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जानेमन की महकती यादें || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: किसी की यादें दिल से कैसे निकालें? समझ नहीं आता कि नाकाम इश्क़ का मातम मनाएँ या उन दो सालों की खुशबुओं का जशन। यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है और यादों से बाहर बेकस और मायूस। (इम्तियाज़ अली हैं लखनऊ से)

आचार्य प्रशांत: यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है और यादों से बाहर बेकस और मायूस। उन दो सालों की खुशबुओं का जशन, समझ नहीं आता कि नाकाम इश्क़ का मातम मनाएँ या उन दो सालों की खुशबुओं का जशन।

तो यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है। इसीलिए यादों से बाहर आने पर मायूसी छा जाती है न इम्तियाज़(प्रश्नकर्ता)? यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है, वर्ना तो जो सामने है, वर्तमान है, उसमें अपनेआप में कोई ख़ास बुराई नहीं है। पर जब यादों से बाहर आते हो तो जो वर्तमान है, सामने है वह बड़ा बेरौनक, रूखा-फ़ीका लगता है, क्योंकि यादों में क्या थी? रोशनियाँ और ख़ुशबूएँ। यादों से बाहर आये तो न रोशनी है न खुशबू है, तो बड़ा अजीब लगा। जैसे कह रहे हो — बेकसी छा गई, विवशता।

ये यादें भी सच्ची हैं क्या? तुम्हारी सारी तड़प का कारण है कि तुम्हें जो याद है वह तुम्हें बड़ा प्यारा लग रहा है। जो तुम्हें याद है वह तुम्हें प्यारा तो लग ही रहा है जो चीज़ तुम कह नहीं रहे वह यह है कि उसको तुम सच्चा मानते हो। आप कहेंगे, “साहब, अब मुझे याद है तो सच्चा ही तो होगा।”

नहीं! देखो तुम्हें याद है और तुम्हें प्यारा लग रहा है यहाँ तक तो ठीक है पर कोई चीज़ तुम्हें याद है पर वह सच्ची हो यह ज़रूरी बिलकुल भी नहीं है। अब आपको ज़रा आश्चर्य होगा, आप कहेंगे, “यह कैसी बात है? साहब, मुझे कोई चीज़ याद है तो सच्ची ही तो होगी।”

नहीं इम्तियाज़, नहीं। समझाने वालों ने हमसे कहा है सच की दो निशानियाँ होती हैं — पहली यह कि वह बदलता नहीं और दूसरी यह कि वह पूरा होता है। वो जो दो साल तुमको याद हैं, उनकी सारी बातें तुमको पता है क्या? और दूसरी बात, जो कुछ तुम याद कर रहे हो, याद रख रहे हो, उसमें क्या तुमनें कोई भी छेड़खानी, फ़ेर-बदल नहीं करी है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें जो कुछ याद हैं तुमनें वास्तव में, वह एक कल्पना का जाल ही बुना हो अपने मन में? वह याद न हो वह मात्र कल्पना हो? स्मृति और कल्पना में क्या अंतर होता है? स्मृति के साथ हमारा यह दावा जुड़ा होता है कि जो बात हम कह रहे हैं वह वास्तव में घटित हुई। और कल्पना क्या चीज़ होती है? कल्पना घटी नहीं होती है लेकिन फिर भी उसकी छवि उसका चित्र एक पूरी फ़िल्म हमारे दिमाग में मौजूद होती है।

तुम्हें ताज़्ज़ुब्ब हो जाएगा इम्तियाज़, ज़्यादातर जिसको हम स्मृति कहते हैं, वह स्मृति नहीं होती, वह कल्पना होती है। वाकई वो दो साल क्या ख़ुशबू में उतने ही सने हुए थे जितना तुम्हारी स्मृतियों में हैं? वाकई जो कुछ तुम याद रख रहे हो वो पूरी घटनाएँ, कहीं ऐसा तो नहीं कि और भी बातें हों जो तुम याद रखना पसंद नहीं कर रहे हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम वही सब कुछ याद रखना चाह रहे हो जो तुम्हें सुख देता है? जो चीज़ें तुम्हें सुख देती हैं उनको तुमनें बिलकुल बढ़ा दिया है अपने मन में, एक्ज़ैजरेट (बढ़ा-चढ़ा कर बताना) कर दिया है और जो असलियत थी, ख़ासतौर पर असलियत के जो अंश थे, जो सुख नहीं देते, उनको या तो तुमनें दबा दिया है या पूरी तरह से गायब कर दिया है।

क्योंकि देखो, अगर रिश्ता वाकई उतना ही ऊँचा और उतना ही ख़ुशबूदार होता जितना तुम्हारी शायरी बता रही है, तो टूटता नहीं, बेटा। सच की एक पहचान यह भी होती है कि वह अटूट और अखंड होता है। उसमें फिर कोई फ़ेर-बदल नहीं कर सकता; वह जो है सो है। तुम्हारा रिश्ता वाकई इतना सुंदर इतना मज़बूत होता तो बताओ टूट कैसे गया? टूटता तो सिर्फ़ झूठ है; सच तो वह है जो टूट-टूटकर भी टूट नहीं सकता।

‘सोना, सज्जन, साधुजन टूट जुड़े सौ बार, दुर्बल कुंभ कुम्हार के एक‌ही धक्का दरार।’

