सच्ची मित्रता, सच्ची संगति || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्नकर्ता : कभी मैं बहुत ज़्यादा फ़्रैन्ड्ली (मित्रवत) हो जाता हूँ किसी से एकदम। क्या यह मेरे लिए सही है?
आचार्य प्रशांत : अगर कह दिया जाए कि नहीं सही है, तो क्या करोगे? कह रहे हो बहुत जल्दी किसी से फ़्रैन्ड्ली हो जाते हो। तो अगर कह दिया जाए कि नहीं ये सही नहीं है, तो क्या करोगे?
प्र : अगर कह दिया जाए नहीं करेंगे, तो ये दोनों ही सम्भावनाओं में मिलना-जुलना तो ज़रूर पड़ेगा। ऐसे तो यह व्यक्ति अकेला ही रह जाएगा। दोस्त नहीं बनाएँगे, तो अकेले ही रहेंगे।
आचार्य : कुछ फ़र्क पड़ेगा, अगर मैं कह दूँ कि नहीं, दोस्ती करना ग़लत है, बुरा है? कोई फ़र्क पड़ेगा?
प्र : नहीं।
आचार्य : तो फिर सवाल क्यों पूछ रहे हो?
प्र : मतलब कभी-कभी ऐसा होता है न, कोई दोस्त बनाते हैं, जल्दी मित्रवत हो जाते हैं। कोई एकदम से धोखा दे देते हैं।



