प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। जो सवाल मैं पूछना चाहती थी, वह सवाल किसी दोस्त ने ही पूछ लिया। एक बहुत गर्व की बात लगती है और हर्ष की बात है कि हमारे जो चैनल्स हैं, उसके सब्सक्राइबर्स और व्यूअर्स की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बहुत खुशी होती है जब वह ग्राफ ऊपर की ओर जाता है।
लेकिन एक ग्राफ और है, जो इसके पैरलल (समांतर) चलता है। मेरे कुछ जानने वाली दोस्त हैं जो इस चैनल से जुड़ी हुई हैं, जो सुनती हैं, हालाँकि किताबें अभी माँग के पढ़ती हैं। लेकिन उनके मन में एक अहंकार का भाव, मुझे लगता है कि एक स्टेप (तल) ऊपर हो जाता है, जब वो बड़े गर्व के साथ कहती हैं कि "हाँ, हमने भी सब्सक्राइब किया है, हम सुनते हैं, हमें भी पता है, किताबें ख़रीदते हैं या यूट्यूब पर सुन लेते हैं।" बात यहाँ तक ठीक लगती है कि चलिए एक रास्ता लोगों को दिखाया गया है और वो उस रास्ते पर सही चल पा रही हैं। लेकिन अगले दिन जब उनके साथ वार्तालाप होती है, तो ज़िंदगी के जो किन्तु और परन्तु हैं, वो जस के तस वहीं के वहीं रह जाते हैं।
वही अपनी मेंटल हैरेसमेंट (मानसिक उत्पीड़न) सोशल हैरेसमेंट (सामाजिक उत्पीड़न) फाइनैन्शल हैरेसमेंट(आर्थिक उत्पीड़न) और न जाने और कितनी तरह की जो प्रॉब्लम्स (समस्या) हैं, जो अब तक ज़िंदगी में चली आ रही हैं, वो अभी भी उसी लेवल (स्तर) पर हैं। तो जब कोई डिस्कशन (चर्चा) होता है, तो अगर उन्हें ये कहा जाता है कि आप दो-तीन सालों से सुन रही हैं, पढ़ रही हैं, तो आचार्य जी का कहना है कि "ये मत दिखाओ कि कितना जानते हो, ये दिखाइए कि जी कैसे रहे हो।" तो यहाँ तो जो आपका बौद्धिक स्तर है, वो ऊपर हुआ है, व्यवहार में आपके वो चीज़ें अभी तक नहीं आईं। तो जो भी आपकी परिस्थिति है, उसको लेकर आप समझौता क्यों करती हैं?




