाँ वो सब अधेड़ उम्र के पंडित, ज्ञानी घूम रहे हैं। वो किसी को नमस्ते ही न करें। इसी चक्कर में, और भी कारण थे; पर एक कारण ये भी था फिर सुकरात को ले गये बोले, ‘तुम ज़हर पियो। तुमने पूरी जवानी ख़राब कर दी पूरे शहर की। ये सब अब बिलकुल हाथ से निकल गये लड़के। ये न राज्य के सामने झुकते हैं न परिवार के सामने झुकते हैं न पांडित्य के सामने झुकते हैं।’ कोई मिल जाए तो उससे कहते हैं, ‘आइए ज़रा दो मिनट बात करते हैं।‘ और जगह-जगह पर ये सुकरात के शिष्य घूम रहे हों, वो चौराहों पर वहाँ पर कैफ़े जैसे होते थे जहाँ सब बैठ कर के अपना चाय और ये सब अपना होता था। बीयर पीते थे। वहाँ की अपना जो भी संस्कृति।

वहाँ इनके घूमते रहें। और जो बैठा हो उससे आकर कहें, ‘थोड़ा दो मिनट बात करेंगे क्या?’ वो भी ये कहें बिना ‘नमस्ते’ करे।

अध्यात्म में ये बहुत मूलभूत बात है। ये छोटी चीज़ नहीं है। ऐसे नहीं झुक जाएगा। नमस्ते का मतलब होता है नमन। नमन माने? नमन माने? झुकना। अरे ऐसे कैसे झुक जाएँ? और फिर तुम्हारे आगे झुक जाएँ तो उधर फिर कैसे झुकेंगे जहाँ सच्चाई है? दो जगह नहीं झुका जाता। दो जगह नहीं झुक सकते। और झुकने को हम तैयार हैं। कोई पूर्वाग्रह पालकर नहीं आये हैं लेकिन पहले दो मिनट कुछ बात करेंगे।

और दो मिनट जो बात करें उसमें एकदम पोल खोल हो गयी। बंटाधार। कोई सब इधर-उधर भागें, फिरें, फिर गुस्सा जाएँ लोग, ये सब भी हो। अदालतों के जजों को पकड़ लें। बोलें कि अभी-अभी आप फैसला देकर आ रहे हो। एक को मृत्यु दंड दिया है। थोड़ा समझाइएगा, ये फैसला कैसे दिया है? और वो अन्दर लिख आएँ हैं, फैसला तो नहीं पलटा जा सकता। अब न्यायाधीश महाराज अन्दर योर-ऑनर बने हुए थे। और बाहर आज के चार लड़कों ने पकड़ लिया बीस-पच्चीस साल के। और वो उनसे बिलकुल तार्किक बात करने लगे हैं।

तो वो जो पूरी न्यायपालिका थी, पूरी ज्यूडीशरी ; वही सुकरात के ख़िलाफ़ हो गयी। उन्हीं लोगों ने तो सबने तय करा था कि फिर मारो इसको, बुड्ढे को। ये तो सब-सब पूरा, कैसे बोलते हैं न, ‘सिस्टम ख़राब कर देगा!’ उसने वहाँ का पूरा सिस्टम ही ख़राब कर दिया था। और बहुत मूलभूत बातें हैं। ‘थोड़ा समझाइएगा जस्टिस की परिभाषा क्या है।’ वो जज बना हुआ है और उससे जस्टिस की परिभाषा पूछ ली, वो गोल-गोल घूमने लग गया। वो बता ही न पाए। उनमें भी प्लेटो जैसे धुरंधर। वो कोई ऐसा नही कि साधारण लड़का; वो भारी पहलवान। और वो एक पहलवान घूम रहा है इधर-उधर चौराहों पर और जो मिल रहा है उसको पकड़ रहा है, कह रहा है, ‘इधर आ, इधर आ। हाँ भई, क्या है? तू जज है? थोड़ा बताना किस हिसाब से तू जजमेंट देता है? वो इतना (दोनों हाथों को से दर्शाते हुए) चौड़ा। प्लेट जैसे होती है चौड़ी प्लेट। तो उसी प्लेट से नाम आया है प्लेटो। प्लेट कैसी होती है? ऐसी चौड़ी होती है न। तो प्लेटो वहाँ यूनान का नामी पहलवान। वो इतना चौड़ा। और उसके बारे में ये कहते थे कि कई बार जब वो किसी से बात करे और सामने वाला गुस्साकर कुतर्क करने लगे तो, प्लेटो यूज़ टू सेटल द आर्गूमेंट जस्ट बाई फ्लेक्सिंग हिज़ मसल्स (अपनी माँसपेशी दिखाकर बहस को सेटल करते थे)।

