
प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। सर, मेरा एक प्रश्न है।
आचार्य प्रशांत: बोलो, बेटा।
प्रश्नकर्ता: जब मैं स्कूल में कभी मुझे बुलाया जाता है, मतलब प्रेयर करने के लिए। जब मैं थॉट ऑफ़ द डे या फिर न्यूज़ बोलती हूँ, इतना डर रहता है कि ऐसा लगता है, अभी ज़मीन पर गिर जाऊँ। मैं कुछ नहीं बोलती।
आचार्य प्रशांत: बेटा, अगर कोई भी न होता वहाँ, स्कूल की असेंबली में, तो भी क्या इतना ही डर लगता है? सोचो कि तुम अपने कमरे में अकेले खड़े हो, और तुम्हें वहाँ कोई बुला रहा है कि आओ और कुछ बोलो। अपने कमरे में अकेले बोलने में डर लगता है?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: नहीं लगता। पर आप कह रहे हो कि स्कूल की असेंबली में कुछ बोलने के लिए बुलाया जाता है, तो आपको बहुत डर लगता है। इसका मतलब आपको डर बोलने से नहीं लगता है। आपको डर उन लोगों से लगता है, जो असेंबली में मौजूद हैं। बोलने से डर लगता होता, तो आप अपने अकेले कमरे में भी नहीं बोल पाते। मम्मा के सामने कुछ बोलने से डरते हो क्या?
प्रश्नकर्ता: ना।
आचार्य प्रशांत: यहाँ इतने सारे लोग हैं। आप मुझसे बोल रहे हो। कुछ डर रहे हो क्या?
प्रश्नकर्ता: ना।
आचार्य प्रशांत: लेकिन स्कूल में बोलने से आप कह रहे हो कि डरते हो? इसका मतलब, वो जो वहाँ लोग खड़े हैं न, उनसे आप डर रहे हो। क्यों डर रहे हो? क्योंकि वो आपके फ्रेंड्स हैं, टीचर्स हैं। आपको इस बात की बड़ी परवाह है कि उनकी नज़र में आपकी इमेज क्या बनेगी। इसलिए आपको डर लग रहा है।
तो डर न, अक्सर इसी डिपेंडेंसी से आता है कि मेरे बारे में लोग सोचेंगे क्या? और तब एक सीधी-सी बात भी बोलने में गला रुक जाता है।
कभी मत कहना कि मुझे बोलने से डर लगता है। किसी को बोलने से डर नहीं लगता, सब बोलते हैं। हमें भीड़ से डर लगता है। हमें दूसरों से डर लगता है।
क्यों डर लगता है? क्योंकि हम उन पर डिपेंडेंट बन गए हैं, बिना बात के। किसी पर डिपेंडेंट मत बनो, न तो इमेज के लिए और न किसी भी और सेल्फ़िश चीज़ के लिए। मत बनो। जिस पर जितना डिपेंडेंट बनोगे, उससे उतना डरना पड़ेगा। फिर जो एक सीधी-सादी बात है, वो भी नहीं बोल पाओगे। ठीक है?
अब जब जाना वहाँ पर असेंबली में, सब सामने होंगे और डर लगेगा, तो अपने आप से पूछना, “मैं कुछ भी बोलूँ, मेरा चला क्या जाएगा? ये लोग मेरे बारे में अच्छा सोचें कि बुरा सोचें, क्लैपिंग करें कि नहीं करें, मेरा हो क्या जाना है?” उनसे ऐसे बोलो, जैसे उनसे तुम्हें कुछ चाहिए ही नहीं, फिर डर नहीं लगेगा।
प्रश्नकर्ता: सर, जो हमारे स्कूल में सर होते हैं, बोलते हैं कि हमारी इमेज गलत कर दी तुमने। फिर डे-शिफ़्ट में जाओगे, तो क्या इमेज रहेगी बड़े बच्चों के सामने?
आचार्य प्रशांत: तुमने गलती कर दी है, तुम गलत नहीं हो गई। यह उन्होंने जो बोला, इस हद तक ठीक है कि तुमने जो बोला, हो सकता है कि उसमें तुमने कुछ सेंटेंस गलत कर दिया, कुछ कर दिया। तो तुमने जो काम करा है न, उसमें कुछ ऊपर-नीचे हो गया। इसका मतलब ये नहीं है कि तुम्हारे अंदर कोई बड़ी-भारी गलती बैठी हुई है। ठीक है? तो उन्होंने जो भी बोला, टीचर ने, उसको फ़ीडबैक की तरह लेकर हम करेक्शन कर लेंगे। लेकिन हम उस बात को अपनी आइडेंटिटी नहीं बनाते हैं, पहचान नहीं बनाते। यह नहीं कि आज मैंने स्कूल में कोई गलती कर दी। इसका मतलब मैं गंदी बच्ची हूँ। गलती कर दी वो ठीक है, उससे मैं गंदी बच्ची नहीं हो गई। गलती मेरी आइडेंटिटी, मतलब मेरा नाम, पहचान नहीं बन गई। ठीक है न? वो मेरी इमेज नहीं बन गई।
गलती तो कोई बताए, तो उसको थैंक यू बोलना चाहिए। लेकिन गलती करने से इंफ़ीरियर नहीं हो जाते, गलती करके करेक्शन करते हैं, गलती करके गिल्ट नहीं पालते। कुछ गलती है, ठीक कर लेंगे। लेकिन कितनी भी बड़ी गलती हो जाए, हम छोटे नहीं हो जाते। गलती बड़ी हो सकती है, हम छोटे नहीं हो गए। इंफ़ीरियर नहीं हो जाते। ठीक है?
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, सर।