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मैं संतुष्ट क्यों नहीं रह पाता? || आचार्य प्रशांत (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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वक्ता: पिंजरा कितना भी मज़बूत हो, उसकी तीलियाँ कितनी भी सघन, लेकिन आकाश अपना अहसास करा ही देता है। बिलकुल बंद दीवारों द्वारों वाला पिंजरा हो, तो भी अपना अहसास करा देगा क्यूँकी आकाश पिंजरे के बाहर ही नहीं, पिंजरे के भीतर भी है, और पक्षी के भीतर भी है।

आकाश में और पक्षी में मूलतः कोई भेद नहीं।वो आवाज़ देगा, तुम कितने भी अँधेरे में जी रहे हो, बीच–बीच में तुम्हें जताएगा कि अँधेरा आखिरी बात नहीं है।असल में दुःख तुम्हें हो ही नहीं सकता अगर आनन्द न हो। ऊपर-ऊपर से देखो तो ऐसा लगता है जैसे दुःख. सुख का अभाव है; जैसे कि दुःख, सुख को पाने कि चेष्टा कर रहा है। पर ध्यान से देखोगे तो ये पाओगे कि दुःख, सुख का अभाव नहीं, आनंद का अहसास है।

आनंद न होता, तो तुम दुखी क्यूँ होते?

आनंद तुम्हारा स्वभाव न होता तो तुम्हें अफ़सोस किस बात का होता? तुम दुखी हो और दुःख के अतिरिक्त कोई संभावना ही न रहती, तुम कहते, ‘’ठीक! मैं वैसा ही हूँ, जैसा मैं हो सकता हूँ, और विकल्प क्या है? यही तो मेरी नैसर्गिक अवस्था है और कभी दुःख से कभी ऊबे तो सुख। ठीक है! यही तो खेल है, चल रहा है।’’पर दुःख में तुम टिक पाते नहीं, सुख की आशा रहती हैं; और सुख में तुम टिक पाते नहीं, दुःख की आशंका रहती है। टिक इसलिए नहीं पाते क्यूँकी आसमान है, आनन्द है, वो अपना अहसास कराता रहता है पिंजरे के पक्षी को।असली गुनहगार वही है! उसीने चैन छीन रखा है तुम्हारा, वो न हो तो तुम जहाँ हो जैसे हो संतुष्ट रहोगे। तुम्हारी तड़प का कारण वही झलक है जो बीचबीच में दिख जाती है। तुमने अपने झूठों का पूरा एक किला तैयार कर रखा है और उसके सारे द्वार-दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर रखे है, पूरा अँधेरा कर लिया है और तुमने अपने आपको समझा लिया है कि अँधेरा ही सत्य है।पर ज़रा सा कहीं एक छेद बाकी रह जाता हैं रौशनी की एक किरण उसमें प्रवेश कर जाती है।

वो तुम्हें मुँह चिढ़ाती है।वो तुम्हारा सारा झूठ खोल के रख देती है।तुम उसकी हत्या के लिए दौड़ते हो, इस ज़रा से सुराख से वो आई होती है तुम उस सुराख को बंद करते हो, पर सत्य तो सत्य, आकाश तो आकाश, आनंद तो आनंद, वो तो जो है वो है, वो तो वो है जो अस्तित्वमान है और जो अस्तित्वमान है वो रहेगा।तुम्हारी सारी कोशिशों के बावजूद रहेगा।वो दरवाज़े के नीचे से ज़रा सी जगह पा जाती है अगली बार वो वहाँ से आ जाती है।तुम भीतर ‘तमोत्सव’ मना रहे होते हो, ‘अँधेरे का त्यौहार’, मात्र अँधेरा है, और दरवाज़े के नीचे से, जो बिलकुल अभेद्य कर लेते हो तुम अपनी दीवारों को और दरवाजों को। और आखिरी बार पक्का करने के लिए अपने आप से पूछते हो कि अब तो कहीं से कोई संभावना नहीं, कहीं से कोई रोशनी नहीं, नहीं तो भीतर से, कहीं से कोई आवाज़ आती है कि, ‘अँधेरे को देख पाने को आँखों को रोशनी किसने दी?’

बाहर की रौशनी बंद कर लोगे, भीतर वाली कैसे बंद करोगे? अँधेरे को भी अँधेरा कहने के लिए तुम्हारी आँखों में रौशनी होनी चाहिए उसका क्या करोगे? झिरियाँ थी और सुराख थे वो तुमने बंद कर दिए, उन सब से रौशनी आती थी, पर तुम्हारी आँखों से भी रौशनी आती है, तुम्हारे मन से भी रौशनी उठती है, तुम्हारे दिल से, तुम्हारे भीतर भी आसमान है। अब अगर ज़रा ईमानदारी है तुममें तो तुम कहोगे कि व्यर्थ लड़ रहा हूँ यह लड़ाई, हार ही जाऊँ तो अच्छा! चुपचाप जाओगे और दरवाज़े खोल दोगे, खिड़कियाँ खोल दोगे, दीवारें गिरा दोगे।जान जाओगे कि प्रकाश से, आनंद से, आकाश से, हट कर रहा नहीं जा सकता, क्यूँ व्यर्थ प्रतिरोध कर रहा हूँ।

उसी का नाम समर्पण है: प्रतिरोध की व्यर्थता का एक ईमानदार एहसास।

लड़ना फिजूल है, जिससे लड़ रहा हूँ, वो बाहर ही नहीं मेरे भीतर भी है ।जिससे लड़ रहा हूँ, वही लड़वा रहा है।तो मैं हारा, वो जीता और मैं जीता तो भी वही जीता, लड़ना फिज़ूल है। यह ही जान जाना समर्पण की बुनियाद है और अगर अभी तुम्हारा समय नहीं आया होगा, ज़रा भी सद्बुद्धि नहीं जग रही होगी, या तुम्हारे सलाहकार होंगे, यार-रिश्तेदार होंगे दोस्त-यार होंगे जो तुमसे कह रहे होंगे रुको, जैसे बाहर का प्रकाश बंद किया, वैसे ही भीतर का भी बंद किया जा सकता है, तुम अभी ज़रा और कोशिशें करोगे।

दोनों विकल्प उपलब्ध हैं।हमेशा यह ही दोनों विकल्प उपलब्ध होते हैं, कि जब वो ख़ामोशी अपना अहसास कराए, दिनभर की तमाम व्यस्थताओं के बीच, सारे शोर के बीच भी, जब वो मौन आहट दे तो या तो जान जाओ और कुछ नहीं इस मौन के अलावा बाकी सब यूँ ही है, फिज़ूल, नकली या कि कह दो की जैसे बाह-बाहर शोर भर रखा है वैसे ही भीतर भी भर दूँगा, बाहर मौन का कोई स्थान नहीं, भीतर से भी क्यूँ उठ रहा है? तोड़ दूँगा इसको, कर लो जो करना है।

‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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