आचार्य प्रशांत: क्या करना है, क्या नहीं करना है। क्या होना है, क्या नहीं होना है। दिशा कौनसी लेनी है, नहीं लेनी है इसका निर्णय अहंकार ही करता है। और आप ये नहीं कह सकते कि अहंकार ने अपने लिए गलत निर्णय करा। कोई और देखें, तो कह देगा कि ये व्यक्ति गलत निर्णय कर रहा है। आप ही अपनेआप को कुछ काल बाद देखें, तो हो सकता है आप भी बोल दें कि मैंने गलत निर्णय कर डाला। लेकिन जिस पल आप जो बने हैं और जो कर रहे हैं, वो आप कर ही इसीलिए रहे हैं क्योंकि उस पल आपको लग तो वही ठीक रहा है।
तो अहम् चलता है अपने हिसाब से, अपनी गणनाओं पर, स्वयं को ही प्रमाण मानकर। कैसे सिद्ध करोगे कि जो तुम बने बैठे हो या कर रहे हो वो ठीक है, उचित है। अहम् का आखिरी जवाब होता है, क्योंकि ऐसा मुझे लगता है, ऐसा मुझे प्रतीत होता है, ऐसे मेरी गणना है, ऐसा मेरा हिसाब है। और कोई अन्तिम तर्क नहीं होता अहम् के पास। और भी तर्क होते हैं पर वो इस तर्क से पूर्ववर्ती होते हैं। माने वो इस तर्क से पहले के, इस तर्क से हल्के तर्क होते हैं।
वो समझ लीजिए बाकी सब जो तर्क हैं, वो साधारण न्यायालय है, जिला न्यायालय। बहुत हुआ तो उच्च न्यायालय। लेकिन अहम् के देश में, अहम् की दुनिया में उच्चतम न्यायालय तो अहम् स्वयं हैं। ऐसा नहीं कि दूसरे अन्य लोगों को कोई अधिकार ही नहीं है कुछ कहने का। उन्हें अधिकार है, पर उनके सब अधिकारों से अहम् अपना अधिकार ऊपर रखता है। ठीक वैसे, जैसे जिला न्यायालय में कोई बैठा हुआ न्यायाधीश, उसको भी निर्णय देने का अधिकार है। कौन कह रहा अधिकार नहीं है? लेकिन वहाँ जो उच्चतम बैठा हुआ है न्यायाधीश, वो कहता है, ‘तुम दे लो, पर तुम्हारा चलेगा या नहीं चलेगा, ये आखिरी निर्णय तो मैं ही करूँगा।’
तो शास्त्र कुछ बोल लें, ठीक है शास्त्रों ने बोल लिया अच्छी बात है। पर शास्त्रों की बात माननी है कि नहीं माननी है, ये कौन तय करता है? अहम् तय करता है। तो शास्त्र बड़े हुए या अहम् बड़ा हुआ? अगर शास्त्रों की बात मानी भी गयी, तो भी क्या शास्त्र बड़े हुए? अगर अहम् बिलकुल शास्त्रों की बात मानकर भी चल रहा है, तो भी बड़ा कौन है? अहम् बड़ा है न। क्योंकि अहम् ने निर्णय किया है कि शास्त्र की बात माननी है। कल को अहम् अपना जो निर्णय है उसको पलट भी सकता है।







