
प्रश्नकर्ता: सर, मैंने आपके और भी कई संवाद सुने हैं, देखे हैं, उनमें एक कड़ी जुड़ती है निर्भरता और अहंकार में।
आचार्य प्रशांत: जब इतना सुने हो, तो जानते तो और ज़्यादा हो।
प्र: सर, अंत में उसका जो हल आता है वो ये आता है कि अपनी सुनो, लेकिन वो बात आसानी से आ नहीं पाती।
आचार्य: नहीं, कठिनाई क्या है? क्या कठिनाई है?
प्र: सर, संसार हमें चला रहा है, हम नहीं चला रहे संसार को, तो अब ना चाहते हुए भी…
आचार्य: चलो एक-एक कदम उठा कर देखेंगे कि संसार तुम्हें जैसा चला रहा है वैसे तुम नहीं चलते तो क्या हो जाएगा। संसार तुमसे कह रहा है, “जाओ, उधर को जाओ। आज सुबह आठ बजे वहाँ पहुँचना है।” ठीक है। संसार आखिर क्या करता है? बाँह पकड़ कर तुम्हें खींच कर ले जाता है? तुम्हें पटक देता है? जाते तो अपने पाँव चल कर ही हो न? तुम नहीं गए आज – “हम नहीं जा रहे”, तो क्या हो जाएगा? जल्दी बोलो, क्या हो जाएगा? क्या हो जाएगा? तुम्हें आदेश दिया जा रहा है कि आठ बजे वहाँ चले जाना, तुम नहीं गए, बोलो क्या हो जाएगा? जल्दी बोलो!
प्र२: सर, उसका काम बिगड़ जाएगा, जिस काम के लिए…
आचार्य: क्या हो जाएगा? आगे बोलो क्या होगा। मैं जानना चाहता हूँ कि आखिरी नुकसान क्या होगा।
प्र३: कुछ नहीं होगा।
आचार्य: आखिरी नुकसान तुम्हें क्या हो जाना है? तो इतनी ग़मगीन हालत में क्यों बोलते हो कि, "संसार मेरे ऊपर चढ़ा हुआ है"?
प्र: सर, जो आपसे सुना है, उसके हिसाब से बता रहा हूँ।
आचार्य: (हँसते हुए) तो ये मैंने बताया है कि संसार तुम्हारे ऊपर चढ़ा हुआ है?
मैं पूछ रहा हूँ कि तुम्हारा बड़े-से-बड़ा नुकसान कोई क्या कर सकता है? ये पूछते क्यों नहीं हो अपने आप से यार? तुम्हारे पास क्या है ऐसा जो छीन लेगा? अरबपति-करोड़पति तुम हो नहीं। तुम्हारा क्या है जो छिन जाएगा? प्रॉपर्टी?
प्र: *मोबाईल*।
आचार्य: (हँसते हुए) मोबाईल! हाँ वो है, वो छिन सकता है। तो अच्छा है न, बोला न कि तुम लोग तो सौभाग्यशाली हो कि ऐसे समय में पैदा हुए हो; दे देना कि नहीं चाहिए छः-हज़ार वाला *मोबाईल*। हज़ार-हज़ार रुपये के भी आते हैं, और हज़ार हम कमा लेंगे।
प्र: हज़ार वाले से काम नहीं चलेगा।
आचार्य: हज़ार वाले से काम नहीं चलेगा? चल जाएगा, हज़ार वाले से भी काम चल जाएगा।
ले जाओ। मोबाईल ले जाओगे, और क्या ले जाओगे, बोलो? और क्या ले जाना चाहते हो, खड़े हैं, हमारे पास है क्या जो छीन लोगे? मैं फिर पूछ रहा हूँ कि कोई तुम्हारा बड़े-से-बड़ा क्या नुकसान कर लेगा, क्यों इतना डरे रहते हो?
प्र: डरते नहीं हैं सर।
आचार्य: नहीं, पर डरे हुए तो बहुत रहते हो, डर चू रहा है बिलकुल। (व्यंग करते हुए) संवाद के बाद यहाँ पोंछा लगता है, उसमें डर-ही-डर होता है! क्या डर है? इस डर को कभी परखा है कि इस डर में कुछ है भी या यूँ ही डरे जा रहे हैं?
प्र: सर, वो अज्ञात डर है जो हमेशा पीछे से धक्का देता रहता है।
आचार्य: अरे, तो ये भी तो हो सकता है कि पीछे से लग रहा है कि कोई धक्का दे रहा है पर कोई हो ही ना। कई बार देखा है अँधेरे में क्या होता है? लगता है पीछे कोई है, और यहाँ जान सूख रही है, बिलकुल गीले हुए जा रहे हैं ऊपर से नीचे। तो साधारण सी बात क्या होती है, मुड़ कर देख लो कोई पीछे है कि नहीं। पर जब डर बहुत लग रहा हो कि पीछे कोई है, तो मुड़ने की हिम्मत ही नहीं होती। लेकिन वही समाधान है। एक बार मुड़ कर देख लो, एक बार दिल कड़ा करो और मुड़ कर देख लो। कोई नहीं है भाई, क्या छिन जाएगा तुम्हारा?
हाँ धमकी दे सकता है कोई कि, "मैं ये छीन लूँगा, वो छीन लूँगा", तो बोलो कि, "छीन ले! हम वैसे ही नंगे हैं। हमारे पास है क्या जो छीन लोगे? और जो छीन सकते हो छीन लो, ले जाओ, हमें मुक्ति मिलेगी – अब कम से कम धमकी तो नहीं दे पाओगे न।" मान लो तुम ने हमें कुछ दिया है, तुम अब ये वापस ले लो, कम-से-कम धमकी से निजात मिलेगी, ले जाओ जो तुम्हारा था, ले जाओ, दिया।
लौटा दो, चोरी का माल समझ कर लौटा दो। किसी के पास दूसरे का माल रखा हो तो हमेशा इसी डर में रहता है कि वापस माँग लेगा, कि पुलिस आकर छीन ले जाएगी; तुम अपनी मर्ज़ी से लौटा दो, कि दिया! हमें चाहिए ही नहीं तुम्हारा माल, लो रखो, पर अब धमकी मत देना।
“नहीं सर लौटाने की तो नीयत ही नहीं है” (व्यंग करते हुए)। “हमें तो और चाहिए”।
प्र: उस समय पर मन को सख्त करना पड़ेगा।
आचार्य: सख्त करना पड़ेगा। कर लो सख्त; आँख बंद करो, ध्यान करो, और कम कर दो।
जितना लोगे उतना डरोगे, जितना लौटाते जाओगे उतना निर्भय होते जाओगे।