आपके लिए लग्ज़री सिर्फ़ मटेरियल होती है। और इसीलिए फिर आप पैसे के पीछे भागते हो क्योंकि पैसा तो टेंजिबल चीज़ें ही ख़रीद सकता है। न्यूयॉर्क में बंगला ख़रीदा है, क्या बस यही लग्ज़री है? बड़ी-से-बड़ी लग्ज़री है, एक सही और सच्चा जीवन। लग्ज़री होती है कि बिना बात के डरना नहीं पड़ता। ये पैसे देकर नहीं ख़रीदी जातीं। तुम जीवन के ग़ुलाम बनकर न जियो, जीवन में इससे बड़ी और क्या लग्ज़री हो सकती है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: कुल मिलाकर तर्क़ ये है कि आचार्य जी, आप तो ख़ूब भोग–वोग लिये (श्रोतागण हँसते हैं)। मज़े मारने के बाद अब मंच पर बैठकर प्रवचन दे रहे हो। हमने तो अभी ज़िंन्दगी के कोई मज़े मारे नहीं, तो हम कैसे छोड़ दें?
मैंने कौन–सी चीज़ें भोग ली हैं? क्या भोगा है? उल्टा हुआ है। मुझसे पन्द्रह–बीस बैच जूनियर लोग भी जितना कमाते हैं और कन्ज़्यूम (भोग) करते हैं, मैं उतना भी नहीं करता हूँ।
आज आइआइएम अहमदाबाद का जो फ्रेशर (नया–नया) निकलता है, उसकी जो एवरेज सीटीसी (औसतन सालाना सैलरी पैकेज) होती है, मेरी अपनी तनख़्वाह उतनी भी नहीं है। और जो मेरी तनख़्वाह है भी, उसमें मैं संस्था से आपकी एक पैसा नहीं लेता। पुरानी 'अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन' (अद्वैत जीवन शिक्षा) है, उसका जो पड़ा था, वही चल रहा था। और पिछले महीने मुझे बताया गया कि अब वो ख़त्म हो गया। तो अभी मुझे फ़ुर्सत ही नहीं मिली है, मुझे ये देखना है कि मेरा अपना खाना–पीना कैसे चलेगा, इस महीने में। लग्ज़रीज़ क्या हैं?


