आचार्य प्रशांत: ख़ासतौर पर आप अगर आज की पीढ़ी को देखें — मैं बात को ज़रा व्यापक तौर पर ले रहा हूँ सबके लिए — तो ये डाँट खाने को राज़ी नहीं हैं। जिन्हें आप मिलेनियल्स (सहस्त्राब्दी) बोलते हैं, इन्हें आप डाँट के देख लीजिए। अब क्या ये सिर्फ़ संयोग है कि मेंटल डिज़ीज़ का प्रिवेलेंस (विशेषाधिकार) भी सबसे ज़्यादा मिलेनियल्स में ही है। ये सिर्फ़ संयोग मात्र है क्या।
जब आप अपने शुभचिंतकों से डाँट खाने को राज़ी नहीं होते तो फिर ज़िन्दगी आपको लात मारती है। या तो उनसे डाँट खाना बर्दाश्त कर लो जो तुम्हारे भले के लिए तुमको चार बातें बता रहे हैं या फिर सीधे-सीधे ज़िन्दगी जब हथौड़ा मारेगी, तोड़ेगी, तब झेल लेना।
सातवीं-आठवीं के लड़कों को आप कुछ बोलिए, तो कहेंगे कि दिस इज़ नॉट चिल, यू आर बुलींग मी। (ये सही नहीं है, आप मुझे धमका रहे हैं।) वो सातवीं का लड़का है, उसको एक बात बतायी जा रही है और वो क्या बोल रहा है, 'यू आर बुलींग मी।' (आप मुझे धमका रहे हैं।)
सबसे बडे़ बुली (डराने-धमकाने वाले) तो फिर हमारे संत लोग थे। वो तो जीवनभर बातें बताते ही रहे और उन्होंने कभी चाशनी में लपेट कर नहीं बतायीं, जस का तस सामने रख दीं। तो तुम बोलो फिर कि कृष्ण बुली थे, अष्टावक्र बुली थे। वो बोलेंगे भी कैसे, इनका उनसे कुछ सम्बन्ध ही नहीं, कभी पढ़ा ही नहीं; और पढ़ेंगे भी इसीलिए नहीं।
आज जो पूरी हमारी संस्कृति खड़ी हुई है, आज का कल्चर (संस्कृति), उसके तीन स्तंभ हैं — मैं कहा करता हूँ — हैप्पीनेस, कंज़म्प्शन, मोटिवेशन (ख़ुशी, भोग, प्रेरणा)। इन तीन चीज़ों पर चल रही है हमारी संस्कृति। और तीनों एक-दूसरे से, समझ ही रहे होंगे आप कि परस्पर सम्बन्धित हैं। और तीनों का कुल नतीजा वही सामने है कि हम भयानक रूप से बीमार होते जा रहे हैं।




