संकोच, डर, मोह: इनका इलाज चाहिए? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी. रुड़की में (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्कार। मेरा एक छोटा सा प्रश्न है जिसका उत्तर मैं आपके विचारों के माध्यम से जानना चाहता हूँ। तीन शब्द हैं मेरे मस्तिष्क में — संकोच, डर और ज्ञान। क्या किसी तरह से ये आपस में सम्बन्धित हैं या किसी बिन्दु पर एक-दूसरे को कहीं परस्पर काटते हैं?
आचार्य: बीच वाला, तीसरे वाले से बचे रहने के लिए, पहले वाले का सहारा लेता है। (श्रोतागण शोर करते हुए ताली बजाते हैं)
प्र: आचार्य जी, अगर इसको थोड़ा और व्याख्या सहित बताते तो।
आचार्य: मूलवृत्ति का ही एक नाम है 'डर'। और डर जितना डरा होता है, उतना ख़ुद को बचाने की कोशिश करता है। समझाने वालों ने यहाँ तक कहा है कि डरे हुए से डरना।
डरा हुआ आदमी बहुत ख़तरनाक होता है। जो डरा हुआ हो, उससे ज़रा दूर-दूर रहो, वो कुछ भी कर सकता है। और डर अस्तित्वमान होता ही इसीलिए है क्योंकि वो सच से दूर है। जो सच में रहेगा वो डरेगा नहीं। डर डरा हुआ है कि कहीं मुझे कुछ हो न जाए।
और डर अस्तित्व में ही इसीलिए है क्योंकि वो सच से दूर है। लेकिन उसे ख़ुद को बचाना है। अगर ख़ुद को बचाना है तो उसे किससे दूर रहना पड़ेगा?