सच्चाई की निशानी यही है कि तुम उसे तोड़ दो अपनी समझ से। थोड़ी देर में पाओगे वह फिर जुड़ गई क्योंकि वह भीतर से कभी टूटी ही नहीं थी। ऊपर-ऊपर से तुम उसमें दरार ला सकते हो।

तो यह जो रिश्ता है जिसकी यादें तुम पकड़कर बैठे हो उतना अच्छा कभी था ही नहीं जितना तुम्हारी यादों में है। तुम कह रहे हो कि इतना प्यारा रिश्ता था, हाय अब नहीं है।

अरे! वह प्यारा था कहाँ? समझ में आ रही है बात? वह प्यारा था ही नहीं इतना। जिन खुशबुओं की तुम बात कर रहे हो, उनके पीछे जो दुर्गन्ध का सागर लहरा रहा था वह छुपा गए तुम? उसका ज़रा भी ज़िक्र नहीं करोगे इम्तियाज़? पर नहीं, आदमी सुख का कीड़ा होता है; कल्पना में सुख मिले तो कल्पना ही सही। और कल्पना को स्मृति का नाम देने में सुख मिले तो वह नाम भी दे देंगे। और काल्पनिक स्मृति को यथार्थ का दर्ज़ा देने से सुख मिले तो हम काल्पनिक स्थिति को यथार्थ भी बना देंगे। जो घटना घटी ही नहीं उसको कह देंगे, “हाँ, ऐसा ही तो हुआ था बिलकुल। फिर मैं जब उसके पास पहुँचा तो मैंने पाया कि वह मेरी याद में चार घड़े आँसू रो चुकी थी।”

अरे यार, ज़रा सा पसीना था उसके गालों पर; वह तुमनें एक बूँद देख ली थी और उस एक बूँद को तुमनें अपनी यादों में आँसुओं का समंदर बना दिया। और अब तुम ख़ुद आँसुओं का समंदर बहा रहे हो यह कह-कहकर कि देखो वह थी एक हसीना, मेरी जानेमन जो मेरी याद में आँसुओं का समंदर बहाया करती थी। अरे कहाँ, कौन तुम्हारे लिए इम्तियाज़ आँसुओं का समंदर बहा रहा था? ज़रा सा उसने पसीना छलका दिया था, वह पसीना भी बस इसलिए था कि उस दिन ए.सी. ख़राब हो गया था। तुम्हारी वह इतनी कद्र करती होती तो दो साल में तुम इधर-उधर ऐसे घूमते काहे नज़र आ रहे होते? या तुम उसकी इतनी कद्र कर रहे होते तो उसको साथ रखने की जो भी क़ीमत थी तुमनें चुका दी होती न, यूँ ही शायरी थोड़े ही कर रहे होते अलग बैठ करके?

पर शायरी करने के भी तो बहुत मज़े हैं न? यह कहना, “हाय! नाकाम हो गया इश्क़ मेरा।” जब इश्क़ नाकाम हो जाता है तो नाकाम आशिक़ फिर देखो कैसे-कैसे फ़ायदे उठाता है? वह पहाड़ों की सैर करता है; वह बढ़िया से बढ़िया उम्दा शराब पीता है; वह कोई काम नहीं करता यह बोलकर के कि अभी तो मेरा दिल टूटा हुआ है; वह घटिया शायरी करता है और अपने सब दोस्तों को व्हाट्सप करता है और उसके दोस्तों को पता है कि आजकल इसका हाल क्या है, तो लिख कर भेजते हैं, "क्या बात है, क्या बात है! गालिब उतर आये हैं।” यह अलग बात है गालिब अपनी कब्र में करवटें ले रहें हों, कह रहे हो, “ये मेरे नाम का किसने इस्तेमाल किया अभी?”

तो इश्क़ की नाकामी के फ़ायदे तो देखो। हर आदमी अपनी नज़र में नाकाम आशिक़ बनकर घूम रहा है। बहुतों का तो ब्रेकअप तब हो जाता है जब उनका कोई अफ़ेयर भी नहीं था।

कह रहे हैं, “क्यों इतने उदास हो?”

“ब्रेकअप हो गया है।”

“अबे तेरा अफेयर कब था भाई?”

पर ब्रेकअप में जो रुहानी आनन्द है, वह तो हिचिंगअप में भी नहीं है। तो जिसको देखो वही घूम रहा होता है कि अरे वह थी हमारी और जो हमारी थी वह क्या, उसका आसमानी रूप था, कतई एंजल थी और जान दिया करती थी हम पर। दो-चार फ़िल्मी गाने लगा लो, वही घटिया क़िस्म के, जिसमें वह सब हो कि — ‘मिलना भी ज़रूरी था, बिछड़ना भी ज़रूरी था’। और अपने ही आप को तुम जता लो कि — हाँ, मेरा बड़ा ज़बरदस्त अफ़साना था जो कि आसमानी ताकतों की वज़ह से बीच में गड़बड़ हो गया है। फिर कहो, “आह! आह!”

