प्रश्नकर्ता: सर, मैंने आपके और भी कई संवाद सुने हैं, देखे हैं, उनमें एक कड़ी जुड़ती है निर्भरता और अहंकार में।
आचार्य प्रशांत: जब इतना सुने हो, तो जानते तो और ज़्यादा हो।
प्र: सर, अंत में उसका जो हल आता है वो ये आता है कि अपनी सुनो, लेकिन वो बात आसानी से आ नहीं पाती।
आचार्य: नहीं, कठिनाई क्या है? क्या कठिनाई है?
प्र: सर, संसार हमें चला रहा है, हम नहीं चला रहे संसार को, तो अब ना चाहते हुए भी…
आचार्य: चलो एक-एक कदम उठा कर देखेंगे कि संसार तुम्हें जैसा चला रहा है वैसे तुम नहीं चलते तो क्या हो जाएगा। संसार तुमसे कह रहा है, “जाओ, उधर को जाओ। आज सुबह आठ बजे वहाँ पहुँचना है।” ठीक है। संसार आखिर क्या करता है? बाँह पकड़ कर तुम्हें खींच कर ले जाता है? तुम्हें पटक देता है? जाते तो अपने पाँव चल कर ही हो न? तुम नहीं गए आज – “हम नहीं जा रहे”, तो क्या हो जाएगा? जल्दी बोलो, क्या हो जाएगा? क्या हो जाएगा? तुम्हें आदेश दिया जा रहा है कि आठ बजे वहाँ चले जाना, तुम नहीं गए, बोलो क्या हो जाएगा? जल्दी बोलो!
प्र२: सर, उसका काम बिगड़ जाएगा, जिस काम के लिए…




