आचार्य प्रशांत: प्रथम अध्याय पर श्लोक-क्रमानुसार पूरी चर्चा और व्याख्या हम पहले कर चुके हैं। आज हम एक-एक श्लोक को अलग-अलग न लेकर पूरे अध्याय का ही सार संक्षेप में समझना चाहेंगे, ज़रा ऊपर से देखेंगे, विहंगम दृष्टि से।
बात ही पूरी क्या है? पहला अध्याय उस समस्या को हमारे सामने रखता है जिसको फिर श्रीकृष्ण आने वाले सत्रह अध्यायों में सत्रह विधि से सुलझाते हैं। नाम है 'अर्जुन-विषाद योग’। और आज का सत्र उनके लिए तो महत्वपूर्ण है ही जो हमारे गीता-समागम, गीता-तीर्थाटन में आरम्भ से ही हमारे साथ हैं, उनके लिए विशेषतया महत्वपूर्ण है जिन्होंने हमें हाल ही में या पिछले दो-चार महीनों में साथ लिया है।
मेरे देखे पहला अध्याय चार हिस्सों में विभाजित हो सकता है, जैसे समस्या के ही चार पक्ष हों। जो उसका पहला पक्ष है वो पहले ही श्लोक में निहित है।
तो समस्या पक्ष एक — धृतराष्ट्र; धृतराष्ट्र का मोह। संयोग भर नहीं है कि श्रीमद्भगवद्गीता की पहले प्रकरण की शुरुआत ही होती है धृतराष्ट्र के वचन से, और धृतराष्ट्र का पूरे गीता ग्रन्थ को कुल योगदान यही है — पहला श्लोक, पहली बात। सात-सौ श्लोकों में बस पहली बात, कुल योगदान इतना ही है। कुल एक बात, लेकिन पहली।
तो वेदव्यास कोई साधारण चिंतक नहीं थे, अगर धृतराष्ट्र को श्लोकों के क्रम में वो सर्वोपरि रख रहे हैं तो कोई बात है। न गुरु न शिष्य, न मित्र न शत्रु, दोनों योद्धा-पक्षों में से कोई भी नहीं, किसी की बात नहीं। यहाँ तक कि जो योद्धा पक्ष में नहीं हैं, उनमें भी संजय नहीं, बल्कि धृतराष्ट्र।
इतने सेनानी हैं इस वक़्त युद्धस्थल पर — और उनके नाम आगे हमको सूचित किये जाते हैं, सूचीबद्ध रूप से सूचित किये जाते हैं — लेकिन उन सेनानियों में से कोई भी नहीं है जो गीता का आरम्भ करे। उन सेनानियों में अर्जुन भी नहीं, उन सेनानियों में अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण भी नहीं। और जो लोग, हमने कहा, रणक्षेत्र में नहीं हैं उन दो में से भी संजय नहीं, अपितु धृतराष्ट्र। तो कोई बात होगी।