देखो भाई, आसमानी अफ़साने, आसमान जैसी ऊँचाइयों वालों को ही मिला करते हैं। सौ बात की एक बात याद रख लो — जिस स्तर के तुम आदमी हो, जिस औक़ात की तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारी प्रेमकथा भी उसी स्तर, उसी औक़ात की होगी। तो यह हिमाक़त तो करना ही मत कि ज़िंदगी है दो फ़ुट की औकात की और दुनिया को बताते घूम रहे हो कि मेरी आशिक़ी का आसमानी अफ़साना था। वह हो नहीं सकता। जैसे तुम, वैसी तुम्हारी प्रेम कथा।

केंचुएँ को हथिनी से इश्क़ नहीं हो सकता, समझ में आ रही है बात? केंचुएँ को चील से भी इश्क़ नहीं हो सकता, वह उड़ती है आसमानों में और इसके पास तो रीढ़ ही नहीं। यह तो तब भी विरोध नहीं करता जब पाँव तले कुचला जाता है। पर हर केंचुएँ का दावा यही है कि मैं भी साहब नाकाम आशिक़ हूँ; वह जो सबसे ख़ूबसूरत चील है आसमानों की वह कभी मेरी महबूबा हुआ करती थी। अरे तू अपनी हालत देख; तू पहले सीधा खड़ा होना सीख; रीढ़ पैदा कर; उसके बाद चीलों की और बाज़ों की और आसमानों की बातें करना।

जिनको एक सुन्दर और ऊँची प्रेम कहानी चाहिए, मैं उनसे कह रहा हूँ कि पहले एक सुन्दर और ऊँचा जीवन पैदा करो। पहले मन तुम्हारा ऐसा होना चाहिए कि उस तरह के ऊँचे प्रेम के काबिल हो। लेकिन हर सोलह साल वाले, अट्ठारह साल वाले से लेकर के पचास साल वालों तक को मुगाल़ता यही है कि ज़िंदगी साहब हमारी कैसी भी हो, आशिक़ी हमारी बिलकुल हीर-राँझे जैसी होगी। यह हो नहीं सकता साहब। लैला-मजनू, हीर-राँझा, ये कोई साधारण लोग नहीं थे। एक असाधारण प्रेम कथा के लिए पहले एक असाधारण व्यक्ति चाहिए। क्या आप वह असाधारण व्यक्ति है? हर तरीक़े से अगर आप एक औसत ज़िंदगी बिता रहे हैं तो आपकी प्रेम कथा भी एक औसत सी ही होगी। और औसत प्रेम कथाएँ तो सभी की होती हैं। औसत प्रेम कथाएँ यही होती हैं कि नर-केंचुएँ को मादा-केंचुआँ दिखी; वह जितनी गति से भाग सकता था, अब केंचुएँ की क्या गति होगी, वह उतनी गति से उसके पास गया, बोला, “तेरे लिए देख मिट्टी ख़ोदकर के यह लड्डू लाया हूँ” और उसने उसको लड्डू थमा दिया, दिल जीत लिया। वह उसको बोल रही है, “मेरा किच्चू”, वह उसको बोल रहा है, “मेरी किच्ची”। पाँच-सात दिन बाद देखा गया छोटे-छोटे कुच्चू-कुच्चू घूम रहे हैं बहुत सारे — यही है एक औसत प्रेम कथा।

इम्तियाज़, तुम्हें ठेस पहुँचाना या दिल तोड़ना कतई मेरा उद्देश्य नहीं है। पर टूटा हुआ दिल लेकर तो तुम घूम ही रहे हो, मैं तुम्हें सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि तुमनें अपना दिल ज़बरदस्ती, बेवजह और ख़ुद ही तोड़ रखा है, हालात जिम्मेदार नहीं है। तुम अपनेआप को धोखा दे रहे हो। अपने इर्द-गिर्द तुमनें यह जो धोखे का धुआँ रच रखा है, इससे बाहर आओ, सेहत के लिए ठीक नहीं है।

प्र२: आचार्य जी, एक गाना याद आ रहा है इस पर — "जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला।"

आचार्य: वह बहुत अलग लोग थे, तुम्हारे जैसे लोग नहीं थे। अहंकार का यही काम है न कि ऊँचे से ऊँचे लोगों से भी अपनी तुलना कर लेना — "जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला। हमने तो जब कलियाँ माँगी, काँटों का हार मिला।"

अरे तुम ख़ुद बहुत बड़ा काँटा हो जो अपने ही दिल में धँसा हुआ है। काँटे को काँटा नहीं मिलेगा तो क्या मिलेगा? और अच्छी बात है काँटे को काँटा मिले क्योंकि काँटे को काँटा ही निकालता है। काँटे के कलियाँ किस काम की? जैसे तुम हो वैसा ही फिर तुम्हें कोई मिल जाएगा क्योंकि वैसे ही तुम खोजने लग जाते हो।

पर यह हमें बड़ी गलतफ़हमी रहती है अपने बारे में। एक बिलकुल औसत आदमी घूम रहा होगा, औसत से भी निकृष्ट, घटिया। लेकिन जब उसकी भी आशिक़ी तन जाएगी तो कहेगा, “तू मेरी राधा, मैं तेरा कान्हा।” तुम किस मामले में कान्हा के समतुल्य हो भाई बताना? ज़िंदगी में तुमनें ऐसा क्या किया है जो कृष्ण सरीखा हो? लेकिन अब तुमको एक स्त्री से यौन आकर्षण हो गया है तो तुम अपनेआप को कृष्ण बोलने लग गए और वह तुम्हारी राधा हो गई? यह सबको रहता है, कहते हैं, “देखो, जो भी लोग प्रेम करते हैं, वो राधा-कृष्ण जैसे होते हैं।”

