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संकोच, डर, मोह: इनका इलाज चाहिए? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी. रुड़की में (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
16 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्कार। मेरा एक छोटा सा प्रश्न है जिसका उत्तर मैं आपके विचारों के माध्यम से जानना चाहता हूँ। तीन शब्द हैं मेरे मस्तिष्क में — संकोच, डर और ज्ञान। क्या किसी तरह से ये आपस में सम्बन्धित हैं या किसी बिन्दु पर एक-दूसरे को कहीं परस्पर काटते हैं?

आचार्य: बीच वाला, तीसरे वाले से बचे रहने के लिए, पहले वाले का सहारा लेता है। (श्रोतागण शोर करते हुए ताली बजाते हैं)

प्र: आचार्य जी, अगर इसको थोड़ा और व्याख्या सहित बताते तो।

आचार्य: मूलवृत्ति का ही एक नाम है 'डर'। और डर जितना डरा होता है, उतना ख़ुद को बचाने की कोशिश करता है। समझाने वालों ने यहाँ तक कहा है कि डरे हुए से डरना।

डरा हुआ आदमी बहुत ख़तरनाक होता है। जो डरा हुआ हो, उससे ज़रा दूर-दूर रहो, वो कुछ भी कर सकता है। और डर अस्तित्वमान होता ही इसीलिए है क्योंकि वो सच से दूर है। जो सच में रहेगा वो डरेगा नहीं। डर डरा हुआ है कि कहीं मुझे कुछ हो न जाए।

और डर अस्तित्व में ही इसीलिए है क्योंकि वो सच से दूर है। लेकिन उसे ख़ुद को बचाना है। अगर ख़ुद को बचाना है तो उसे किससे दूर रहना पड़ेगा?

डर का जन्म ही कब होता है? जब वो सच से दूर होता है। सत्य से ही दूरी का नाम डर होता है। और डर कहता है, 'मुझे कुछ हो न जाए, मुझे बचाओ!' डर को अगर बचे रहना है तो उसे किससे दूरी बनाकर रखनी पड़ेगी? सच से। अब सच ऐसी चीज़ है जो सूरज की तरह चमकता है। क्या तर्क देकर तुम उससे दूरी बनाओगे?

तो एक तर्क जो होता है, कई तर्कों में एक तर्क होता है 'संकोच'। 'अभी मुझे पूरा पता नहीं है। अभी मैं संशय में हूँ। नहीं, बात ठीक लग रही है इनकी। ऐसा नहीं कि हम कह रहे हैं कि बात ग़लत है। निन्यानवे-दशमलव-नौ-प्रतिशत ठीक है। अभी शून्य-दशमलव-एक-प्रतिशत संशय बाक़ी है। जब उतना संशय भी चला जाएगा, तब हम सच की ओर जाएँगे।' और बेटा, वो शून्य-दशमलव-एक-प्रतिशत तो हमेशा बचा ही रहेगा। कुल मिलाकर तुमने सच से सदा दूर रहने का इंतज़ाम कर लिया है। निन्यानवे-दशमलव-नौ-प्रतिशत की नहीं सुन रहे तुम, शून्य-दशमलव-एक-प्रतिशत की सुनने को राज़ी हो, ये साज़िश है कि नहीं?

भई! चुनाव हो, एक को मिले निन्यानवे-दशमलव-नौ-प्रतिशत वोट और एक को मिले शून्य दशमलव एक और तुम कहो, 'पर अभी कुछ लोग तो हैं न जो इनके विरोध में हैं, तो अभी इनको गद्दी नहीं दे सकते।' तो तुम किसकी सुन रहे हो, निन्यानवे की या एक की? ये साज़िश नहीं है क्या? निर्भीकता दिखानी पड़ती है।