ऐसे करके (दोनों हाथों को चौड़ा कर ऊपर उठाकर दिखाते हुए) खड़ा हो जाता था कुछ देर तक तो ज्ञान की बातचीत करी और जब देखा कि अब ज्ञान की बातचीत में इसके पास कुछ बचा नहीं तो कुतर्क फेंक रहा है। तो प्लेटो फ़ालतू की बातचीत में नहीं पड़ते थे। प्लेटो बस ऐसे खड़े हो जाते थे उसके सामने। बोलते थे, ‘ये आख़िरी तर्क है बता अब चाहिए क्या?’

ये बोलते भी नहीं थे बस ऐसे। प्लेटो यूज टू सेटेल आर्गूमेंट जस्ट बाइ फ्लेक्सिंग हिज़ मसल्स। और वहाँ के नामी पहलवान। पूरा ग्रीस थर्राया हुआ। बोल रहे, ‘ये क्या कर दिया?’

अब आपके लिए असाइनमेंट सुकरात के बारे में सुकरात की पत्नी के क्या उदगार थे? ये आप खोजकर लाएँगे। बड़े मज़ेदार थे। अभी तो सुनने में ऐसा लग रहा है कि महान आदर्श सुकरात युवाओं के। पर उनके घरवाले उनके बारे में क्या सोचते थे ये थोड़ा पढ़िएगा।

श्रोतागण: पानी डाल दिया था।

आचार्य: अरे, पानी ही नहीं डाल दिया था उसमें और भी बहुत बातें हैं। इधर-उधर ज्ञान देके सुकरात के पास पैसा भी हो तो लोगों को घूस दिया करते थे, बोलते थे, किसी को पकडें, बोलें, ‘आओ, आओ चाय पिलाएँगे मुफ़्त की।‘ तो वो आ जाए। चाय पिलाएँ मुफ़्त की। वो बैठे कहीं पर कैफ़े-वैफ़े में।

तो वो मुफ़्त की चाय पीने आ गया था। उसको चाय पिलाएँ और साथ ही साथ बातचीत शुरू कर दें। वो फँस गया। अब चाय गर्म है तुरन्त सुड़क के तो भाग नहीं सकता। तो जितनी देर में चाय धीरे-धीरे ठंडी हो, वो पिए उतनी देर में सुकरात उसका दही कर दें बिलकुल।

और पैसे वैसे ही नहीं कमाते थे। पत्नी बुरी तरह खफ़ा। पत्नी बोली, ‘बाक़ी तो सब चीज़ें ठीक हैं कभी घर पर दो रोटी भी ले आ दिया करो।‘ तो इसका सुकरात ने क्या जवाब दिया आप लोग आज खोजकर के ऐप पर डालिएगा। पत्नी बोली, ‘बाक़ी सब चीज़ें ठीक हैं कभी घर पर दो रोटी भी तो ले आ दिया करो।‘

तो देखिये क्या जवाब आया। लेकिन वो जो जवाब आया वैसे को आदर्श बना नहीं पाओगे न। अब पत्नियाँ कैसे ऐसे पति को आदर्श पति मानेंगी? हमारे लिए तो आदर्श पति वो है जो...।अब कल धनतेरस है, आज धनतेरस है। अभी करवाचौथ थी अब धनतेरस है। तो आदर्श पति अब सुकरात जैसा थोड़े ही होगा हमारा। वो तो कुछ और ही चाहिए। मामला ही दूसरा है।

ज़िन्दगी में आप किसको सम्मान देते हो इसी से तय हो जाता है आपकी किस्मत क्या है। आपको ग़लत आदमी को पहचानना हो बस ये देख लेना कि ग़लत लोगों को सम्मान कौन दे रहा है। किसी भी गिरे हुए, गर्हित व्यक्ति को देख लो और जितने लोग उसके सामने अदब से खड़े हों जान लेना यही हैं समाज के विषाणु। बहुत हो गया है या बोलूँ इसपर?

धूमिल के बहुत सुन्दर वचन हैं। कहते हैं आदर्शों को लेकर के।

कहते हैं, “वैसे तो मैं ठंडा आदमी नहीं हूँ।” अब निकाल लीजिए तो।

मैं उद्धृत करता हूँ उसमें कुछ-न-कुछ।

वैसे तो मैं ठंडा आदमी नहीं हूँ मुझमें भी आग है। मगर उस आग के चारों तरफ़ चक्कर काटता एक पूँजीवादी दिमाग है।

जो चाहता है कि…. (अब याद नहीं आ रहा...)