ऐसे कैसे भाई? ऐसे नहीं होता, सौरी।

प्र३: आचार्य जी जब इस तरह कि घटना होती है कि ब्रेकअप हो गया, तो निश्चित ही काफी पॉसिबिलिटी (संभावना) है कि जो रिलेशनशिप (संबंध) थी उसमें वह बहुत सही तरह की रिलेशनशिप तो नहीं रही होगी। तो ब्रेकअप के बाद एक मनोस्थिति होती है जिसमें तुरंत कुछ रिलीफ़ (राहत) चाहिए होता है। आपने कुछ उदाहरण दिए — कोई शराब पीने लग जाता है; कोई दूसरे तुरंत कोई दूसरे रिलेशनशिप में जाने के चक्कर में रहता है या कोई कहीं घूमने चला गया या कुछ हो गया। तो उस समय जो मनोस्थिति होती है, उस मनोस्थिति को क्या कुछ पॉजिटिव डायरेक्शन (सकारात्मक दिशा) में जाने का विंडो (द्वार) भी बनाया जा सकता है?

आचार्य: बहुत अच्छा अवसर होता है यह देखने का कि चल क्या रहा था मेरे साथ। तुम अभी-अभी एक बुरे सपने से जगे हो; उस बुरे सपने को इन्द्रधनुषी रंगों में रंगने की कोशिश मत करो। वह बुरा सपना था और मानो कि वह एक बुरा सपना था। पूछो अपनेआप से कि मैं इस सपने में अभी तक फँसा कैसे हुआ था, यह हुआ क्या मेरे साथ। अगर तुमनें यह सवाल अपनेआप से बेबाकी और ईमानदारी से पूछ लिए तो उसी तरीक़े का दूसरा बुरा सपना देखने से बच जाओगे। नहीं तो वही होगा जिसकी बात कर रहे हो कि एक रिलेशनशिप से निकल कर के आदमी तुरंत ऑन द रिकॉइल दूसरी रिलेशनशिप में प्रवेश कर जाता है। और वह बिलकुल वैसी ही होती है पहले जैसी। बस उसका नाम, रूप, रंग, अलग होता है। यथार्थ में वैसी ही होती है, बिलकुल पहले जैसी।

पहले क्या हुआ इस पर ज़रा ग़ौर तो कर लो कि यह जो हुआ था यह वास्तव में क्या है। और यह बहुत बहुत सूरमाई का, बड़ी वीरता का काम है — अपनेआप से साफ-साफ यह पूछ पाना कि यह मैंने क्या किया था, यह बिल्कुल ठीक-ठीक बताओ क्या हुआ था।

प्र३: सर, जब अवसाद और आत्महत्या की बात करते हैं तो एक किशोर के जीवन में मुख्यतः दो कारण पाए जाते हैं। एक तो कि किसी लड़की के साथ ब्रेकअप इत्यादि हो जाना या फिर स्कूल में दसवीं-बारहवीं में नंबर ख़राब आना। तो जो पहली बात है, ब्रेकअप इत्यादि हो जाना, उसमें ऐसा देखा गया है कि अगर कोई सत्रह-अट्ठारह साल का लड़का एक संबंध में, क्योंकि पहली बार अगर कोई आपको बड़ा महत्व दे रहा होता है तो अच्छा लगता है अहंकार को। फिर वह एकदम से संबंध विच्छेद हो जाता है तो उसे बड़ा आघात महसूस होता है। तो आपने इम्तियाज़ को तो बता दिया कि उनके जो पूरे जितने भी ख़यालात उन्होंने बुने हैं, वह हो सकता है फ़र्जी हों। फिर भी जो उसका प्रभाव होता है वह प्रभाव तो असली होता ही है, वो महसूस तो हो रहा होता है।

आचार्य: मैं उसी बात पर देखो और ज़ोर दूँगा और बार-बार दूँगा — जो लोग ब्रेकअप के बाद रो रहे हैं, उनके रोने के पीछे उनकी धारणा यही है न कि कोई अच्छी चीज़ थी जो ख़त्म हो गई। तुम्हारे पीछे कोई शेर लगा हो। नहीं, तुम्हारे पीछे एक शेर लगा था, तुम्हारे पीछे एक शेर लगा था और उसने तुमको दौड़ाया है पंद्रह मिनट तक। बहुत सुस्त शेर था, पंद्रह मिनट तक आमतौर पर ज़रूरत नहीं पड़ती दौड़ाने की। तो बहुत ही सुस्त शेर था, बिलकुल तुम्हारे ही जैसा। तुम से भी ज़्यादा सुस्त क्योंकि पंद्रह मिनट बाद तुम उससे बचकर निकल भी लिए। तो उसने तुमको पंद्रह मिनट तक दौड़ाया था। अब तुम याद करोगे कि — अरे ब्रेकअप हो गया शेर के साथ, और अहा-अहा क्या खुशबूएँ थी। ऐसे करोगे?

