दोस्तों के कुप्रभावों से कैसे बचें? और दोस्तों को भी कैसे बचाएँ? || आचार्य प्रशांत (2017)

प्रश्नकर्ता: इस संसार में मेरे निकट ज़्यादातर लोभ, दोष इत्यादि माया का प्रभाव रहता है और सारे दोस्त उसी में मग्न रहते हैं। मेरा उठना-बैठना, श्रवण-दर्शन सब उनके साथ ही होता है। फिर उनके साथ सारे पल रहते हुए भी उन विचारों से कैसे बचें? या इन सबसे सम्बन्ध ही समाप्त कर दें?
आचार्य प्रशांत: हम साधारणतया एक ही तरह का सम्बन्ध जानते हैं, जो दही की एक बूँद का दूध से होता है। संगति हुई नहीं कि कुछ फटा, कुछ नष्ट हुआ। फटे, ये ज़रूरी है क्या? और भी सम्बन्ध होते हैं, मोती का माला से, दीये का प्रकाश से और — इन सबसे आगे कहता हूँ, सन्तों की भाषा में — पारस का लोहे से।
एक सम्बन्ध वो होता है कि जहाँ आप दूध हैं और दही की संगति करी नहीं कि आप वही हो गये जिसकी संगति करी। आपका तत्व छिन गया आपसे, कुछ और ही हो बैठे। और एक सम्बन्ध होता है पारस का लोहे से कि दुनिया भर का लोहा हो और छोटा सा एक पारस पत्थर का टुकड़ा, तो बदलता पारस नहीं, बदलता लोहा है।
अन्तर देखिएगा।
दूध की मात्रा, दूध का परिमाण बड़ा। दही की बूँद छोटी। नष्ट कौन हुआ? वो जो बड़ा था। और होने को ये भी हो सकता है कि एक पारस पत्थर बदल दे धातुओं के पूरे एक भंडार को, बिना स्वयं बदले।
चोर का भी रात से एक सम्बन्ध होता है और दीये का भी रात से सम्बन्ध होता है। सम्बन्ध कैसा? चोर में अन्धेरा है, उसे अन्धेरा चाहिए। दीये में प्रकाश है, वो जहाँ है वहाँ अन्धेरा हो नहीं सकता। और मज़ेदार बात ये है कि दीया पाया वहीं जाता है जहाँ अन्धेरा होता है, सम्बन्ध पक्का है। चोली-दामन का साथ है। आपने कभी दीये को किसी पूर्व-प्रकाशित जगह पर पाया नहीं होगा। सम्बन्ध है। जहाँ अन्धेरा होता है, जैसे अन्धेरा ही खींच लाता हो दीये को, ऐसा प्रेम है दोनों में। जैसे अन्धेरा ही पुकारता हो दीये को। जोड़ी है।



