देवी का रहस्य क्या? शक्ति का अर्थ क्या? || आचार्य प्रशांत, दुर्गा सप्तशती - तृतीय चरित्र (2022)

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न हो गये थे और देवताओं ने फिर आकर के एक स्वर में देवी की आराधना करी थी और आभार व्यक्त करा था और देवी ने पूछा था, ‘क्या चाहिए भाई?’ तो उन्होनें कहा था कि अभी तो जो चाहिए था वो तो मिल ही गया, हाँ इतना ज़रूर दे दीजिए कि आगे कभी आपकी आवश्यकता पड़ेगी, आपको स्मरण करेंगें तो आप सहायता अवश्य करेंगी, तो देवी ने कहा था, ‘ठीक है! तथास्तु!’
तो जैसा देवताओं का हाल है, जैसा देवत्व का चलन है, बहुत दिन तक देवताओं का सुख-चैन और स्वर्ग चला नहीं। उनको फिर से आ गये दूसरे दैत्य सताने और इस बार देवताओं ने अपना राज-पाट और अधिकार किनके हाथों खोया?
तीसरे अध्याय के जो केन्द्रीय दैत्य हैं, अधर्म की जो केन्द्रीय सत्ता है, उसका नाम है, ‘शुम्भ और निशुम्भ।’ बड़ा विस्तृत चरित्र है ये, तीसरा चरित्र। अभी मैंने तीसरा अध्याय बोल दिया था और पाँचवे अध्याय से लेकर के तेरहवें तक जाता है, तो इसमें शुम्भ-निशुम्भ के अतिरिक्त और न जाने कितने उपद्रवी दैत्यों-राक्षसों का उल्लेख आएगा, जहाँ सम्भव होगा हम उनकी चर्चा कर देंगें, पर सबकी बात करना बहुत आवश्यक नहीं है, सप्तशती की जो केन्द्रीय विषय-वस्तु है, हम उस पर ज़्यादा ध्यान देंगे। तो पहली बात तो ये कि अभी-अभी तो देवताओं को अभय किया गया था महिषासुर से, ये फिर क्यों हो गया कि वो अपना राज-पाट गॅंवा बैठे? ये पहला विचारणीय प्रश्न है, क्यों हो गया, बताओ?






