डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। सर, मेरा एक प्रश्न है।
आचार्य प्रशांत: बोलो, बेटा।
प्रश्नकर्ता: जब मैं स्कूल में कभी मुझे बुलाया जाता है, मतलब प्रेयर करने के लिए। जब मैं थॉट ऑफ़ द डे या फिर न्यूज़ बोलती हूँ, इतना डर रहता है कि ऐसा लगता है, अभी ज़मीन पर गिर जाऊँ। मैं कुछ नहीं बोलती।
आचार्य प्रशांत: बेटा, अगर कोई भी न होता वहाँ, स्कूल की असेंबली में, तो भी क्या इतना ही डर लगता है? सोचो कि तुम अपने कमरे में अकेले खड़े हो, और तुम्हें वहाँ कोई बुला रहा है कि आओ और कुछ बोलो। अपने कमरे में अकेले बोलने में डर लगता है?
प्रश्नकर्ता: नहीं।




