डर और तनाव मूलतः इसी भाव से निकलते हैं कि कोई दूसरा है जो मेरा कुछ छीन सकता है और कोई दूसरा है जो मुझे कुछ दे सकता है। जब तक तुमने यह धारणा बाँध रखी है, डर और तनाव से मुक्ति संभव नहीं। सदा अपने आपको यही बताओ — मैं लाख गिरूँ तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। जब इस भाव में जियोगे, तब न डर रहेगा न तनाव।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: एक राजा था, बहादुर, निडर बादशाह। मस्त रहता था अपने आप में, खूब उसके यार-दोस्त, सबसे उसका प्रेम। अड़ोसी-पड़ोसी राज्य उससे जलते थे। अक्सर जो लोग मस्त रहते हैं उनसे जलने वाले बहुत पैदा हो जाते हैं, क्योंकि चाहते वो भी यही हैं कि हम भी काश ऐसा मस्त रह पाते पर वो मस्ती उनको उपलब्ध नहीं होती तो जलन का रूप ले लेती है।
तो जलने वाले पैदा हो गए। उन्होंने बड़ी कोशिश की कि इसको हरा दें, इसका राज्य हड़प लें, इसकी मौज पर कोई फर्क आ जाए पर वो उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाए। अक्सर तो वो लड़ाइयों में हारता ही नहीं, और जब कभी हार भी जाता तो ये पाया जाता कि इसकी मौज पर तो अभी भी कोई अंतर नहीं पड़ा है। ये हार गया, इसके राज्य का नुकसान हो गया, इसकी सेना का नुकसान हो गया, रुपये-पैसे का नुकसान हो गया पर फिर भी इसकी मौज पर कोई अंतर नहीं पड़ा है।
तो लोग बड़े परेशान कि कुछ भी हम कर ले रहे हैं, ये मस्त ही है। तो उन्होंने एक आखिरी चाल चली, उन्होंने एक जादूगर को बुलाया और जादूगर से कहा कि चलो, कुछ करो। जादूगर ने कहा, ‘बड़ा आसान है। ये पानी है, ये उसको पिला दीजिएगा, और पिलाते ही वो भूल जाएगा कि वो राजा है। राजा होते हुए भी भूल जाएगा वो राजा है, उसे लगने लगेगा कि वो भिखारी है।‘
यही किया गया, उसको वो पानी पिला दिया गया, और जो काम दुनिया की तमाम लड़ाइयाँ नहीं कर पाईं थीं, बड़े-बड़े बलों का इस्तेमाल नहीं कर पाया था, वो काम उस पानी ने कर दिया। उस राजा की मौज चली गई, उसकी मस्ती खो गई, वो चारों तरफ़ भटकने लगा कि 'मैं भिखारी हूँ, मेरे पास कुछ नहीं है, मुझे दे दो।'




