
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, भोग को लेके मैं थोड़ा समझ नहीं पाया हूँ। ये एक इच्छा अंदर बनी रहती है भोगने की। भोगने के बाद ये शायद कम होती है, लेकिन कुछ टाइम बाद फिर उतनी हो जाती है। ये इच्छा तो बनी ही रहेगी या जा भी सकती है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो तभी जाएगी न जब पूरी हो जाएगी। इच्छा का मतलब है कि भीतर कुछ कमी है।
प्रश्नकर्ता: कुछ कमी है।
आचार्य प्रशांत: उस कमी को पूरा करने के लिए एक इच्छा आती है।
प्रश्नकर्ता: हाँ जी।
आचार्य प्रशांत: उसमें न बीच में एक डिस्कनेक्ट होता है, इतना तो पता होता है भीतर कमी है। कमी न होती तो इच्छा नहीं आती, लेकिन इच्छा सिर्फ़ ये नहीं बोलती कि कमी है, इच्छा ज्ञानी बनती है। ये डिस्कनेक्ट है। इच्छा ज्ञानी बन के बोलती है कि कमी भी है और मुझे ये भी पता है किस चीज़ की कमी है और मुझे ये भी पता है कि किस चीज़ से वो कमी पूरी हो जाएगी।
जो आदमी इतने पर ही रुक जाए कि मुझे भीतर किसी कमी का, किसी रिक्तता का, अपूर्णता का एहसास होता है, इतना बोल के रुक जाए, वो बच जाएगा। लेकिन हम इतना बोल के रुकते नहीं न, हमें ज्ञानी बनना है। हम बोलते हैं, भीतर कुछ कमी है और मुझे ये भी पता है क्या कमी है और मैं ये भी जान गया हूँ, कि किस चीज़ से वो कमी भर सकता हूँ। तो फिर हम निकल जाते हैं बाज़ार की ओर और कमी को भरने के लिए कभी ये उठाते हैं, कभी सामान उठाते हैं, कभी कपड़ा उठाते हैं, कभी रिश्ता उठाते हैं। वहाँ गड़बड़ हो जाती है।
कमी है वो ठीक है, पैदा हुए हो तो कमी अनुभव होगी। अपूर्णता ही पैदा होती है, जीव पैदा हुआ है और भीतर बेचैनी न अनुभव करे ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन ज्ञानी मत बनो न। भीतर कमी पता चल रही है तो कहो कमी तो पता चली, पर चीज़ क्या है? काहे की कमी है? क्यों अनुभव कर रहा हूँ कमी? क्या है? तरह-तरह से प्रयोग करो, प्रश्न करो, पता करो, काहे की कमी है? क्या चीज़ है? अच्छा, इस कमी को भरने के लिए मैंने पहले भी कुछ उपाय करे थे, वो उपाय सफल हुए या असफल हुए? अभी ये जो भीतर इच्छा उठ रही है कि नई ये चीज़ ले आ लो, हासिल करो, ये चीज़ तो लगभग वैसी ही पुरानी चीज़ जैसी है जो मैंने एक साल पहले भी आज़माई थी। जब उससे कमी नहीं हटी तो इससे क्यों हट जाएगी?
तो ये प्रश्न करने पड़ते हैं अपने ही झूठे ज्ञान के ख़िलाफ़, इंसान की सबसे बड़ी लड़ाई तो अपने ही ज्ञान से होती है न। यहाँ कोई नहीं बैठा जो ज्ञानी न हो। और वो ज्ञान है कुछ नहीं, कचरा। तो अपने ही ज्ञान पर सवाल उठाने पड़ते हैं, हमें ईमानदार इच्छा चाहिए।
ईमानदार इच्छा बस ये बोलती है, मैं बीमार हूँ। बेईमान इच्छा उस मरीज़ की तरह होती है जो कहता है, “मैं बीमार हूँ, मैं अपनी बीमारी भी जानता हूँ, मैं ही डॉक्टर हूँ, मैं दवाई भी जानता हूँ, अपनी सर्जरी ख़ुद ही कर लूँगा।” बेईमान इच्छा उस पागल की तरह है जो अपनी ब्रेन सर्जरी ख़ुद ही कर रहा है। कह रहा है, “मैं पागल हूँ, ये मैं जान गया हूँ। मैं ये भी जानता हूँ कि मैं ही डॉक्टर हूँ और पागल हूँ तो मेरे ब्रेन में कुछ गड़बड़ है और मैं ख़ुद ही अपनी ब्रेन सर्जरी करूँगा।” ये बेईमान आदमी की बेईमान इच्छा है। वो इच्छा भी जानता है अपनी, बड़ा होशियार, बड़ा ज्ञानी है। वो इच्छा भी जानता है, वो कमी भी जानता है और वो अपनी इच्छा का उपचार भी जानता है।
जब इच्छा उठे तो थोड़ा सा रुक जाया करिए। भाग मत पड़ा करिए अंधे होकर कि इच्छा ने बोला, चलो लड्डू, तो लड्डू को ही निकल लिए। लड्डू माने प्रतीक। लड्डू माने लड्डू ही नहीं, लड्डू माने जो कुछ भी आपको आकर्षक, स्वादिष्ट लगता हो जीवन में। भाग मत पड़ा करो, थमा करो, कहा करो, ये लड्डू? पिछली बार बर्फ़ी। लड्डू और बर्फ़ी में कोई मूलभूत अंतर है क्या? जब बर्फ़ी से नहीं बात बनी तो लड्डू से क्यों बनेगी? बोले, नहीं, “पिछली बार बूंदी के थे, इस बार बेसन के हैं।” हैं तो लड्डू ही। बोले, “नहीं बहुत परिवर्तन आ गया है, अब हम वीगन हो गए हैं, इस बार यह कोकोनट ऑयल के हैं।”