सच के आगे संकोच करना, सच के विरुद्ध द्रोह है।

और ये इंतज़ार करते रहोगे कि पूरा पता चल जाए, पूरा पता चल जाए, तो पूरा कभी नहीं पता चलेगा। हाँ, पूरा पता करने का प्रयास हमेशा चलता रहना चाहिए। पर सत्य अनन्त है। वहाँ तुम ये तो कह सकते हो 'टेंडिंग टू इनफिनिटी' (अनन्त की ओर अग्रसर) पर ये नहीं कह सकते कि मैं पहुँच गया। जब तक तुम इंसानी देह में हो, तुम्हारे पास जो कुछ भी होगा वो सीमित ही होगा। तो क्लेरिटी (स्पष्टता) भी तुम बहुत बढ़ा लोगे, तो भी शत-प्रतिशत नहीं हो सकती। रुके नहीं रहना है। समझ में आ रही है बात?

जहाँ खड़े हो, वहाँ पर जो भी बात ठीक लग रही है, अपने अधिकतम सामर्थ्य से, पूरी ईमानदारी से, 'मैं यहाँ खड़ा हूँ, मुझे ये चीज़ ठीक लग रही है', उस ओर बढ़ो। हाँ, बढ़ते हुए ये गुंजाइश रखो कि आगे कुछ और ठीक लगा तो उधर को मुड़ जाएँगे। लेकिन अगर अपनी जगह खड़े रहोगे और कहते रहोगे कि मैं तो एक क़दम, पहला क़दम भी तभी बढ़ाऊँगा जब शत-प्रतिशत आश्वस्त हो जाऊँगा तो तुम कुछ नहीं कर रहे हो, बस अपनी ही जगह पर टिके रहने का इंतज़ाम कर रहे हो।

जितना जानते हो, पहले तो कोशिश करो अधिक-से-अधिक जानने की, और जितना जानते हो, जितनी बात समझ में आयी है फिर उस पर अमल करो, उसको जियो। जब क़दम एक बढ़ाओगे, वहीं से पता चलेगा कि अब अगला क़दम क्या होना चाहिए। आयी बात समझ में?

संकोच का जो एक आम भाषा में अर्थ है, वो तो है ही। अध्यात्म में संकोच माने जानते हो क्या होता है? छोटा! किसी भी चीज़ को क्षुद्रता दे देना सका संकुचन कहलाता है। और सत्य क्या होता है? विराट, अनन्त! उसमें सीमाएँ नहीं होतीं। जिनको सीमाओं से बहुत प्यार है, वो संकोच खूब करेंगे। जहाँ कहीं तुम्हें भी संकोच हो रहा हो, जान लेना तुम किसी सीमा को बचाना चाहते हो। और सीमा को बचाना अच्छा तो कभी भी नहीं होता न? जहाँ कहीं तुम्हारे लिए एक बाउंड्री (सीमा) खींच दी गयी है, वहीं पर तो तड़पते हो।

ये जो हमारी चेतना है, ये कहीं रुकना नहीं जानती। इसको जहाँ कहीं रोक दोगे, ये वहीं परेशान हो जाती है। इसे मत रोको! इसे विस्तार पाना है, इसे पाने दो!

जितने भी हमने विचार बना रखे हैं, आईडेंटिटीज (पहचान) बना रखी हैं, ख़ुद को लेकर के धारणाएँ बना रखी हैं, वही चेतना को रोकती हैं। वही हमारी सीमाएँ हैं, बाउंड्रीज हैं। हमारा इरादा बिलकुल नहीं होना चाहिए उनका आदर करने का। हमें उनको चुनौती देनी है, उनकी रक्षा नहीं करनी। आप जो कोई भी हो, जहाँ भी खड़े हो, जैसे भी हो, हमारा उद्देश्य है ख़ुद को तोड़ना, ख़ुद को बचाना नहीं।

जो भी निर्णय कर रहे हो जीवन में, ख़ुद को तोड़ने के लिए करो; ख़ुद को बचाये रखने के लिए नहीं। सुनने में अजीब लग रही है बात? दर्द सा हो रहा है सुनकर ही? होता है दर्द, तो होने दो। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "अर्जुन सहो! बस सहो!" एक बिन्दु पर आकर अर्जुन के लिए और कोई सीख नहीं है, बस यही है, "सहो! सहना सीखो!"

