सेक्स अगर तुम्हें शांत कर सकता होता, दो बार, चार बार में कर गया होता न? यहाँ तो लोग अपने जीवन काल में हज़ारों बार कर जाते हैं और उसके बाद भी लालायित रहते हैं, प्यास ही नहीं बुझती।
अधेड़ हो गए, साठ के हो गए, अस्सी के हो गए, गोली खा कर जीते हैं और उसमें से एक गोली सेक्स की भी होती है। एक गोली किसी तरह दिल धड़कता रहे, एक होती है कि किडनी चलती रहे, एक गोली है कि साँस चलती रहे और एक गोली साथ में ये भी लिए जा रहे हैं कि योनांग सख्त रहे।
जो प्रक्रिया तुम पंद्रह-बीस की उम्र से शुरू करते हो, वो अस्सी-पच्चासी का होकर के भी पूरी नहीं होती। उसमें कुछ रखा होता तो भाई छः महीने, साल भर में पूरी हो गई होती। चलो छः महीने, साल भर में नहीं, पाँच साल में पूरी हो गई होती। तुम मुझे बताओ तुम्हारा पूरा जीवन खा कर भी वह प्रक्रिया कभी पूरी होती है? तुम पचास-हज़ार बार कर लो मैथुन, तुम्हारी प्यास मरती है क्या? बल्कि होता यह है कि जितना करते हो उतना और डूबते हो।
तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।

जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वो कुछ तो करने की कल्पना करेंगे न। अब आदमी को पता नहीं होता कि सूनापन चीज़ क्या है; वो पैदा कहाँ से हो रहा है। तो उसको भरने के लिए फिर तरह-तरह की कोशिशें करता है, अपनी स्थिति अनुसार। आप स्त्री हो, तो डिमांड पुरुष की करोगे; आप पुरुष हो, तो स्त्री की करोगे। आप ग़रीब हो, तो पैसे की करोगे। ऐसा लगेगा कि अलग-अलग चीज़ों की डिमांड हो रही है। पर वो जो आपकी डिमांड है, माने डिज़ायर है, वो वास्तव में आ रही है एक ही जगह से, वह है हमारा अस्तित्वगत अज्ञान, उसी को अहंकार बोलते हैं।

हम साइकोसोमैटिक बीइंग्स होते हैं न, हम तो कुछ खाते भी हैं, तो उसका भी असर मन पर पड़ता है। पड़ता है न? और वो शरीर की ही बात है। आप कुछ उल्टा-पुल्टा खा लीजिए, असर पड़ेगा। नशे का भी यही सिद्धांत होता है, आप कुछ ले लीजिए उससे दिमाग़ चक्कर खाना शुरू कर देगा। उसी तरीक़े से ये जो सेक्सुअल यूनियन होता है, ये भी एक फिज़िकल चीज़ है, जिसका मन पर असर पड़ता है। ये भी मन पर निशान छोड़ता है। तो आप इमोशनली भले ही नहीं अटैच हो रही हों, पर क्या आपने परखा है कि इसका मन पर क्या असर पड़ता है?