हमारी फ़िल्में, किस्से, संस्कृति यही सिखाते हैं कि दोस्त वो है जो गुनाहों में शरीक हो जाए, सही-गलत का बिना सवाल किए साथ दे। लेकिन सच्चा दोस्त वो है जो ज्ञान दे, प्रकाश दे; न कि अँधकार में सहायक हो। जो तुम्हारे अँधेरे को चुनौती दे, तुम्हें बाहर निकाले।
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आचार्य प्रशांत: अध्यात्म की क़रीब-क़रीब डरावनी छवि बना दी जाती है बालकों, किशोरों और युवाओं के मन में। तो जब मैं कॉलेजों में जाकर युवाओं से बात करता था तो उनमें से एक तो बेचारे काँपते-सिहरते खड़े होते थे और कहते थे, “सर, अगर पूरी दुनिया में सब आध्यात्मिक हो गए तो दुनिया का क्या होगा?’ ये वो प्रश्न नहीं कर रहे हैं, पूछ नहीं रहे हैं, अगर पूछ रहे होते तो उत्तर पाने से पहले ही इतने डरे कैसे होते?
उत्तर उन्हें पहले ही बता दिया गया है। उन्हें बता दिया गया है कि आध्यात्मिक होना कुछ ख़तरनाक बात होती है। और हज़ार में दो ही चार लोग हों तब ठीक है, ज़्यादा लोग हो गए तो दिक्क़त हो जाएगी। “पचास-पचास कोस दूर तक जब भी कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है, बेटा चुप हो जा नहीं तो बाबा आ जाएगा, अध्यात्म ख़तरनाक है!”
दुनिया में आध्यात्मिक लोग नहीं हैं तब कैसी दुनिया है ये तो आप देख ही रहे हैं। आध्यात्मिक हो गए लोग तो दुनिया जैसी है इससे तो बेहतर ही होगी। मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूँगा कि वह बहुत-बहुत सुंदर दुनिया होगी वो जिसमें सब आध्यात्मिक होंगे।
पर बालकों के और युवाओं के मन में दहशत भर दी जाती है। पति सत्संग में आने को निकले तो स्त्रियाँ चीत्कार करके उनके पैरों पर गिर पड़ती हैं, ‘मैंने ऐसा क्या कर दिया है जो अब तुम सत्संग में जाओगे? मुझसे क्या भूल हो गई कि तुम ज्ञान की तरफ़ चल दिए? मैं तुम्हें अज्ञान के इतने सुख दे तो रही हूँ, वो सुख अब कम पड़ने लगे क्या, ज्ञान की ओर क्यों जा रहे हो?’ यही बात पुरुषों पर भी लागू होती है। स्त्री सत्संग की ओर चल पड़े, पुरुष के भीतर घोर असुरक्षा उठने लगती है कि ये तो अब निकली शिकंजे से।