जो सही दर्द बर्दाश्त नहीं कर सकते, वो अपना जीवन व्यर्थ करेंगे। ख़ुद को तोड़ो, दर्द होता है, सहो! और एक चोट फिर और दो!

हम किसलिए आये हैं? सुख के लिए नहीं, सत्य के लिए। और जब मैं कह रहा हूँ, 'सुख के लिए नहीं आये हैं', तो आशय ये नहीं है कि दुख के लिए आये हैं। आशय ये है कि सुख से ऊँचा कुछ और होता है। प्लेज़र (सुख) से ऊपर भी कुछ है। और उसमें कुछ है जो हॉईर दैन प्लेज़र (सुख से ऊँचा) है। समझाने वालों ने उसको कहा है 'आनन्द'। वो सस्ती चीज़ नहीं है कि बस दाँत फाड़कर हँस दिये। वो सब सुख में होता है, 'ही-ही-ही!'

आनन्द गहरी चीज़ होती है, बहुत महँगी चीज़ होती है। वो ख़ुद को तोड़ने पर मिलती है। वो उनके लिए है जो छोटी चीज़ से सन्तुष्ट नहीं हैं। छोटी माने? संकुचित। जो संकुचित चीज़ों से सन्तुष्ट न हों, उनके लिए आनन्द है।

जितनी भी जानने वालों की, ज्ञानियों की तुमने मूर्तियाँ देखी होंगी या चित्र वगैरह देखे होंगे, कभी उनको हँसते देखा है? देखा है क्या? वो आनन्दित होते हैं। क्योंकि ये जो हँसना-हँसी, इसको माना गया है कि ये जानवरों की चीज़ें हैं। अपने मज़े के लिए तो जानवर काम करता है। कृष्ण को देखो, राम को देखो, बुद्ध को देखो, महावीर को देखो, जीज़स को देखो, सिख गुरुओं को देखो, हँसता हुआ किसको देखा है? रो भी नहीं रहे हैं वो। जो उनके चेहरे पर है, वो एक गहरी चीज़ है, वो आनन्द है। और वो अपने पूरे जीवन को एक सही दिशा में झोंककर मिलता है।

इट्स दैट, दैट यू मस्ट स्ट्राइव फॉर (यह वो चीज़ है जिसके लिए आपको प्रयास करना चाहिए)। जी रहे हो तो फिर उसके लिए जयो न, किसी हल्की, छोटी, सस्ती चीज़ से समझौता क्यों कर रहे हो? क्या रखा है? एक दिन अभी बूढ़े हो जाओगे। ऐसा लगता है, कल की बात है, मैं उन्हीं कुर्सियों पर बैठा हुआ था। और अभी जितने दिन पीछे उन कुर्सियों पर बैठा था, उतने दिन आगे अभी बीतने नहीं पाएँगे कि राख हो जाऊँगा, इतनी सी है ज़िन्दगी। इंतज़ार किस बात का है?

संकुचित जीवन जीना अपने ही ख़िलाफ़ अपराध है, मत होने दो ये! तुम बहुत-बहुत बड़े होने के लिए, साफ़ और ऊँचे होने के लिए पैदा हुए हो। छुटपन को स्वीकार मत करो! सीमाओं से समझौता मत करो!

