डर चेतना की सबसे बड़ी बीमारी है। यह आदमी को संकुचित कर देता है। डर मान्यता से उठता है। जहाँ मान्यता है, वहाँ डर होगा ही। इस बात पर डरे रहो कि कहीं ज़िंदगी से सच्चाई विदा न हो जाए — लेकिन लोग डरे हुए हैं कि कहीं ज़िंदगी से बंधन न छिन जाए। विषयों को ज़िंदगी से खदेड़ने की बात नहीं है; सच्चाई के आधार पर जीने की बात है। उसके बाद न कुछ बहुत प्यारा लगता है, न कुछ बहुत डरावना लगता है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आचार्य जी मुझे बचपन से ही डर की समस्या है। मैं कॉलेज में भी बहुत डरा रहता था। हर छोटी-मोटी बात से डर जाता था। अभी फ़िलहाल एक साल पहले ही मैंने जॉब करना शुरू किया है। और वहाँ पर भी जब मुझे अपने बॉस या सीनियर के सामने कोई सही और जायज़ बात रखनी होती है, तब भी मैं डर जाता हूँ। ये डर आख़िर है क्या? मुझे आपसे बहुत विस्तार में जानना है क्योंकि मैं बहुत परेशान हूँ, और मैंने इसको दूर करने के लिए बहुत सारे उपाय भी किए हैं। बहुत सारी सेल्फ हेल्प किताबें पढ़ी हैं। लेकिन उनसे कुछ लाभ मुझे मिला नहीं। कृपया आप मुझे विस्तार से बताइए कि ये डर, ये डर आख़िर क्या है? और मैं इससे कैसे निजात पाऊँ?
आचार्य प्रशांत: आदमी को जितना सिकोड़ देता है, संकुचित कर देता है — डर। बहुत बुद्धि रखने वालों को भी जिन व्यर्थ और नाशकारी रास्तों पर धकेल देता है — डर। ये जिन्होंने जीवन को देखा, उन्हें साफ़ दिखा। चेतना का जैसे प्लेग है डर, या और कोई बड़ी बीमारी — कैंसर। और डर प्राकृतिक नहीं होता है, जो कुछ प्राकृतिक है उससे मुक्ति नहीं हो सकती। जो जीवन मुक्त भी हो गए वो रहे तो देहधारी ही। देह प्राकृतिक है, उससे छूटकर कहाँ जाओगे? बहुत ज्ञानी हो जाओ, आत्मस्थ जियो, तो भी साँस तो चलती रहेगी। बोलोगे तो इसी मुँह से, प्राकृतिक यदि होता डर तो दुर्निवार होता, डर प्राकृतिक नहीं होता है। प्राकृतिक से नीचे का होता है डर। डर प्रतिभासिक होता है माने —