जो चाहता है कि चीज़ों की शिष्टता बनी रहे। कुछ इस तरह कि विरोध में उठी हुई मुट्ठी भी तनी रहे और काँख भी ढँकी रहे

माने विद्रोह भी करना है लेकिन अपनी जो सामाजिक शर्म-ओ-हया है, प्रतिष्ठा है उसको भी बचा कर चलना है। दोनों चीज़ें एक साथ हो नहीं पातीं। तो हम किसी को भी फिर? कहाँ विद्रोह कर पाएँगे?

वैसे ही और भी है इसमें उनका, कि अब याद नहीं आ रहा कविता का नाम है, ‘हिन्दुस्तान एक पटकथा।‘ उसमें इस तरीक़े के बहुत सारे उद्धरण हैं। इन्हीं पर हैं कि हम किनके पीछे चल दिये हैं।

तो सही काम करने का जब वक़्त आया तो उस समय पर आम आदमी की क्या दशा होती है इसको लेकर बोलते हैं। कहते हैं,

“मगर मैं हिचक रहा था।” अब जान गये हैं कि सही काम क्या है तब भी। (धूमिल जी की कविता पढ़ते हुए)

मगर मैं हिचक रहा था क्योंकि मेरे पास कुल जमा थोड़ी सुविधाएँ थीं जो मेरी सीमाएँ थीं

वही सुविधाएँ (आगे पढ़ते हुए)

क्योंकि मेरे पास कुल जमा थोड़ी सुविधाएँ थीं जो मेरी सीमाएँ थीं यद्यपि यह सही है कि मैं कोई ठंडा आदमी नहीं हूँ मुझमें भी आग है मगर वो भभककर बाहर नहीं आती क्योंकि उसके चारों तरफ़ चक्कर काटता एक पूँजीवादी दिमाग़ है जो परिवर्तन तो चाहता है मगर आहिस्ता-आहिस्ता जो परिवर्तन तो चाहता है मगर आहिस्ता-आहिस्ता कुछ इस तरह की चीज़ों की शालीनता बनी रहे कुछ इस तरह की काँख भी ढँकी रहे और विरोध में उठे हुए हाथ की मुट्ठी भी तनी रहे और यही वजह है कि बात फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है क्योंकि हर बार चन्द सुविधाओं के लालच के सामने अभियोग की भाषा चुक जाती है

कामना दिखाई पड़ी कहीं? कौनसा शब्द है? लालच। लालच। जहाँ लालच होगा वहाँ ग़लत आदर्श बनेगा ही बनेगा। क्योंकि चन्द सुविधाओं के लालच के आगे अभियोग की भाषा चुक जाती है। अभियोग माने इल्ज़ाम। जो, जो ग़लत है उसको ग़लत नहीं बोल पाते। उस पर ग़लत होने का इल्ज़ाम नहीं लगा पाते, अभियोग नहीं लगा पाते। क्योंकि भीतर क्या बैठा है? सुविधाओं का लालच।

पढ़ लीजिएगा बहुत है (पूरी कविता को देखते हुए)। जिनको हम आदर्श बनाते हैं लगभग उन्हीं के लिए यहाँ पर उनके नाम दिये हैं।

(कविता की पंक्ति पढ़ते हुए )

हर तरफ़ तरह-तरह के जंतु हैं।

ये जो जिनको हमने अपने आगे-आगे कर रखा हैं कि यही तो हैं जो हमें बताएँगे सब सेलिब्रिटी। तो इनके लिए बोल हैं, (पुनः कविता पढ़ते हुए)

हर तरफ़ तरह-तरह के जंतु हैं। श्रीमान किन्तु हैं मिस्टर परन्तु हैं कुछ रोगी हैं कुछ भोगी हैं कुछ हिजड़े हैं कुछ जोगी हैं।

ये हैं हमारे आदर्श। अच्छी कविता है पढ़िएगा। इंसान बनो। ये स्पाइन लेसनेस (रीढ़ का न होना) बहुत हो गयी पौरुष हीनता। जिसको अभी वो कह रहे थे ‘हिजड़ापन,’ बहुत हो गया। काहे के लिए गीता पढ़ रहे हो अगर अभी भी उन्हीं के पीछे-पीछे चलना है, वहीं जयकारा मारना है? फिर छोड़ो कृष्ण को।

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