प्र२: आचार्य जी, सादर प्रणाम। मैं बहुत देर से आपसे एक प्रश्न पूछना चाह रहा था। हमारा डिस्कशन (चर्चा) उसी मोड़ पर आ गया है। ये कहा जाता है कि कभी किसी चीज़ से ज़्यादा अटैच (संलग्न) नहीं होना चाहिए, डिपेंडेंट (निर्भर) नहीं होना चाहिए। वो हमें वीक (कमज़ोर) बनाता है। तो मैंने उसी से सम्बन्धित एक अच्छी पंक्ति पढ़ी। मैं उसी में आपका नज़रिया जानना चाहता हूँ। वो ये था कि "इफ यू वाॅन्ट टू गेट डिटैच्ड फ्रॉम एनीथिंग, सो गेट अटैच्ड टू द डिवाइन परपस ऑर अ नॉबेल कॉज" (यदि आप किसी भी चीज़ से अलग होना चाहते हैं, तो ईश्वरीय उद्देश्य या किसी महान उद्देश्य से जुड़ें।) तो मैं यही जानना चाहता हूँ कि क्या ये विचार सही है? और अगर ये सही है तो क्या नोबल कॉज़ है, क्या डिवाइन परपस (ईश्वरीय उद्देश्य) है जिससे हमें अटैच होना चाहिए?

आचार्य: मोटे-मोटे तौर पर सही है, पर इसमें स्पष्टता नहीं है। पहली बात जो बोली कि आप किसी चीज़ से अटैच होते हो, वो चीज़ आपको वीक बनाती है। थोड़ा सा इससे अलग है मामला। चूँकि आप कमज़ोर होते हो, इसलिए आप अटैच होते हो। अटैच होने के बाद नहीं कमज़ोर हो जाओगे। अटैचमेंट जो है वो कॉज़ (कारण) नहीं है, अटैचमेंट परिणाम है, इफेक्ट है। किस चीज़ का? आन्तरिक कमज़ोरी का।

भई! तुम्हें किसी का सहारा लेकर के खड़ा होना पड़ रहा है। सहारा लेकर खड़े हुए, इसलिए कमज़ोर हुए या अपनेआप को कमज़ोर मानते थे, इसलिए सहारा लिया? पहले कमज़ोरी आती है। पहले ये भाव आता है कि मैं कमज़ोर हूँ और फिर तुम जाकर के किसी से अटैच हो जाते हो, लिप्त हो जाते हो, चिपक जाते हो। चिपकना अपनेआप में कमज़ोरी की निशानी है। कमज़ोरी परिणाम नहीं है, कमज़ोरी निशानी है। कमज़ोरी इफेक्ट नहीं है, कमज़ोरी सिम्प्टम (लक्षण) है। भीतर पहले ही पता था कि हम कमज़ोर हैं, इसीलिए तो जाकर के कभी इसका सहारा लिया, कभी इस पर आश्रित हो गये। भीतर यह कमज़ोरी का भाव होना नहीं चाहिए।

फिर इन्होंने कहा कि अगर अटैच होना ही है तो किसी डिवाइन परपस से हो जाओ। ठीक बात है! भीतर अगर मैं ये माने ही बैठा हूँ कि मैं कमज़ोर हूँ, आधा हूँ, अधूरा हूँ और छोटा सा हूँ, न जाने मेरा क्या होगा! तो किसी ऐसे की संगति कर लेनी चाहिए जो तुम्हें इस भाव से मुक्त करा दे। कौनसा भाव? जो मूल अहम् भाव होता है।

मूल अहम् भाव यही होता है, 'मैं छोटू सा तो हूँ। कितना कमज़ोर हूँ! हाय! मेरा क्या होगा? दुर्बल हूँ, बेसहारा हूँ, अज्ञानी हूँ, अनाथ हूँ।' अहम् हमेशा इसी भाव में रहता है, इसीलिए तो दुनिया की ओर ऐसे लपक कर देखता रहता है। 'कहीं कुछ मिल जाए, इसको पकड़ लूँ। पैसा हासिल कर लूँ। नौकरी हासिल कर लूँ। बड़े लोगों के साथ नेटवर्किंग (मेल-जोल का जाल बिछाना) कर लूँ।' इन सबके मध्य में मूल भाव क्या है? मैं कमज़ोर हूँ, मैं छोटा सा हूँ।

