प्रश्न: “मन जब भी कुछ छोड़ना चाहता है तो ऊपर-ऊपर की ही बात होती है, अंदर कहीं ना कहीं वो शायद पकड़ कर ही बैठा है। ऊपर-ऊपर से लगता है कि काफी कुछ जान गया, पर अंदर से पता है कि झूठ कितना है, स्थिति वही है। प्रश्न मैं ये सही से नहीं पूछ पा रहा हूँ।”
आचार्य प्रशांत: तुमनें बिलकुल सही से पूछा है। लिख तो दिया ईमानदारी से। अब इसमे कुछ बचा नहीं है, बिलकुल ठीक लग रहा है जो तुम्हें लग रहा है। इसमें दिक्कत क्या है? चाहते हो ऐसा न हो?
श्रोता: अब इसमें ये है आचार्य जी कि, चाहता हूँ ऐसा हो, लेकिन वही है कि, जैसे बताया, अभी बोल रहा था कि, जो एकदम अंदर वाली बात है ना, वो छोड़ने दे नहीं रही है…
आचार्य जी: नहीं तो तुम उससे क्या उम्मीद कर रहे हो छोड़ने दें? अरे कुछ दया भाव रखो। मार ही डालोगे क्या उसको? ठीक है तुम जितना कर सकते हो कर रहे हो, तुम्हें ये बात पता है ना कि ऐसा है? ईमानदारी से लिखा है ना? बहत है। तुम्हे और कुछ नहीं करना है। तुम्हारे ऊपर कोई दायित्व नहीं है, कोई पवित्र उत्तरदायित्व, कि मुझे तो कुचल-कुचल के मार देना है माया को।
तुम्हें नहीं मिशन पर भेजा गया है। है, ऐसा ही है ठीक है, तुम्हें पता चल रहा है जब तक तब तक ठीक है। इस पता चलने को कायम रखो, बाकि और, बस ठीक है। जो तुमनें पैदा नहीं किए वो, तुम्हारा कर्तव्य थोड़ी बन जाएगा मारना। तुमनें पैदा किया था उसे? तो तुम काहे पीछे पड़े हो? है, दुनिया का चलन है, दस्तूर है, मन की सामग्री है, वो ऐसी ही होती है। ठीक है।
श्रोता: लेकिन, आचार्य जी जब मैं यहाँ के बारे में सोचता हूँ तो अंदर से भी लगता है कि मैं, आचार्य जी के साथ बेईमानी कर रहा हूँ, या अपने साथ भी बेईमानी कर रहा हूँ। मतलब दोनों बाते मन में चलती रहती है कि…




