डर दो तरह का होता है। हम सब तरीक़े के छोटे–छोटे डरों में लिप्त रहते हैं; और जो एक डर हमें लगना ही चाहिए, उसे हमने छुपा रखा है। हम पूरी दुनिया से डरते हैं, बस जीवन के व्यर्थ चले जाने से, अमुक्त रह जाने से नहीं डरते। असली डर अगर जीवन में आ गया, तो ये सब छोटे–छोटे, क्षुद्र डर विदा हो जाएँगे।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
When people do not fear what they ought to fear, that which is their great dread will come on them – Lao Tzu
जीवन के सबसे बड़े ख़ौफ़ को आमंत्रण है उस भय से विमुख हो जाना जिससे भयभीत होना ज़रूरी है। – लाओ-त्सु
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। लाओ-त्सु ने डर और डर में भेद किया है। मेरे अनुभव से तो डर एक ही जैसा होता है — जो मुझे अंदर से कंपा दे। कृपया समझाएँ कि जो पहले प्रकार का डर है, जिससे हमें डरना चाहिए, वह और दूसरे प्रकार के डर में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: बहुत अंतर है। डर एक तरह का नहीं होता, साफ़-साफ़ दो प्रकार का होता है — यह समझिए।
पहले प्रकार के डर से आप परिचित हैं। यह डर कहता है, “कहीं ऐसा न हो कि मुझे वह न मिले जो मैं चाहता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि मुझसे वह छिन जाए जो मेरे पास है।”