तो संगति उसकी करनी चाहिए जो आपको आत्मज्ञान दे दे और आत्मज्ञान आपको बताता है कि अपने बारे में छुटपन की जितनी धारणाएँ तुमने बना ली हैं वो मिथ्या हैं।

न तुम कमज़ोर हो, न छोटे हो, न सीमित हो, न तुम्हें किसी का आश्रय चाहिए। तुम कौन हो, ये तुम्हें तब पता चलेगा जब तुम पहले अपने बारे में जितनी धारणाएँ बना रखी हैं, उनको अलग करोगे। जितना तुम अपने बारे में व्यर्थ की धारणाओं को पोषण देते रहोगे, उतना तुमको किसी-न-किसी के सहारे की ज़रूरत पड़ती रहेगी। अध्यात्म तुमको वो बना देता है जो दूसरों को सहारा दे सके। प्रकृति तुमको वो बनाये रखना चाहती है जो दूसरों का सहारा लेता रहे। और अध्यात्म तुमको वो बनाता है जो दूसरों को ऐसा सहारा दे कि फिर उन्हें किसी और के सहारे की ज़रूरत न पड़े। ये सच्चे सहारे की परिभाषा भी हो गयी।

किसी को सहारा देना है या मदद देनी है, तो ऐसा दो कि वो बार-बार फिर मदद माँगने न आये। किसी को संगति अगर देनी ही है, किसी के साथ होना ही है, तो इस तरह से हो जाओ कि फिर उसे बाद में किसी की संगति या साथ की अनिवार्यता न रह जाए।

वो जो भीतर हमारे एक कम्पलसिव नीड फ़ॉर कम्पनी (संगत की अनिवार्य आवश्यकता) होती है न कि कोई मिल जाए, बस किसी तरीक़े से मिल जाए, कोई भी मिल जाए। अकेले जैसे ही होते हैं, मन घबराने लग जाता है। ऐसे व्यक्ति को साथ करना पड़ेगा, क्योंकि वो तो परेशान है न, उसे किसी की संगति तो चाहिए ही। बस उसे सावधानी ये रखनी चाहिए कि किसी ऐसे का साथ करे जो सिर्फ़ उसे साथ न दे, उसे कम्पलसिव लोनलीनेस (अनिवार्य अकेलापन) से आज़ाद कर दे।

ये जो हमारे भीतर अकेलेपन का अनिवार्य भाव होता है, सब में होता है न? कोई नहीं मिला, तो हम क्या करने लग जाते हैं? फ़ोन पर स्क्रॉलिंग शुरू कर देते हैं या किसी को फ़ोन करना शुरू कर दिया, कुछ हम करने लग जाते हैं। और आत्मा के बारे में जानने वालों ने बताया है — वो असंग होती है। जो लोग आत्मस्थ होते हैं, उनको कहते हैं वो कैवल्य स्थिति में स्थापित हैं, जहाँ कोई दूसरा नहीं है।

कृष्ण कहते हैं, "गतसंग।" गत माने बियोंड (परे)। संग माने कम्पनी। 'जिसको अब कम्पनी की कम्पलसिव नीड (संगत की अनिवार्य ज़रूरत) नहीं है, अर्जुन, ऐसे हो जाओ।' ऐसे मत हो जाओ कि चार लोग अगर नहीं मिले तो जी घबरा गया। कोई मिला नहीं तो रात में घूमने निकल गये, 'हाँ भई! तू कैसा है? तू कैसा है?' ऐसे होते हैं न हम? रात में सो करके उठे, 'अरे! अरे! अरे! क्या हो रहा है? क्या हो रहा है?' उठकर गये बगल वाले का दरवाज़ा खटखटाने लगे। कोई और नहीं मिला अगर संगति के लिए, तो अपने विचारों की संगति कर ली, कुछ सोचने लगे गये, कुछ सपना लेने लग गये।

