(गीता-3) जब सत्य गरजता है || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।२.१।।
~ श्रीमद्भगवतगीता, द्वितीय अध्याय, सांख्य योग, प्रथम श्लोक
आचार्य प्रशांत: संजय कहते हैं कि श्री कृष्ण ने उस प्रकार भाव से आविष्ट और अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन से कहा- 'हे अर्जुन, अनार्यों के योग्य, स्वर्ग प्राप्ति का विरोधी निंदाजनक ये मोह तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुआ है? चित्त के ज्ञाता, मन के विशेषज्ञ की ये निशानी होती है, बहुत पैनी दृष्टि होती है। और बहुत द्रुत गति से वो सामने जो भी बैठा है; शिष्य, रोगी, प्रार्थी, उसकी वास्तविक दशा को पकड़ लेता है। शिष्य अपनी लम्बी-चौड़ी, व्यथा-कथा सुनाता है। स्वयं भी उलझा हुआ है और बड़े उलझे हुए शब्दों में अपनी हालत का वर्णन करता है। लेकिन गुरु यदि ज्ञाता है, तो वो बिलकुल सार- संक्षेप में चिन्हित कर लेता है कि वास्तविक बात क्या है। जटिलताओं को काटकर जो सीधा,स्पष्ट, सरल, यथार्थ — गुरु उस पर उंगली रख देता है।
पूरे प्रथम अध्याय में अर्जुन ने अपने विषय में, युद्ध की स्थिति के विषय में, अपने प्रियजनों के विषय में, धर्म के विषय में, युद्ध के परिणाम के विषय में, कितनी ही बातें कहीं। लेकिन जिस बात का बहुत कम या एकदम नहीं उल्लेख किया वो थी 'मोह'।
'मोह' शब्द अर्जुन से उच्चारित ही नहीं हुआ पूरे अध्याय में। सब इधर-उधर की बातें करते रहे। कभी कह दिया कि हम क्योंकि श्रेष्ठ हैं धृतराष्ट्र के पुत्रों से, इसलिए हमें युद्ध नहीं करना चाहिए। कभी कह दिया कि युद्ध हो गया तो स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाएँगी, वर्ण संकर पैदा हो जाएँगे, फिर पितरों का क्या होगा? कभी कोई तर्क दे दिया, कभी कोई बात कह दी। बस एक बात नहीं कही — 'मुझे मोह है'। ये बात अर्जुन ने नहीं कही। यही बात असली है, इसलिए, यही बात अर्जुन को छुपानी थी। अर्जुन ने कही नहीं, और श्री कृष्ण जब बोलना शुरू करते हैं, तो श्रीकृष्ण ने सबसे पहले कह दी।






