प्रश्नकर्ता: गुरुजी, जब भी हमारे गुरुभाई, गुरुबन्दगी की बात करते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि हम भी पूरी बन्दगी कर सकते हैं। अकेले बैठकर भी ऐसा लगता है कि उनकी संगति में ही हूँ, पर जब अकेले नितनेम या गुरुबन्दगी करने बैठने लगते हैं, तो कठिनाई महसूस होती है।
कई बार हमारा मन ये भी कहता है कि अब क्या बन्दगी करता है? गुरुभाई के पास बैठ तो आया, हो गया तेरा नितनेम तो। अर्थात्, गुरुभाई के साथ रहने में एक ऊर्जा थी जिससे हम सिमरन (ध्यान) कर पाते हैं, वो सिमरन हम अकेले में क्यों नहीं कर पाते? गुरूजी कृपया निवारण बताऍं।
आचार्य प्रशांत: ये तो तुमने सीधे-सीधे संगति के असर की बात कर दी है। मन प्रभावों का संकलन है, हम कहीं के नहीं हैं, हम जहाँ के हैं, हम वहीं के हैं। आप अभी यहाँ मेरे सामने बैठे हो तो देखो कैसे हो। और याद करना वो पिछला विवाहोत्सव जिसमें शिरकत करके आये हो, उसमें कैसे थे? अच्छा ठीक है, पूछ लेता हूँ, कौन-कौन है जो कभी-न-कभी घोड़ी के आगे नाचा है? ईमानदारी से बताना? तब कैसे लगते हो?
अच्छा वो जो वहाँ जगह है खाली (एक ओर इशारा करते हुए), ठीक अभी वहाँ नाचने लग जाओ, जैसे घोड़ी के सामने नाचे थे तो कितना साफ़ हो जाएगा न, कितने खौफ़नाक तरीक़े से उद्घाटित हो जाएगा न कि हम कितने सारे चेहरे रखते हैं, हम बहुचित्तवान हैं, हम बहुमुखवान हैं, हम बहुमनवान हैं। देखो वहाँ पर अपनेआप को घोड़ी के सामने। और तुम कहते हो कि तुम, तुम हो, तुम अपनी हस्ती में एक सातत्य की बात करते हो।
अगर तुम्हारा नाम है निखिल प्रसाद, तो तुम कहते हो निखिल प्रसाद ही था जो घोड़ी के सामने नाचा था और निखिल प्रसाद ही है जो अभी सत्संग में शान्त और मौन बैठा है। क्या वास्तव में? नाम एक है और नाम बड़ा भ्रामक है। वो आदमी ही बिलकुल दूसरा था जो नशे में घोड़ी के सामने, ढोल की थाप पर, सड़क पर, उजड्ड बनकर नाच रहा था। वो आदमी ही बिलकुल दूसरा था न? ऐसा कैसे हो जाता है कि कभी तुम लफंगे हो जाते हो और कभी साधक? माहौल की बात है।




