(गीता-12) फिर सारे अधिकार तुम्हारे हैं, अर्जुन! || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२.६४।।
राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्याय, सांख्य योग, श्लोक क्रमांक चौंसठ। “राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।”
राग-द्वेष से मुक्त संयत इन्द्रीय विषयों का उपभोग करता है, यही प्रसाद है। विषयों का उपभोग करना उसका लक्ष्य नहीं है। विषयों के उपभोग से कुछ भी मिल सकता है — कभी सुख, कभी दुख उसको वो मानता है कि ये पीछे की चीज़ है। एक संयोगवश घटी घटना है। वास्तविक चीज़ क्या है? प्रेम।
सत्य से मुझे प्रेम है, या सत्य के किसी प्रतीक से मुझे प्रेम है, मैं उसकी दिशा जा रहा था — जो सही है मैं उसकी दिशा जा रहा था। वो मेरा प्राथमिक लक्ष्य है। उसकी ओर जाने की प्रक्रिया में बीच में अकस्मात् कभी सुख मिल गया, कभी दुख मिल गया उसको मैं क्या मानूँगा? प्रसाद। ये प्रसाद है, मिल गया।
प्रसाद कभी मीठा हो सकता है, कभी खट्टा, कड़वा, कुछ भी हो सकता है। तो उसको लेकर के मैं न बहुत प्रसन्नता दिखाऊँगा, न अपनेआप को बहुत अनुग्रहित मानूँगा, न अपनेआप को अभागा मानूँगा। उसमें न अनुग्रह है, न अभाग। वो क्या है सिर्फ़? प्रसाद।






