हर डर दूसरे का ही होता है, और कोई डर है ही नहीं दुनिया में, एक ही डर है — दूसरे का डर। क्योंकि हम अपने आप को जानते नहीं, और अपनी वही छवि बना लेते हैं जो दूसरे हमें देते हैं। सिर्फ़ एक कल्पना है और वो कल्पना दूसरों की कल्पना है, ‘दूसरे क्या कहेंगे?’ सदा तुम दूसरे से ही डरे हो। जिसने दूसरों की गुलामी छोड़ दी, जो दूसरों पर आश्रित नहीं रहा, अब उसके जीवन में डर भी नहीं रहा।
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प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, मैं जब कक्षा में होता हूँ, और जब अध्यापक प्रश्न करते हैं मुझसे, उत्तर पता होने के बावजूद मैं जवाब नहीं दे पाता हूँ। कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: मैं भी हैरत में हूँ। बिलकुल करीब-करीब वही सवाल है जो पहले प्रश्नकर्ता का था कि मैं हाथ उठाना चाह रहा था पर कम्प-कम्पाहट हो रही थी, डर लग रहा था।
प्रश्नकर्त्ता: अभी भी हो रही है।
आचार्य प्रशांत: ‘अभी भी हो रही है? और जब क्लास होती है उसमें भी मैडम बुलाती हैं कि यहाँ पर (कक्षा के सभी छात्रों के सामने) आ जाओ, तो जानता भी हूँ बोल नहीं पाता।’
प्रश्नकर्त्ता: सर, वैसे मैं बहुत बोलता हूँ क्लास में।