अरे बाबा, ब्रेकअप का मतलब यह है कि तुम उस रिश्ते में ख़ुश नहीं थे। नहीं तो ब्रेकअप क्यों हुआ होता? तो अब रो क्यों रहे हो? तुम्हारे साथ तो अच्छा हुआ है। लेकिन यथार्थ का सामना न करना पड़े इसके लिए हम अपने साथ ही कपट करते हैं, एक झूठा स्मृति जाल रचते हैं। हम ऐसी-ऐसी घटनाओं की बात करने लगते हैं जो कभी हुई ही नहीं थीं। जब चल रहा था वह रिश्ता तब वह हमें कभी उतना अच्छा नहीं लगा जितना रिश्ता टूटने के बाद लगा। क्योंकि जब चल रहा था तब हक़ीक़त सामने थी तो क्या अच्छा लगता तुमको? तब तो यह लग रहा था कि कैसे पिंड छूटे, ब्रेकअप हो जाये। जब टूट गया है तो तुम ज़बरदस्ती अपनेआप को जता रहे हो कि ऐसा था और वैसा था। जो नहीं हुआ वह भी तुम्हारी स्मृति में हो गया है, जहाँ कभी गए ही नहीं वहाँ भी पहुँच गए; या जिस जगह पर बस आधा घंटा रुके थे, वहाँ पर तुम छः घंटे रुक आये; या जिस बाबत तुमसे दो शब्द बोले गए थे वहाँ तुम कह रहे हो कि हमसे पूरा एक लेख सुनाया गया था; निबंध सुना दिया गया था। यह फैब्रिकेटेड मेमोरी है, यह फॉल्स मेमोरी (झूठी यादें) है और यह बहुत ख़तरनाक बात है।

जितने भी लोग यादों में तड़प रहे हों उन सबसे मैं कह रहा हूँ — अरे बाबा, तुम्हें जिस चीज़ की याद है वह घटना कभी घटी भी थी? जो बात तुम बता रहे हो कि ऐसा हुआ, फिर वैसा हुआ, फिर वैसा हुआ, वह सब हुआ भी था कभी। क्या हुआ था क्या तुम बता रहे हो!

स्मृति अपनेआप में कोई ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) चीज़ नहीं होती, याद रखना। मेमोरी भी जो सेंट्रल-टेंडेंसी (केन्द्रीय प्रवृत्ति) है, उसकी गुलाम होती है। स्मृति अहंकार की अनुगामिनी होती है; स्मृति अहंकार की गुलाम होती है। तो अहम् जो चाह रहा होता है, स्मृति उस हिसाब से बदल जाती है। तुम्हारी जो मेमोरी है वह कम्प्यूटर या फ़ोन की मेमोरी की तरह नहीं है कि उसमें तुमनें दस साल पहले जो सेव किया था, वह दस साल बाद भी वही निकलेगा। नहीं, बिलकुल नहीं है।

हमारी मेमोरी, सब्जेक्टिव मेमोरी (व्यक्तिनिष्ठ) है। हम वही याद रखते हैं जो हम रखना चाहते हैं और जो हम याद रख रहे हैं उसमें से कुछ हिस्सा हम बढ़ा देते हैं, कुछ घटा देते हैं। जो चीज़ें जुड़ी नहीं होती उनको जोड़ देते हैं। कुल मिला-जुला कर हम ऐसी कहानी बना देते है जिसका यथार्थ से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होता। तो जो लोग यादों से तड़प रहे हों — ‘क्या यादें हैं पुरानी!’, मैं उनसे कह रहा हूँ उन यादों में ही घुस जाओ और पूछो की यादें सच्ची भी है क्या।

तुम मुझसे पूछते हो अतीत की यादें मिटाएँ कैसे? मैं कह रहा हूँ मिटाने की ज़रूरत नहीं है। उन यादों में और क़रीब जाकर के प्रवेश कर जाओ; उन यादों को फाड़ कर उनके भीतर घुस जाओ, तुम्हें दिख जाएगा वो यादें ही झूठी हैं। यादें तुमसे चिपकी इसीलिए हुई हैं क्योंकि तुमनें अपनेआप को यह भ्रम दे रखा है, धोखा दे रखा है कि यादें असली हैं। वो यादें असली हैं ही नहीं। जाकर के उन यादों की जाँच-पड़ताल तो करो, ख़ोज-बीन करो, पूरी कहानी देखो ज़रा। तुम्हें बहुत कुछ ऐसा याद आएगा अब, जो तुम याद करना नहीं चाहते। और बहुत कुछ जो तुमनें याद रखा हुआ है तुम्हें समझ में आएगा कि झूठा है, नकली है। तो यादों से भागो नहीं; यादों से अगर परेशान हो तो यादों के सामने बैठ जाओ, जाँच-पड़ताल करो, याद को फाड़ कर याद में घुस जाओ। दिखाई दे जाएगा कि याद ही नकली है, याद रखने लायक नहीं।

