डरों को जीता नहीं जाता, "डरों को भूला जाता है।" बहुत सारे जो डर होते है न, वो प्रेम में ही तिरोहित होते हैं। अपने आपको प्रेम में पड़ने का अवसर तो दो। जो सत्य के प्रति जो परम प्रेम होता है, वो ऐसे साहस से भर , जिसे मैं कह रहा हूँ "साहस कहना भी ठीक नहीं है", वो एक तरह की सहजता है। तुम सहज ही बहुत सारे साहसिक काम कर डालोगे, बिना साहस का उपयोग किए। प्रेम साहस से ऊपर का होता है। जहाँ प्रेम है, वहाँ साहस चाहिए ही नहीं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, ऊँचा जीवन जीने में बहुत डर लगता है। कीमत चुकाने से मुँह चुराता रहता हूँ। जितना देख पाता हूँ कि समय ही व्यर्थ कर रहा हूँ लेकिन फिर भी उसे रोक नहीं पाता। कभी-कभार भावुक होकर कुछ करने की कोशिश करता हूँ लेकिन बाद में वहीं पहुँच जाता हूँ जहाँ से शुरुआत करी थी। इस पर कृपा करके प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: जहाँ तुम बैठे हो, वहाँ बैठे-बैठे कोई बदलाव नहीं आ जायेगा। एक कदम तो बढ़ाओ! एक कदम तो बढ़ाओ। बहुत सारे लोग होते हैं, देखा है, सोते समय, बड़ी खिड़कियाँ भी हों उनके कमरे में , तो उनपर पर्दे चढ़ा देते हैं और पर्दे भी उनके गाढ़े रंग के होते हैं। अब दरवाज़ा भी बन्द है, पर्दे भी चढ़ा दिए, तो कैसा हो जाता है कमरा? एकदम अन्धेरा हो जाता है, एकदम अन्धेरा है! एकदम अन्धेरा ! अब जाड़े का मौसम है, मान लो सुबह के आठ-नौ बज गए हैं, ये अभी सो कर उठ रहे हैं। एकदम अन्धेरा ! एकदम अन्धेरा !
और कमरा जब रात भर बन्द रहे, तो उसमें ज़रा गन्ध भी आ जाती है और कमरे के भीतर हो सकता है, हीटर, ब्लोअर कुछ चला दिया था तो कमरे का एक तापमान भी था। गर्म हो गया था कमरा। और ये कमरे के भीतर से बैठकर कह रहे हैं ये समस्या है, वो समस्या है, अच्छा नहीं लग रहा है, घुटन भी हो रही है, अन्धेरा भी बहुत है। एक कदम बढ़ाओ, ज़रा सा दरवाज़ा खोल तो दो, देखो क्या होता है? ताज़ी हवा और बढ़िया रोशनी भीतर आयेंगे और तुमने कुल किया क्या? एक कदम बढ़ा कर दरवाज़ा खोल दिया।




