प्रश्नकर्ता: किसी की यादें दिल से कैसे निकालें? समझ नहीं आता कि नाकाम इश्क़ का मातम मनाएँ या उन दो सालों की खुशबुओं का जशन। यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है और यादों से बाहर बेकस और मायूस। (इम्तियाज़ अली हैं लखनऊ से)
आचार्य प्रशांत: यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है और यादों से बाहर बेकस और मायूस। उन दो सालों की खुशबुओं का जशन, समझ नहीं आता कि नाकाम इश्क़ का मातम मनाएँ या उन दो सालों की खुशबुओं का जशन।
तो यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है। इसीलिए यादों से बाहर आने पर मायूसी छा जाती है न इम्तियाज़(प्रश्नकर्ता)? यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है, वर्ना तो जो सामने है, वर्तमान है, उसमें अपनेआप में कोई ख़ास बुराई नहीं है। पर जब यादों से बाहर आते हो तो जो वर्तमान है, सामने है वह बड़ा बेरौनक, रूखा-फ़ीका लगता है, क्योंकि यादों में क्या थी? रोशनियाँ और ख़ुशबूएँ। यादों से बाहर आये तो न रोशनी है न खुशबू है, तो बड़ा अजीब लगा। जैसे कह रहे हो — बेकसी छा गई, विवशता।
ये यादें भी सच्ची हैं क्या? तुम्हारी सारी तड़प का कारण है कि तुम्हें जो याद है वह तुम्हें बड़ा प्यारा लग रहा है। जो तुम्हें याद है वह तुम्हें प्यारा तो लग ही रहा है जो चीज़ तुम कह नहीं रहे वह यह है कि उसको तुम सच्चा मानते हो। आप कहेंगे, “साहब, अब मुझे याद है तो सच्चा ही तो होगा।”
नहीं! देखो तुम्हें याद है और तुम्हें प्यारा लग रहा है यहाँ तक तो ठीक है पर कोई चीज़ तुम्हें याद है पर वह सच्ची हो यह ज़रूरी बिलकुल भी नहीं है। अब आपको ज़रा आश्चर्य होगा, आप कहेंगे, “यह कैसी बात है? साहब, मुझे कोई चीज़ याद है तो सच्ची ही तो होगी।”
नहीं इम्तियाज़, नहीं। समझाने वालों ने हमसे कहा है सच की दो निशानियाँ होती हैं — पहली यह कि वह बदलता नहीं और दूसरी यह कि वह पूरा होता है। वो जो दो साल तुमको याद हैं, उनकी सारी बातें तुमको पता है क्या? और दूसरी बात, जो कुछ तुम याद कर रहे हो, याद रख रहे हो, उसमें क्या तुमनें कोई भी छेड़खानी, फ़ेर-बदल नहीं करी है?