प्र३: सर, यह बात बिलकुल सही है कि अक्सर मेमोरी इज़ क्रिएटेड इन रेट्रो स्पेक्ट। ए गोल्डन पास्ट इज़ बिल्टअप सो दैट यू कैन फ़ील नोस्टैल्जिक एंड ऑल अबाउट दैट (स्मृति पूर्वव्यापी रूप से निर्मित होती है। एक सुनहरा अतीत इसलिए बनाया जाता है ताकि आप पुरानी यादों और उसके बारे में सब कुछ महसूस कर सकें), यह बात सही है। पर ब्रेकअप के बाद जो यंगस्टर्स (युवा) होते हैं, अक्सर ऐसी चीज़ें यह तो बिल्टअप नहीं होती हैं, जैसे मेडअप नहीं होती हैं, जैसे ट्यूशन जाया करते थे तो ट्यूशन में पहले वह भी आती थी यहीं बैठती थी, इस सड़क के इस मोड़ से यहाँ मुड़ा करते थे, यहाँ मिलते थे, यहाँ पर जाकर खाना खाया करते थे, यह तो बड़े फैक्चुअल प्वाइंट्स (तथ्यात्मक बिंदु) हैं।

आचार्य: अब यह भी तो याद करो, जब खाना खा रहे होते थे उसी समय पर वहाँ छः मक्खियाँ होती थीं। वह जो मक्खियों का होना था, उस घटना का हिस्सा था। और मक्खियों के होने के कारण वह घटना उतनी रोमैंटिक नहीं थी जितनी तुम्हारी मेमोरी में है। पर तुमनें अपनी मेमोरी से उन मक्खियों को तो बिलकुल ही हटा दिया। तुम और वो बैठकर के ढाबे पर परांठे खा रहे हो और तुमनें मेमोरी से इस बात को ही हटा दिया कि बगल में वह बाइक वाला था, जो बिना साइलेंसर की अपनी बाइक को रेस दिए जा रहा था और धुँआ छोड़े जा रहा था तुम्हारे मुँह पर। अब वह रेस दे रखी है बिना साइलेंसर की बाइक, धुँआ छोड़ रही है, बताओ कितना रोमेंटिक मोमेंट है? परांठे पर मक्खियाँ बैठी हुई है और परांठे के साथ जो अचार है उसमें तो एक मक्खी समाधि ले चुकी है। बताओ कितना रोमांस है? और जब साथ में परांठे खा रहे हो तब डरे भी हुए हो कोई देख तो नहीं रहा और घड़ी भी देख रहे हो कि इसको जल्दी से वहाँ छोड़ कर आना है या कुछ और हो जाएगा। बताओ कितना रोमांस है? कुल मिला-जुला कर उस पूरी घटना में रोमांस था इतना-सा, और बाकी चीज़ें थी इतनी सारी लेकिन तुम्हारी याद में बाकी सारी चीज़ों को तुमनें पर्ज-आउट कर दिया, बिलकुल निकाल दिया, निष्कासित। याद क्या रखा है बस? कि मैं बैठी है, वो बैठे हैं और बीच में परांठा रखा है। फोटोशॉप मेमोरी है न यह।

फोटोशॉपिंग में क्या होता है? कि एक तस्वीर है जिसमें पंद्रह-बीस लोग हैं; तो उसमें दो लोगों को हाई-लाइट कर दिया जाएगा और पीछे वालों को क्या कर दोगे? ब्लर-आउट कर दोगे, उनको फेड-आउट कर दिया। फेड-आउट ही नहीं कर दिया, यह भी हो सकता है कि उनमें जो लोग थे पीछे, उनकी जगह तुमनें डांसिंग-एंजल्स खड़ी कर दी। और अब तुम्हारी मेमोरी क्या बता रही है? कि मैं और वह जब बैठकर परांठे खाया करते थे तो पीछे हूरें आकर के नाचा करती थी। यह है तुम्हारी फोटोशॉप मेमोरी। और इस फोटोशॉप मेमोरी को केंद्र बना कर के तुम इतने आँसू बहा रहे हो कि हाय-हाय मेरे साथ कितना गलत हो गया।

यह तो तुमको याद है कि वह अपनी स्कूटी पर आती थी, तुम अपनी बाइक पर जाते थे और उसका पीछा करते थे। और यह भूल गए कि पुलिस ने तुम्हें कितना सुजाया था पीछे से। वह तुमनें मेमोरी से बिलकुल ही निकल दिया और मेमोरी से यह बात तो पूरी तरह निकाल दी है कि पुलिस को बुलाने वाला कौन था — वह ख़ुद थी। और यह बात तुम याद ही नहीं रखना चाहते तुम्हारा पिछवाड़ा सुजवाया किसने था। अब बताओ कितना रोमांस बचा मेमोरी में?

पूरी बात याद रखो न! मैं कह रहा हूँ सत्य वह है जो पूर्ण होता है। हम पूरी बात याद नहीं रखना चाहते। और सत्य वह है जो बदले नहीं। तुमनें बदल कैसे दी मेमोरी ? तो मेमोरी अपनेआप में एक छलावा है, झूठ है।

अपनेआप को ऊँचा करो, बेहतर करो; तुम्हारे प्रेम-प्रसंग अपनेआप बेहतर हो जाएँगे; वह सही रास्ता है।

