तुम चाहते हो कि उनको ये जताए भी रहो कि मैं तुम्हारा हूँ और बीच-बीच में हर छः महीने में चार दिन के लिए किसी शिविर इत्यादि में जाकर शांति भी भोग लो। ये धोखा करने की बहुत लोग कोशिश करते हैं। वो सोचते हैं कि वो शैतान को धोखा दे रहे हैं। उन्हें पता नहीं होता है कि वो खुद को धोखा दे रहे हैं, आत्मा को धोखा दे रहे हैं।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे अपने दोस्त अच्छे नहीं लगते लेकिन दोस्ती तोड़ने का मन भी नहीं करता है। क्या ये सही है?
आचार्य प्रशांत: तुम कुछ दिनों के लिए जान बचाना चाहते हो, पर पूरी तरह बचने का तुम्हारा इरादा भी नहीं है। जान बचाना चाहते हो इसका प्रमाण ये है कि तुम ये नहीं चाहते कि वो यहाँ आएँ। और पूरी तरह बचने का इरादा नहीं है इसका प्रमाण ये है कि तुम दोस्ती कायम रखोगे।
अगर दिख ही रहा है कि दोस्त ऐसे है कि यहाँ आएँगे तो तुम्हारा दिमाग भ्रष्ट ही करेंगे, तो इन तथाकथित दोस्तों से पिंड ही क्यों नहीं छुड़ा लेते?
प्रश्नकर्ता: साथ मे पढ़ते हैं सर?
आचार्य प्रशांत: तो साथ में पढ़ते हैं तो? साथ में पढ़ते हैं तो दोस्त कैसे हो गये। वो अपनी किताब से पढ़ते हैं या तुम्हारी किताब से?




