प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मित्रों से परेशान हूँ, वो मुझसे वो करवाना चाहते हैं जो मेरा करने का मन नहीं है। ‘बाबर जी!’ (प्रश्नकर्ता को सम्बोधित करते हुए, श्रोतागण हँसते हैं) मेरे अन्दर किसी तरह का बदलाव उन्हें स्वीकार नहीं है तो क्या मैं उन्हें त्याग दूँ या उनके साथ हो लूँ? मार्गदर्शन दें।
आचार्य प्रशांत: उतने सीधे आप हो नहीं जितने लगते हो। दोस्त चिकन खिलाए तो तुम खा लेते हो और फिर कहते हो कि ये दोस्त गुमराह करते हैं — ‘दोस्तों के प्रभाव तले चिकन खा लिया!’ और कोई दोस्त तुम्हें नीम का काढ़ा पिलाए तो तुम पीते हो? जवाब दो, बोलिए।
तो ऐसा कैसे है कि तुम दूसरों के प्रभाव में चिकन खाने को तो तैयार हो जाते हो पर दूसरा ही जब तुम्हें प्रभावित करके कहे कि नीम का काढ़ा पी लो तो तुम तैयार नहीं होते, अब बात दूसरे की है कि तुम्हारी है। बोलिए, बात दूसरे की है कि तुम्हारी है?
दो बातें हैं — तुम वैसे ही दोस्त आकर्षित करते हो जैसे तुम हो या जैसे तुम हो जाना चाहते हो। दूसरी बात कोई भी तुमसे बस वही करा सकता है जो करने के लिए तुम आन्तरिक रूप से तैयार बैठे ही हो।
तुम मुक्ति के लिए तैयार नहीं हो कोई गुरु तुम्हें मुक्ति नहीं दे सकता। और तुम माँस के लिए तैयार नहीं हो तो कोई दोस्त तुमको माँस नहीं खिला सकता। होगा अंततः वही जिसके लिए तुम तैयार हो। गुरु बहाना है और कुसंगति भी बहाना है। गुरु भी कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) भर ही तो बनता है, तुम तैयार होते हो वो आकर तुमसे कहता है — “आशीर्वाद है, आगे बढ़ो, अब रुको मत, डरो मत।"







