प्रश्नकर्ता: आख़िर इतना उपद्रव में करने में मज़ा क्यों आता है हम लोगों को?
आचार्य प्रशांत: ये तुम बताओ न कि तुम्हें उपद्रव में क्या मज़ा आता है।
प्र: आख़िर हम लोगों से भूल कहाँ हो रही है?
आचार्य: भूल ये हो रही है कि जब शान्ति मिलती है, तो उसका सम्मान नहीं करते। उसको इतनी क़ीमत नहीं देते कि उसके लिए बिक जाओ। जब शान्ति मिलती है तो उससे कहते हो, ‘अच्छा है, बढ़िया है कि तू मिल गयी, थोड़ी देर ठहर हम उपद्रव के अभी मज़े लेकर आते हैं।‘ और तुम सोचते हो कि तुम स्वेच्छा से जा रहे हो शोर की तरफ़। तुम्हें ये नहीं पता कि तुम शोर में प्रवेश करोगे, शोर तुम्हें सोख लेगा, खींच लेगा, बाँध लेगा और फिर तुम लौट नहीं पाओगे।
पानी में कूदना आसान है, बाहर आना उतना आसान नहीं होता न? पानी में कूद तो हर कोई सकता है, कोई-कोई ही है जो पानी में कूद जाए और फिर बाहर भी आ पाये। तुमको ये बात याद ही नहीं रहती या तुम इस बात को याद रखना ही नहीं चाहते। तुमको लगता है, कूद जाएँगे फिर आ ही जाएँगे किसी तरीक़े से वापस। और ये तुम्हें क्यों लगता है, क्योंकि परमात्मा में एक बहुत बुरा गुण है; निर्गुण में भी गुण है, वो भी बुरा और उसमें बुरा गुण ये है कि वो बहुत बचाता है।
तुम बीस बार कूदे हो पानी में और उसने बीस बार तुमको बचा लिया है। तुमने बीस बार आत्मघाती क़दम उठाये हैं। तुमने बीस बार ऐसे काम किये हैं जिनकी तुमको भरपूर सज़ा मिलनी चाहिए थी, पर उसने सज़ा या तो तुम्हें दी नहीं है या दी भी है, तो जितनी तुम्हें मिलनी चाहिए थी उससे बहुत-बहुत कम।




