वासना मिटती क्यों नहीं, सौ ठोकरें खाकर भी? || आचार्य प्रशांत, उद्धरण

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने दुनिया देख ली, अपना अनुभव देख लिया, दूसरों का अनुभव देख लिया, लेकिन फिर भी स्त्रियों की ओर खिंचाव रहता है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारे सामने कोई स्त्री हो जो एकदम ही बेहूदी हो, उल्टी-पुल्टी बातें करती हो, गिरा हुआ उसका आचरण हो, झूठी हो, मक्कार हो, धोखेबाज़ हो, हिंसक हो, तो भी क्या तुम उसकी ओर आकर्षित होते हो? बोलो, नहीं होते न? माने सब स्त्रियों की ओर तो तुम आकर्षित नहीं हो जाते। कुछ तो तुम उसका गुण और ज्ञान भी देखते हो न। अच्छा, और आगे का उदाहरण ले लो, बड़ी ख़ूबसूरत स्त्री हो और तुम्हें पता चल जाए कि ये तो ख़ून पीती है; आकर्षित होओगे उसकी ओर?
अरे भाई, कितनी ही ये जो भूतिया फ़िल्में बनती हैं उसमें जो भूतनी होती है वो बला की ख़ूबसूरत होती है, ज़बरदस्त। वो फँसाती ही ऐसे है लोगों को कि वो अपने रूप का जाल बिछाती है और पंछी आकर फँसते हैं। लेकिन जैसे ही उनको पता चलता है कि ये जो इतना ख़ूबसूरत रूप हमें दिखाया जा रहा है, इसके पीछे बड़ी हिंसक भावना है, वो पंछी फिर फडफड़ा के भागना चाहते हैं, बचना चाहते हैं। तो ऐसा तो नहीं है कि सुन्दर रूप तुम्हें दिखा नहीं कि तुम फँस ही जाओगे। कुछ तो तुम, मैंने कहा, उसके गुण और ज्ञान का विचार करते हो न? करते हो न?
कोई बहुत भी सुन्दर हो, लेकिन तुम्हें दिखाई दे कि अज्ञानी ही नहीं है, कपटी है, धोखेबाज़ है और हिंसक है, तो तुम्हारा आकर्षण कम हो जाएगा। और बहुत तुम उसका उग्र तेवर देख लो तो आकर्षण फिर विकर्षण में बदल जाएगा, तुम दूर भागोगे। ऐसा होता है न? तो इसका मतलब तुम जानते हो, तुम्हारी चेतना जानती है कि सब स्त्रियाँ इस क़ाबिल नहीं होतीं कि उनकी ओर बढ़ा जाए। इसी तरह स्त्रियों की चेतना भी जानती है कि सब पुरुष इस लायक नहीं होते कि उनकी ओर बढ़ा जाए, है न?
इसी बात को बढ़ाओ, इसी का नाम आत्मज्ञान है। अपनी चेतना को और प्रबल करो। तुम्हारी चेतना तुमको ये सन्देश तो देती ही रहती है न कि शरीर भर से कुछ नहीं होता भई, थोड़ा उसके अन्तर-जगत में भी ख़ूबसूरती होनी चाहिए। लेकिन जो तुम्हारी गाड़ी है, जो शरीर है, ये शरीर इन बातों का बिलकुल विचार नहीं करता कि जो तुम साथी खोज रहे हो, जोड़ीदार खोज रहे हो, वो भीतरी तौर पर कैसा है।



