प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले कुछ समय से महिलाओं के प्रति दुराचार की घटनाएँ बहुत सामने आ रही हैं। यह सब देख कर मन बहुत खिन्न है। कृपया कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: देखो, मैं तीन की बात करता हूँ हमेशा। एक होती है आत्मा, सच्चाई; दूसरे होते हैं सांसारिक प्रभाव और तीसरे होते हैं हम, मैं, अहम्। यह त्रिकोण देख पा रहे हो? इस त्रिकोण के एक कोने पर बैठा है 'मैं' और उसके सामने दो विकल्प हैं — या तो सीधी–सच्ची राह पर चले या सामाजिक, सांसारिक प्रभाव पर चले। तो 'मैं' है और 'मैं' को ही इन दोनों में से चुनना होता है। अब अगर 'मैं' हिंसक हो रहा है, राक्षसी हो रहा है, बर्बर हो रहा है, तो आत्मा को चुनकर तो नहीं हो रहा होगा।
जो प्रश्न पूछा है, प्रश्न कहता है, 'महिलाओं के प्रति दुराचार की घटनाएँ सामने आ रही हैं’। यह जो दुराचारी है, यह 'मैं' ही है न। कोई व्यक्ति है जो दुराचार करना चयनित करता है, वह चुनता है दुराचार होना। तो इस 'मैं' ने दुराचार करा, 'मैं' ने दुराचार करा। सच्ची राह चला होता तो दुराचार होता ही नहीं। तो अब इस त्रिकोण से आत्मा को तो हटा दो। तो यह जो दुराचार हुआ है, अब इसके दो दोषी हैं — एक तो वह संसार, वह समाज जिसमें व्यक्ति मौजूद है, जिसका व्यक्ति पर प्रभाव पड़ रहा है और दूसरा, वह व्यक्ति जिसने इन सब राक्षसी प्रभावों का अपने लिए चयन करा।
समझ रहे हो बात को?
जब हम कहते हैं कि किसी ने पाप करा, दुराचार करा तो दुराचार की इस प्रक्रिया में दो ताकतें शामिल हैं — एक तो वह व्यक्ति ख़ुद जिसने चुनाव किया कि मैं दुराचार करूँगा; दूसरा, वह सब प्रभाव जिन्होंने उस व्यक्ति को दुराचार करने के लिए प्रेरित करा। ठीक है? तो यह दो हैं जिन्होंने दुराचार करा है। और यह दोनों किस एक में समाए हैं? यह उस व्यक्ति के शरीर में समाए हैं। बात समझ में आ रही है?




