जागरण का ताप ही वृत्तियाँ जला देगा || आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर (2014)

अष्टावक्र गीता (अध्याय २ श्लोक १८)
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।।
आश्चर्य है मुझमें स्थित हुआ जगत वास्तव में मुझमें स्थित नहीं है, इसलिए न मेरा बंध है, न मोक्ष है ऐसे विचार से आश्रय रहित होकर मेरी भ्रांति शांत हो गयी है।
वक्ता: तो सवाल है कि बार-बार भ्रांति उठती है कि, ‘’मैं कुछ हूँ।’’ ध्यान देने पर शांत होती है। पर बार-बार उठती क्यों है? बार-बार भ्रांति उठती क्यों है? उस समय सब खो जाता है, सब गलत हो जाता है। आप दिन भर जो कर रहे हो, आप समय में जो जी रहे हो, आपके पास जितनी ऊर्जा संचित है, आप देखो न कि आप उसका प्रयोग किस धारणा की पुष्टि में कर रहे हो। आप देखो कि आप किस धारणा को लगातार बल दिए जा रहे हो। आप किसके पक्ष में खड़े हो।
आप जिसके पक्ष में खड़े होगे, वही जीतता रहेगा, क्योंकि खेल सारा मन का है। ये प्रश्न आत्मा तो नहीं पूछना चाह रही है। ये सारे सवाल मन से उठ रहे हैं। मन धारणाओं में जीता है। आप लगातार इसी धारणा को बल दिए जा रहे हो कि ‘मैं कुछ हूँ,’ तो वही धारणा पुष्ट होती जाएगी। इसमें अब आश्चर्य क्या है?
एक-एक साँस आपकी जगत के लिए है। एक-एक हरकत, एक-एक घटना आपकी इसी नाते है कि, ‘’दुनिया है और मैं हूँ और मैं दुनिया में कुछ कर रहा हूँ।’’ चौबीस में से साड़े-तेईस घंटे आप ऐसे ही चल रहे हो। और फिर आपको ठोकर लगती है, दुःख होता है, तो फिर आप कहते हो कि, अरे!