प्र३: जस्ट टू एनरिच द डिस्कशन, आई एम आल्सो ट्राइंग टू लुक एट इट एज़ ए सेम प्रॉब्लम दैट हप्पेन्स व्हेन सोमबॉडी क्लोज़ टू यू डाइज़। सो यू यूज्ड टू हेव सर्टन काइंड ऑफ एक्सपीरियंस विद देम ए वीक अगो, एंड नाउ यू आर हेल श्योर देट द सेम एक्पीरिंसेज, रियल एक्पीरियंस ऑफ लाइफ कैननॉट बी रिपीटेड एवर अगेन। सो द सेम पर्सन वोंट एवर अगेन सिट विद यू ऐट दैट प्लेस एंड ईट (चर्चा को समृद्ध करने के लिए मैं भी इसे एक ऐसी ही समस्या के रूप में देखने की कोशिश कर रहा हूँ जो तब होती है जब कोई आपके करीब होता है। एक सप्ताह पहले आपको उनके साथ कुछ ख़ास तरह का अनुभव होता था और अब आप निश्चित हैं कि वही अनुभव, जीवन के वास्तविक अनुभव दोबारा कभी दोहराए नहीं जा सकते, वह व्यक्ति दोबारा कभी आपके साथ उस जगह पर बैठकर खाना नहीं खाएगा)।

तो वह जो ब्रेन में होता है न कि वह पहले ऐसे अनुभव हुआ करते थे और वह उसकी दुबारा माँग कर रहा था कि वह प्लेजरेबल (सुखद अनुभव) थे।

आचार्य: वह जो पहले अनुभव होते थे, वह इनसेपरेबल (अपृथक) थे, उसके साथ के छः और अनुभवों से जो प्यारे नहीं है। एक साथ एक बंडल है सात अनुभवों का, जो तुम्हारे पास आया है। छः ऐसे हैं जो कड़वे हैं और सातवाँ है जो मीठा है। जो सातवाँ है वह मीठा इसीलिए है क्योंकि उसके इर्द-गिर्द छः कड़वे अनुभव‌ है। वह छः कड़वे अनुभवों को जानबूझ करके दबा देना चाहते हो, भुला देना चाहते हो। तुम याद रख रहे हो सिर्फ़ सातवें मीठे अनुभव को, जैसे वह सातवाँ मीठा अनुभव उन छः के बिना भी तुम्हें हो सकता था। तुम क्यों भूल रहे हो देट द सेवन आर इनसेपेरेबल फ्रॉम ईच अदर (सातों एक दूसरे से अलग नहीं हैं)

प्र: तो आप कह रहे हैं कि अगर अब पैचअप फिर से हो जाए, तो वह जो सातवाँ आएगा तो फिर से छः और लेकर आएगा।

आचार्य: बेशक़, बेशक़।

प्र३: यह पैचअप यूजवली (ज़्यादातर) फिर से ब्रेकअप में …

आचार्य: बिलकुल। क्योंकि मूलतः कुछ नहीं बदला है। जो तुम हो, जो सामने वाला व्यक्ति था, अगर दोनो की ही चेतना में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आया है तो तुम पैचअप कर भी लो, तो उसका हश्र वही होना है — ब्रेकअप। और अगर ब्रेकअप नहीं हो रहा तो यह और ख़तरनाक बात है क्योंकि अब ऊपर-ऊपर पैचअप रहेगा और भीतर-भीतर दिलों में ब्रेकअप रहेगा।

प्र३: क्या यह हो सकता है कि सिर्फ़ वह सातवाँ ही अनुभव रहे?

आचार्य: नहीं हो सकता।

प्र३: क्योंकि अक्सर ब्रेकअप इसलिए होता है क्योंकि वह सात के साथ एक से छः वाले भी होते हैं। तो एक से छ: वाले अनुभव होते हैं, वो ब्रेकअप का कारण होते हैं। सातवें के कारण याद आ रही होती है और सातवें के कारण शायद दोबारा पैचअप भी हो जाता है।

आचार्य: इसका तरीका यह है कि इन सातों को ही छोड़कर के किसी ऊँचे अनुभव की ओर जाना होगा जहाँ पर दूसरे किस्म के अनुभव होते हो — दो, तीन, चार, पाँच जो भी होते हैं।

पर यह जो पूरा बंडल ही है सात का, यह तो साथ-साथ ही चलते हैं, हम साथ-साथ हैं। ऊपर जाना होगा जहाँ कुछ अलग किस्म के अनुभव होते हैं और ऊपर तुम जा नहीं सकते जब तक कि तुम ख़ुद नीचे बैठे हो। ऊँची कोटि के अनुभव पाने के लिए मैं कह रहा हूँ पहले खुद ऊँची कोटि का इंसान होना पड़ेगा। तुम बेहतर बंदे नहीं हो तो तुम्हें बेहतर अनुभव नहीं हो सकते।

प्र३: तो जो लड़का, उन्नीस साल का लड़का, जिसने आपको नया-नया ही सुनना शुरू करा है और उसका अनफॉर्चुनेटली (दुर्भाग्यवश) दो दिन पहले ब्रेकअप हुआ है।

आचार्य: अनफॉर्चुनेट क्या है इसमें?

प्र३: उसके लिए, उसके लिए अनफॉर्चुनेट है, उसे ऐसा लग रहा है। आपको नहीं लगता आप उससे कुछ ज़्यादा ही माँग कर रहे हैं, जब आप कह रहे हैं कि उसी क्षण में वह रिफ्लेक्ट (विचारना) करे और रिअलाइज (समझना) करे कि….

आचार्य: मैं उससे कोई माँग नहीं कर रहा हूँ। वह ज़िंदगी से माँग कर रहा है सुकून की, इसलिए वह मुझे सुनने आया है। मेरे सामने नहीं आया होता वह तो मैं उससे कोई माँग क्यों करूँगा?