'गतसंग' होना है, वही कैवल्य स्थिति है। और उस स्थिति में फिर तुम जगत के सहारे बन जाते हो। फिर तुम दुनियाभर को सहारा देते हो, लेकिन किसी को भी तुम अपने ऊपर आश्रित नहीं बनाते। जिनके भीतर भी ये सद्भावना हो कि हम दूसरों को सहारा देना चाहते हैं, दुनिया में कोई अच्छा काम करना चाहते हैं, वो बिलकुल ख़बरदार रहें। जब भी किसी को सहारा देना, बार-बार देखते रहना कि कहीं वो तुम पर आश्रित तो नहीं हो रहा। तुम्हारी हेल्प (मदद) उसकी डिपेंडेंसी (निर्भरता) तो नहीं बन रही? समझ में आ रही है बात?

किसी को अपने ऊपर आश्रित बना लेना, उस व्यक्ति के ऊपर अत्याचार है। ये तुमने उसकी मदद नहीं करी, तुमने गुनाह कर दिया।

कोई तुम्हारे ऊपर आश्रित हो रहा हो, तुरन्त सावधान हो जाओ। उसकी आश्रयता न उसके लिए अच्छी है, न ही तुम्हारे लिए। अच्छा, कोई तुम्हारे ऊपर आश्रित हो रहा हो तो तुम्हारे लिए भी क्यों अच्छा नहीं है, बताओ? 'आश्रित' तो समझते हो न? इतना ख़राब तो नहीं हो सकता ज़माना (व्यंग्यपूर्वक हँसते हुए)। आश्रित तो समझते हो न? क्या? डिपेंडेंट। हाँ, तो कोई आकर के तुम्हारे ऊपर आश्रित होने लग गया, ये बात तुम्हारे लिए भी ख़तरे की है, क्यों?

श्रोता: घमंड आ जाता है।

आचार्य: घमंड तो छोड़ो, बहुत बाद की बात है। अभी मुझे इसकी ज़रूरत है तुमसे बात करने के लिए (माइक की ओर इशारा करते हुए)। ठीक है? मान लो इसमें प्राण आ जाएँ, होश आ जाए। और ये बोले, 'अब शाम का वक़्त है, खाना-वाना खाना है, बाहर टहलना है। मुझे बाहर जाना है।' मैं इसे जाने दूँगा? बात समझ गये?

तुम जिस पर आश्रित हो जाते हो, उसको ग़ुलाम बनाते हो।

तुम जिस पर आश्रित हो जाओगे, उसे कभी आज़ाद नहीं छोड़ोगे, क्योंकि अगर वो हट गया तो तुम्हारी ज़रूरत कौन पूरी करेगा! तुम जिस पर आश्रित हो, वो ज़रूरत बन गया न तुम्हारी? और जो कुछ तुम्हारी ज़रूरत बन जाता है, उसको तुम पकड़ कर रखते हो। जो तुम पर आश्रित है, वो तुम्हारा मालिक बनने की कोशिश करेगा।

तुम खुश होते रहोगे, जैसे इन्होंने कहा, 'घमंड हो जाता है।' तुम खुश होते रहोगे कि वो तुम पर डिपेंडेंट (निर्भर) है। वो तुम पर डिपेंडेंट नहीं है, वो तुम्हारा मास्टर बनेगा अब। वो तुम्हें जाने दे ही नहीं सकता। तुम चले गये, तो उसकी ज़रूरत कौन पूरी करेगा अब? आ रही है बात समझ में? तो खुश मत हो जाना कि फ़लाना मुझसे प्यार करता है, अपनी छोटी-छोटी चीज़ों के लिए मुझ पर डिपेंडेंट है। ये ख़तरे की घंटी है, भाग!

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