मैं तुमसे कह रहा हूँ कि डरो मत, नक़ली हटेगा तो असली चमकेगा। तुमको ऐसा लगता है जैसे कोई तुम्हारी करोड़ों की जमापूँजी है और मैं उसको तुमसे छीने ले रहा हूँ। तुम्हारे पास कुछ नहीं है, जिन रिश्तों को तुम पकड़ कर बैठे हो बेटा, वो रिश्ते धूल बराबर हैं क्योंकि वह प्रेम पर आधारित नहीं हैं। ईमानदारी से अपने दिल को टटोलोगे तो जान जाओगे। तो वह गन्दगी अगर मैं तुमसे छीन भी रहा हूँ तो उसे छिनने दो, प्रतिरोध मत करो। गन्दगी हटेगी तो साफ़-साफ़ कुछ और चमकेगा, मस्त रहोगे, प्रसन्न रहोगे।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम डर का इस्तेमाल क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: डर के अलावा कुछ और बता दो जिसका उपयोग कर सकें।
प्रश्नकर्ता: हम कुछ इसलिए भी तो कर सकते हैं कि वो करना अच्छा है।
आचार्य प्रशांत: ऐसा होता है? तुम जो भी काम करते हो वो इसलिए करते हो कि वो अच्छे हैं या इसलिए करते हो कि उनमें लालच है? इमानदारी से बताओ।
प्रश्नकर्ता: ये तो ऑब्वियस (ज़ाहिर) है।