पहले, पहल किसने करी है? मैंने उससे बोलना शुरू किया या उसने मेरे सामने आना शुरू किया? तो पहली माँग उसकी है न? मेरे सामने आने का मतलब है ज़िंदगी से माँग कर रहा है कि उसको शांति चाहिए, सुकून चाहिए। और जो यह माँग कर रहा हो, उसे फिर माँग के दाम सुनने को भी तैयार होना चाहिए। दुकान में जाते हो माँग करते हो, फ़लानी चीज़ चाहिए, अब दुकानदार दाम नहीं बताएगा तुमको?

तुम मुझसे पूछने आए हो कि शांति, सुकून चाहिए, तो मैं बता रहा हूँ उसकी क़ीमत क्या अदा करनी पड़ेगी। और ईमानदारी यह मेरी कि सही दाम बता रहा हूँ। झूठे या छोटे दाम क्यों बताऊँ? हीरा अगर लाख़ का है तो लाख़ बताना फ़र्ज़ है न मेरा?

प्र३: उस कमज़ोर क्षण में उसको हिम्मत कौन देगा कि वह इतना मज़बूत हो जाए कि यकायक। कहाँ तो वह लड़का ऐसा था कि ऐसे रिलेशनशिप में फँसा हुआ था, जहाँ पर एक से छः तक की गंदगी थी। अब अचानक से उसमें इतनी हिम्मत आ जाएगी कि वह रिफ्लेक्ट करने लगेगा और अपनी सारी गलतियाँ देख पाये?

आचार्य: समझदारी और ज्ञान से बड़ी ताक़त कोई नहीं होती। जो आदमी समझ रहा है, वह आदमी अपनी कमज़ोरियों से बाहर आ गया। कमज़ोरी तुम्हारे बाजू में तो है नहीं? कोई ऑब्जेक्टिव चीज़ तो है नहीं कमज़ोरी? कमज़ोरी तुम्हारी मेज़ में तो है नहीं? कमज़ोरी कहाँ है? कमज़ोरी तुम्हारे मन में है; कमज़ोरी पूरे तरीके से व्यक्तिगत है, सब्जेक्टिव है। है न?

तो जो व्यक्तिगत कमज़ोरी है, वह वास्तव में तुम्हारी एक धारणा होती है, एक बिलीफ़ (विश्वास) होती है। समझ कर तुम उस बिलीफ़ से बाहर आ जाते हो। जैसे कोई किसी अंधविश्वास में उलझा हुआ हो और उसको समझा दिया गया हो कि भाई तू सोच रहा है कि चन्द्रग्रहण के दिन एक बहुत बड़ा ड्रैगन जाकर के चाँद को खा जाता है, ऐसी बात नहीं है। तो सिर्फ़ समझने के कारण वह उस बिलीफ़ से बाहर आ गया न? और हो सकता है वह थोड़ी देर पहले तक बहुत कमज़ोर होकर सोच रहा हो कि जो ड्रैगन चाँद को खा सकता है वह मुझे तो खा ही लेगा और बिलकुल थर-थर काँप रहा था चंद्र ग्रहण के दिन। कहाँ गई उसकी कमज़ोरी?

जैसे ही झूठी बिलीफ़ हटी, वैसे ही झूठी कमज़ोरी भी हट गई। कमज़ोरी असली तो है नहीं! मैंने कहा न यह क्या है? सिर्फ़ यह एक मेंटल बिलीफ़ है, मानसिक धारणा है। तो जो कमज़ोरी सिर्फ़ मन में एक धारणा के कारण है, जैसे ही मन की वह धारणा हटेगी, साथ में वह कमज़ोरी भी हट जाएगी। इसलिए रियलाइज़ेशन से, बोध से बेहतर कोई चीज़ नहीं है कमज़ोरी को हटाने के लिए।

प्र३: तो जो युवा, ब्रेकअप इत्यादि के बाद कमज़ोर क्षणों में भावनाओं के फलस्वरूप आत्महत्या जैसे ग़लत कदम उठा लेते हैं, उनको यही संदेश है कि वह उन क्षणों में….

आचार्य: बिलकुल, बिलकुल, बिलकुल। भागने की कोशिश मत करो, मेमोरीज़ से भागो नहीं; बुरा लगेगा, दिक़्क़त होगी। लेकिन उन मेमोरीज़ के पास जाओगे, जितना पास जाओगे, उतना तुम्हें समझ में आएगा कि इसमें ऐसा क्या खास है कि मैं इसको दोबारा माँग रहा हूँ।

जिन यादों को तुम दोबारा माँग रहे हो, जिन क्षणों को तुम दोबारा जीना चाहते हो, जिस व्यक्ति की तुम्हें दोबारा माँग है, गौर से देखो न उन क्षणों को, उन यादों को, उस व्यक्ति को। तुम कहोगे इसमें ऐसा क्या है कि मैं दोबारा माँगू; पहले मिला तो हुआ था; पहले जब मिला हुआ था तब मुझे कौन सी इससे तृप्ति हो गई थी कि दोबारा मांगूँगा, पागल हूँ क्या? यूँ ही एक हवा-महल मत खड़ा कर लो अपने दिमाग में, काल्पनिक।

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