“मैं तो अपने पैशन पर चलती हूँ, साहब, किसी के दबाव में नहीं आती।” पर सोचिए, बेहोशी में किसी ने दिमाग़ में एक छोटी-सी चिप लगा दी हो। तब उसका हर हुक्म हमें अपनी ही पसंद लगेगा, और बाहर कोई दबाव डालता दिखेगा भी नहीं। साथ में एक डर भी बैठा दिया जाता है: लड़की हो तो हाईवे मत छोड़ना, पगडंडी पर उतरीं तो रोटी के लाले पड़ जाएँगे। जब आँखें दुनिया के साथ आईना भी देखने लगें, तो क्या बिना बिके, बिना झुके जिया जा सकता है?
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प्रश्नकर्ता: यह मेरा ओपिनियन है कि यह जो लाइन है, क्या यह सोसाइटी के कुछ प्रिविलेज्ड सेक्शंस पर ही लागू होती है, जो फ़ाइनेंशियली अच्छे हैं? क्योंकि सर, इतना कॉम्पिटिशन है कि हम कोई भी काम करें, बहुत ज़्यादा चांस है कि हम फ़ेल हो सकते हैं। तो अगर उन्होंने कोई काम किया और वह नहीं चला, तो उनके पास तो फ़ाइनेंशियल बैकअप है। बट जो हम जैसे लोग हैं, मतलब मिडिल क्लास फ़ैमिलीज़, सर, अगर उनका काम अच्छा नहीं चला, तो उनका तो काफ़ी नुक़सान है। तो सर, मेरा सवाल यह है कि क्या यह लाइन, “फ़ॉलो योर पैशन”, सब पर लागू नहीं होती?
आचार्य प्रशांत: इसमें दो-तीन जुड़े हुए मुद्दे हैं। पहला, कि पैशन चीज़ क्या है? और दूसरी बात, कि अगर हम पैशन को फ़ॉलो करेंगे, तो फिर लाइवलीहुड का और सस्टेनेबिलिटी का, जो मध्यमवर्गीय एस्पिरेशंस होती हैं, उनका क्या होगा? और जो हमें सिक्योरिटी चाहिए होती है, माँ-बाप का, समाज का जो दबाव होता है, उसका क्या होगा?



