सबके ऊपर ये एक बहुत बड़ा फ़ितूर होता है कि अगर बिकेंगे नहीं, तो जिएँगे कैसे? पैसा कहाँ से आएगा? जितना तुमको चाहिए, सचमुच उतना आ जाएगा। और अनाप-शनाप पैसा चाहने की कोई सीमा होती नहीं है। इसीलिए हर इंसान बिक जाता है इन दो चीज़ों पर — एक, कंचन (कंचन माने सोना, पैसा); और दूसरा, कामिनी (कामिनी माने वासना)। इन दो से बचे रहो, तो हो गई क्रांति — एक सही ज़िंदगी अपने आप जीने लगोगे।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि भगत सिंह की तरह हम कोई क्रांति लाने के बारे में क्यों नहीं सोच पाते?
आचार्य प्रशांत: तुम जिस ज़िंदगी की ओर बढ़ रहे हो वो भगत सिंह की है या चुन्नीलाल की? जल्दी बोलो! ये तो अजीब बात है! किताबों में भगत सिंह को पढ़ रहे हो। जब चुन्नीलाल जैसी ज़िंदगी जीनी थी, तो किताबों में भी चुन्नीलाल को ही पढ़ा होता! तो ये तो हो गया न अब बड़ा पाखंड हो गया। और ये तय सबने कर रखा होता है और माँ-बाप ने तो पूरा ही तय कर रखा होता है। माँ-बाप को पता चल जाए कि लड़का भगत सिंह की तरफ़ जा रहा है, तुरंत छाती पीटने लगेंगे।
दुनिया में इतनी मूर्खता फैली हुई है, इतना अन्याय है, इतना अत्याचार है, पागलों ने आग लगा दी है दुनिया में! तुम बस किसी मजबूरी तले अपने आप को दबा मत लेना। विद्रोह तो कर ही दोगे। क्योंकि जो सब चल रहा है दुनिया में वो एकदम प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। विद्रोह तो कर ही दोगे। पर कोई करता नहीं। क्यों? क्योंकि सब अपने आप को मजबूरियों तले दबा लेते हैं। एक बार दब गए तो अब क्या विद्रोह करोगे! वो मत करना बस!
दस-दस साल सरकारी नौकरी की तैयारी चल रही है। ये आदमी कौन-सी महानता हासिल करेगा, बताओ। कि करेगा? जिन रास्तों से कोई लेना-देना नहीं उन पर चल पड़े हैं। कहीं भी