अपने आप को मूर्ख मत बनाओ। ज़्यादातर जो हमारे उपाय हैं इच्छा पूर्ति के वो बहुत घिसे-पिटे हैं। हम वही सब कुछ करते रहते हैं बेचैनी को अपनी राहत देने के लिए जो हम सौ बार पहले भी कर चुके हैं। जब सौ बार पहले कर चुके हो तो अपनी ही भूल से सबक लीजिए। कह दीजिए, ऐसे तो ये चीज़ ठीक होगी नहीं, थोड़ा समझ ही लेने दो बात क्या है। समझ जाओगे कि क्या है ये इच्छा, कहाँ से आती है, कौन-कौन सी चीज़ों से इसका उपचार नहीं हो सकता, तो फिर जो भोग की कामना होती है वो शिथिल पड़ती है। फिर इंसान में प्रेम जागृत होता है, फिर इंसान इंसान कहलाने के लायक होता है।
जहाँ भोग है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता।
भोग का मतलब सिर्फ़ हिंसा होता है, और प्रेम नहीं है तो फिर तो काहे को जी रहे हो। ये लोग क्या गा रहे थे प्रेम को लेके, क्या गाया था?
श्रोता:
जिहि घट प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहिं राम। ते नर इस संसार में, उपजि भए बेकाम।।
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: वो तो कह रहे बेकाम, मैं कह रहा हूँ जिसके पास प्रेम नहीं है उसके काम ही काम होते हैं। काम माने कामना। प्रेम जितना कम होगा, जीवन में कामनाएँ उतनी ज़्यादा होंगी। सौ चीज़ों की इच्छा है, माने कहीं भी प्रेम नहीं है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इच्छाओं का कम होना अच्छा संकेत है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, अच्छा नहीं संकेत है। प्रेम भी इच्छा ही है, वो बहुत ऊँचे स्तर की इच्छा है। प्रेम नहीं आया, इच्छा ही कम कर ली तो मुर्दा हो गए। इच्छा तो कुर्सी के पास भी नहीं है। तो इसका अर्थ ये थोड़ी है कि कुर्सी बहुत अच्छा इंसान बन गई है। हमारी कुर्सी है, इसके पास एक भी इच्छा नहीं है। चलो, यही सबसे बड़ी ज्ञानी है, सब लोग इसको माल्यार्पण करते हैं। सिर्फ़ इच्छाओं का कम होना काफी नहीं है न, प्रेम आना चाहिए। प्रेम आकर के इच्छाओं के साथ जो करे सो करे। प्रेम मालिक है उसकी इच्छा। प्रेम का काम, प्रेम जाने।
इच्छाएँ बचेंगी, जाएँगी, वो होगा जो भी देखा जाएगा। लेकिन आमतौर पर देखा यही गया है कि जिनके जीवन में प्रेम आ जाता है, उनकी ये उल्टी-पुल्टी दो कौड़ी की इच्छाएँ, उनके पास समय नहीं बचता फिर।
प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार।
ये बाक़ी चीज़ें भूल जाता है आदमी। प्रेम में जब मग्नता आ जाती है ना तो ये बाक़ी इधर-उधर की बातें सब। लेकिन अभी प्रेम आया नहीं है, सब भूलने लग गए। तो ये मत कर देना। बोल रहे हैं, कि “बताया था, जब प्रेम आता है तो आदमी सब छोड़ने लग जाता है।” ये हम नहीं कह रहे कि ऐसे ही बस ज़बरदस्ती छोड़ दोगे तो प्रेम आ जाएगा, ऐसा कुछ नहीं होता, कुर्सी बन जाओगे बस।
प्रश्नकर्ता: सर, प्रेम भी इच्छा ही होती है?
आचार्य प्रशांत: प्रेम इच्छा ही होती है। बहुत गहरी इच्छा होती है, आत्मज्ञान से फिर जो आख़िरी इच्छा उठती है, उसको प्रेम कहते हैं। उसके लिए एक विशेष नाम होता है — मुमुक्षा। उस इच्छा को बोलते हैं, मुमुक्षा।
प्रश्नकर्ता: सर, बाक़ी इच्छाओं में और प्रेम में फ़र्क़ किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: बाक़ी इच्छा ज्ञानी बनती है। प्रेम में सचमुच ज्ञान होता है। बाक़ी इच्छाओं का कुछ नहीं पता, शुरुआत इसी से करी थी न, जानती कुछ नहीं, पर हर इच्छा ज्ञानी बनती है। “मैं तो जानती हूँ मेरा इलाज क्या है।” ये बाक़ी इच्छाओं का है। और प्रेम में सचमुच ज्ञान होता है, प्रेम जानता है। प्रेम का अर्थ ये है कि मैं समझ गया मुझे क्या चाहिए, वो मोक्ष है।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।